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9 घंटे पहलेलेखक: अदिति ओझा
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किताब का नाम- मेरी मां मेरी गैंगस्टर
(‘मदर मैरी कम्स टू मी’ का हिंदी अनुवाद)
लेखक- अरुंधति रॉय
अनुवाद- प्रभात सिंह
प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन
मूल्य- 550 रुपए
कभी-कभी किसी इंसान को समझने के लिए उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धियों को जानना काफी नहीं होता। यह भी जानना पड़ता है कि उसने बचपन में क्या सहा, किन रिश्तों से लड़कर अपनी जगह बनाई और किन लोगों से दूर होने के बाद भी वह उनसे पूरी तरह दूर नहीं हो पाया।
अरुंधति रॉय की किताब ‘मेरी मां मेरी गैंगस्टर’ ऐसी ही एक कहानी है। ‘बुकर पुरस्कार’ जीत चुकी लेखिका अरुंधति रॉय की यह पहली ऐसी किताब है, जिसमें उन्होंने अपनी जिंदगी के अनुभवों और मां मैरी रॉय के साथ अपने रिश्ते को बयां किया है।
मां ने उन्हें दुनिया का सामना करना और मुश्किलों से लड़ना सिखाया। हालांकि, मां-बेटी का रिश्ता हमेशा सहज नहीं रहा। इसमें प्यार और अपनापन था तो ऐसे अनुभव भी थे, जिन्होंने अरुंधति के व्यक्तित्व और सोच को गहराई से प्रभावित किया। जैसेकि एक जगह वह लिखती हैं-

साल 2022 में मां की मृत्यु के बाद अरुंधति ने इस किताब में उनके साथ अपने रिश्ते को समझने की कोशिश की है। 18 साल की उम्र में वह मां से दूर चली गई थीं। लेकिन यह किताब सिर्फ मां की यादों तक सीमित नहीं है। इसमें उस रिश्ते की परतें खुलती हैं, जहां प्यार के साथ गुस्सा, कृतज्ञता के साथ शिकायत और आजादी के साथ बंधन भी मौजूद थे।
किताब में क्या है?
- इस किताब को पढ़ते हुए सबसे पहले यह महसूस होता है कि अरुंधति रॉय अपनी मां को किसी एक पहचान में कैद नहीं करना चाहतीं।
- वह उन्हें महान महिला साबित करने के लिए उनकी कमियों को छिपाती नहीं हैं। न ही अपने बचपन की तकलीफों को बयां करते हुए उन्हें सिर्फ एक ‘कठोर मां’ बनाकर छोड़ देती हैं।
- मैरी रॉय एक शिक्षिका थीं, महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली कार्यकर्ता थीं और अपने फैसले खुद लेने वाली महिला थीं।
- लेकिन घर के भीतर उनका व्यवहार हमेशा वैसा नहीं था, जैसा समाज एक आदर्श मां से उम्मीद करता है।
- उनमें असाधारण साहस था, लेकिन गुस्सा भी था। वह अपने बच्चों के भविष्य के लिए संघर्ष करती थीं, लेकिन उनके साथ उनका रिश्ता कई बार डर और तनावपूर्ण होता था।
- अरुंधति अपनी मां के व्यक्तित्व के इन सभी पहलुओं को साथ रखती हैं। शायद इसी वजह से यह किताब किसी पारंपरिक जीवनी की तरह नहीं लगती।
- इसमें किसी महान महिला के जीवन का महिमामंडन नहीं है। इसमें एक बेटी है, जो अपनी मां को याद करते हुए उनसे सवाल भी करती है और उनके सामने अपनी कमजोरियां भी स्वीकार करती है।
वह मां, जिसने अकेले अपनी दुनिया बनाई
अरुंधति का बचपन आसान नहीं था। जब अरुंधति बहुत छोटी थीं, तभी उनके माता-पिता अलग हो गए थे। उनकी मां मैरी अपने दोनों बच्चों को लेकर केरल लौट आईं। उस समय समाज में अकेले बच्चों को पालने वाली महिला के लिए जीवन आसान नहीं था। परिवार और समाज की परंपराओं के बीच अपनी शर्तों पर जीने का फैसला अपने आप में एक संघर्ष था।
मैरी ने इस संघर्ष को सिर्फ अपने निजी जीवन तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने शिक्षा को अपना रास्ता बनाया और केरल के कोट्टायम में एक स्कूल की स्थापना की। आगे चलकर यह संस्थान ‘पल्लिकूडम’ के नाम से जाना गया। उन्होंने अपनी मेहनत और जिद के दम पर एक ऐसी जगह बनाई, जिसे वह अपनी पहचान कह सकती थीं।

किताब की क्या खूबी है?
