फ्रांस के बच्चों को बिगाड़ रही अमेरिकी परवरिश:  जेंटल पैरेंटिंग ने बच्चों से ‘ना’ सुनने की आदत छीनी, एक्सपर्ट- पैरेंट्स प्यार से सुलझाएं समस्या
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फ्रांस के बच्चों को बिगाड़ रही अमेरिकी परवरिश: जेंटल पैरेंटिंग ने बच्चों से ‘ना’ सुनने की आदत छीनी, एक्सपर्ट- पैरेंट्स प्यार से सुलझाएं समस्या

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द न्यूयॉर्क टाइम्स. न्यूयॉर्क3 घंटे पहले

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डैले कहती हैं,‘बच्चों को अकेले कमरे में बंद करना नुकसानदेह है। इस तरह की सजा के बजाय ‘टाइम-इन’ अपनाएं... बच्चे के साथ बैठकर कहें,‘मैं तुम्हारी नाराजगी समझता हूं, पर चीजें फेंकना गलत है।’- प्रतीकात्मक फोटो - Dainik Bhaskar

डैले कहती हैं,‘बच्चों को अकेले कमरे में बंद करना नुकसानदेह है। इस तरह की सजा के बजाय ‘टाइम-इन’ अपनाएं… बच्चे के साथ बैठकर कहें,‘मैं तुम्हारी नाराजगी समझता हूं, पर चीजें फेंकना गलत है।’- प्रतीकात्मक फोटो

फ्रांस में इस समय बच्चों की परवरिश के तौर-तरीकों को लेकर बहस छिड़ी है। पैरेंट्स पसोपेश में हैं कि कौन सा तरीका अपनाएं। पारंपरिक रूप से, फ्रांसीसी पैरेंटिंग को अनुशासित व व्यावहारिक माना जाता था, जहां बच्चे बड़ों की दुनिया में ढलना व सलीके से रहना जल्दी सीख जाते थे। पर बीते दशक में अमेरिकी प्रभाव वाली ‘पॉजिटिव’ या ‘जेंटल पैरेंटिंग’ का ट्रेंड बढ़ा है, जो बच्चों की भावनाओं व आपसी बातचीत को प्राथमिकता देती है।

कैरोलिन कहती हैं,‘अमेरिकी जेंटल पैरेंटिंग की अति-संवेदनशीलता ने फ्रांसीसी बच्चों को जिद्दी बना दिया है। बच्चे अब काबू में नहीं हैं। ट्रेनों में ‘चाइल्ड-फ्री केबिन’ जैसी मांग इसी का नतीजा है, क्योंकि पैरेंट्स ने उन्हें खुली छूट दे दी है। कैरोलीन ‘टाइमआउट’ की खुली समर्थक हैं। यानी बच्चा बात न माने, मेजपोश खींचे या शोर मचाए, तो उसे बिना बातचीत के अकेले कमरे में भेज देना चाहिए। यह अलगाव बच्चे को ‘गलती’ व ‘सजा’ के बारे में सिखाता है। दुनिया के लिए आदर्श रही है फ्रांस की पैरेंटिंग: फ्रांस में बच्चे कम उम्र से ही डे-केयर जाने लगते थे। वहां वे बड़ों की तरह तीन-कोर्स भोजन करना और मेहमानों का शालीन स्वागत सीखते थे। मनोवैज्ञानिक रोमां डैले कहती हैं, ‘पैरेंट्स का लक्ष्य छोटी उम्र में बच्चे को इतना तैयार कर देना होता था कि वह डे-केयर जाए और वे पुरानी जिंदगी वापस पा सकें। यही अलगाव और संतुलन फ्रांसीसी पैरेंटिंग की ताकत मानी जाती थी।

दूसरी तरफ, आधुनिक विज्ञान व न्यूरोसाइंस से प्रेरित ‘पॉजिटिव पैरेंटिंग’ के समर्थक इसे डर की संस्कृति व दमनकारी बताते हैं। विवाद इतना बढ़ चुका है कि केयरगिवर्स के लिए बने राष्ट्रीय मानकों में इस टाइम आउट को कानूनन बैन तक कर दिया गया है। यह लड़ाई सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रही, इंटरनेट पर देर रात तक चलने वाली बहस व मानहानि के मुकदमों तक पहुंच गई। कैरोलीन कहती हैं,‘आलोचक सिर्फ मीडिया का ध्यान खींचने के लिए निशाना साध रहे हैं। वे कहती हैं, समस्या बच्चों को प्यार देने की नहीं है, बल्कि पैरेंट्स सीमाएं तय करना भूल गए हैं और बच्चों के हाथों की कठपुतली बन चुके हैं।’

टाइम आउट नहीं… टाइम इन अपनाएं, नतीजे बेहतर मिलेंगे

मनोवैज्ञानिक रोमां डैले कहती हैं,‘बच्चों को अकेले कमरे में बंद करना नुकसानदेह है। इस तरह की सजा के बजाय ‘टाइम-इन’ अपनाएं… बच्चे के साथ बैठकर कहें,‘मैं तुम्हारी नाराजगी समझता हूं, पर चीजें फेंकना गलत है।’ इससे उसे सुरक्षा और नियम दोनों समझ आते हैं। छोटे बच्चों का चीजें गिराना बदतमीजी नहीं, बल्कि दुनिया को समझना है। समाधान सजा नहीं, बल्कि घर सुरक्षित बनाना और ध्यान भटकाना है। साथ ही माता-पिता को अपनी मानसिक शांति के लिए जिम्मेदारी बांटनी चाहिए। शांत माता-पिता ही अनुशासित बच्चे की परवरिश कर सकते हैं। यही संतुलन पॉजिटिव पैरेंटिंग की नींव है।



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