- किताब की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें मैरी की उपलब्धियों के साथ उनकी कमियों को भी जगह दी गई है।
- वह एक सफल शिक्षिका और साहसी महिला थीं, लेकिन मां के रूप में उनका व्यवहार कई बार अरुंधति के लिए तकलीफदेह रहा।
- यहीं किताब हमें एक जरूरी बात समझाती है। किसी इंसान की उपलब्धियां और उसके निजी रिश्तों में उसका व्यवहार हमेशा एक जैसा नहीं होता।
- कोई बाहर की दुनिया में न्याय के लिए लड़ सकता है और अपने घर में दूसरों को चोट भी पहुंचा सकता है। इन विरोधाभासों को स्वीकार करने का मतलब किसी को छोटा समझना नहीं, बल्कि उसे उसकी खूबियों और कमियों के साथ समझना है।
मां से दूर जाने की जरूरत
अरुंधति 18 साल की उम्र में दिल्ली चली गईं। यह सिर्फ पढ़ाई या करियर के लिए घर छोड़ने का फैसला नहीं था। इसके पीछे एक ऐसे रिश्ते से दूरी बनाने की जरूरत भी थी, जो उनके लिए भावनात्मक रूप से कठिन हो गया था।
यहां ये समझना जरूरी है कि मां से दूर जाना और मां से मुक्त हो जाना दो अलग बातें हैं। इंसान घर छोड़ सकता है, अपना जीवन बना सकता है, अपनी पहचान हासिल कर सकता है, लेकिन बचपन के रिश्ते उसके भीतर बने रहते हैं। कभी वे उसकी ताकत बनते हैं, कभी उसकी कमजोरियां और कभी ऐसे सवाल, जिनका जवाब उसे बरसों बाद भी नहीं मिलता।
अरुंधति की जिंदगी में भी यही उलझन दिखाई देती है। उन्होंने अपनी अलग दुनिया बनाई।
वास्तुकला की पढ़ाई की, लेखन की तरफ आईं और 1997 में अपने उपन्यास ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ के लिए ‘बुकर पुरस्कार’ हासिल किया। लेकिन इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद मां के साथ उनका रिश्ता जीवन का एक ऐसा अध्याय बना रहा, जिससे वह पूरी तरह बाहर नहीं निकल सकीं।
क्या हर मां ‘अच्छी मां’ होती है?
हमारे समाज में मां को लेकर एक तयशुदा छवि है। मां त्याग करती है, मां माफ करती है, मां अपने बच्चों के लिए सब कुछ सहती है। इस छवि में मां के गुस्से, उसकी महत्वाकांक्षा, उसकी क्रूरता या उसकी भावनात्मक कमजोरियों के लिए बहुत कम जगह है।
लेकिन असल जिंदगी के रिश्ते कभी इतने सीधे नहीं होते। अरुंधति की मां अपने समय की ‘पितृसत्तात्मक व्यवस्था’ से लड़ने वाली महिला थीं। उन्होंने अपनी आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक पहचान के लिए संघर्ष किया। इसके बावजूद वह अपने बच्चों के साथ हमेशा सहज और संवेदनशील व्यवहार नहीं कर सकीं। किताब इस विरोधाभास को किसी आसान निष्कर्ष में बदलने की कोशिश नहीं करती।
मां को इंसान की तरह समझने की कोशिश
यही इसकी सबसे महत्वपूर्ण बात है। किसी महिला का संघर्ष उसे अपने आप एक आदर्श मां नहीं बना देता। उसी तरह किसी मां के व्यवहार से मिली तकलीफ यह जरूरी नहीं कि उसके सारे संघर्ष और उपलब्धियां बेकार हो जाएं।
यह किताब मां को पूजने या खारिज करने के बजाय उसे एक इंसान की तरह देखने की जगह बनाती है। एक ऐसा इंसान, जिसमें अच्छाइयां भी हैं और कमजोरियां भी। जो प्यार कर सकता है और चोट भी पहुंचा सकता है।
शोक के बाद लिखी गई किताब
- मैरी रॉय की मृत्यु के बाद अरुंधति के भीतर जो भावनाएं उठीं, वे सिर्फ दुख तक सीमित नहीं थीं।
- मां से दूर रहने का फैसला करने वाली बेटी के भीतर मां की मृत्यु के बाद भी गुस्सा हो सकता है, राहत हो सकती है, अपराधबोध हो सकता है और एक ऐसी कमी भी, जिसे शब्दों में समझाना मुश्किल हो।
- यह किताब इसी भावनात्मक उलझन को जगह देती है। यहां शोक का मतलब पुराने मतभेदों को भुला देना नहीं है।
- मृत्यु किसी रिश्ते को अपने आप सुंदर या निर्दोष नहीं बना देती। वह सिर्फ इतना करती है कि अब उस रिश्ते को बदलने, उसमें कुछ नया जोड़ने या पुराने सवालों का जवाब पाने की संभावना समाप्त हो जाती है।
- शायद इसी वजह से अरुंधति के लिए लिखना भी जरूरी हो जाता है। अपनी मां के बारे में लिखना, अपने बचपन को दोबारा देखना और यह समझना कि जिस व्यक्ति से वह दूर भागी थीं, उसी ने उनके व्यक्तित्व को बनाने में कितनी बड़ी भूमिका निभाई।
- इस किताब में मां की मृत्यु के बाद का दुख सिर्फ एक व्यक्ति को खोने का दुख नहीं है। यह उस रिश्ते को खोने का दुख भी है, जिसे शायद जीवन भर पूरी तरह समझा नहीं जा सका।

यादों के सहारे खुद तक पहुंचना
- अरुंधति रॉय की भाषा में एक खास तरह की बेचैनी है।
- वह घटनाओं को सिर्फ दर्ज नहीं करतीं, उनके भीतर छिपे अर्थों को भी तलाशती हैं। उनकी यादें सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़तीं।
- मां से जुड़ा कोई प्रसंग उन्हें अपने बचपन में ले जाता है, कोई पुरानी चोट उनके वयस्क जीवन को समझने का रास्ता बनती है और कोई निजी अनुभव देश तथा समाज की बड़ी तस्वीर से जुड़ जाता है।
- इसलिए इसे सिर्फ मैरी रॉय की जीवनी की तरह पढ़ना ठीक नहीं होगा। यह अरुंधति की अपनी पहचान की तलाश भी है।
- वह यह समझने की कोशिश करती हैं कि उनकी मां ने उन्हें किस तरह बनाया, किन बातों से उन्हें ताकत मिली और किन अनुभवों से उनके भीतर विरोध करने की इच्छा पैदा हुई।
- किताब की भाषा भावनात्मक और कई जगह तीखी है। यह उन पाठकों को अधिक पसंद आएगी, जिन्हें आत्मकथाओं में सिर्फ घटनाओं का सिलसिलेवार ब्योरा नहीं, बल्कि अनुभवों की गहराई भी चाहिए।
यह किताब किसे पढ़नी चाहिए?
अगर आप अरुंधति रॉय के लेखन को पसंद करते हैं, तो यह किताब उनके व्यक्तित्व के एक दूसरे पहलू को समझने का मौका देती है। लेकिन इस किताब का महत्व सिर्फ अरुंधति के पाठकों तक सीमित नहीं है।
हर उस व्यक्ति को इसमें अपने जीवन से जुड़ा कोई सवाल मिल सकता है, जिसने अपने परिवार के भीतर प्रेम और तकलीफ को एक साथ महसूस किया है। खासकर उन लोगों को, जिनके लिए माता-पिता से रिश्ता हमेशा आसान नहीं रहा।

किताब के बारे में मेरी राय
पढ़ते हुए बार-बार महसूस होता है कि किसी इंसान से प्रेम करने का मतलब उसकी हर बात को सही मान लेना नहीं है। उसी तरह किसी रिश्ते में मिली तकलीफ का मतलब यह भी नहीं कि उस रिश्ते में प्रेम कभी था ही नहीं।
अरुंधति रॉय अपनी मां को याद करते हुए न तो उन्हें निर्दोष साबित करने की कोशिश करती हैं, न खुद को हर परिस्थिति में सही ठहराती हैं। वह अपने रिश्ते की मुश्किल सच्चाइयों के साथ बैठती हैं। यही इस किताब की सबसे बड़ी खूबी है।
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ग्राफिक्स- विपुल शर्मा
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बहुत सादगी से लेखक साहिर की जिंदगी के एक-एक किरदार से हमारा परिचय कराते हैं। कहीं भी अनावश्यक सनसनी नहीं है। न प्रेम प्रसंगों में, न विवादों में और न ही उनके संघर्षों में। यही संयम किताब को विश्वसनीय बनाता है। पूरी खबर पढ़ें…









