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दुनियाभर में मोटापा मापने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला पैमाना बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) है। यह व्यक्ति के वजन और ऊंचाई के आधार पर तय करता है कि वह सामान्य, ओवरवेट या मोटापे की श्रेणी में आता है। हालांकि, अमेरिका में हुई एक नई रिसर्च से पता चला है कि बीएमआई पूरी तरह सटीक नहीं है। क्यों उठ रहे हैं बीएमआई पर सवाल? बीएमआई शरीर में मौजूद अतिरिक्त चर्बी और हड्डियों या मांसपेशियों के वजन के बीच अंतर नहीं कर पाता। इसलिए कई बार व्यक्ति बीएमआई के अनुसार सामान्य दिखाई देता है, लेकिन उसके शरीर में खतरनाक फैट जमा हो सकते हैं। नई रिसर्च में क्या सामने आया? अमेरिका में 5,600 वयस्कों पर किए गए अध्ययन में बीएमआई के साथ कमर की माप और शरीर में फैट को भी शामिल किया गया। शोध में पाया गया कि बीएमआई के आधार पर केवल ‘ओवरवेट’ माने जाने वाले लगभग आधे लोग ‘क्लिनिकल ओबेसिटी’ से प्रभावित थे। यानी ये लोग मोटापे के रोग से पीड़ित तो थे पर बीएमआई के आधार पर इनकी पहचान इलाज के लिए नहीं हो पाई थी। क्लिनिकल ओबेसिटी क्यों खतरनाक है? क्लिनिकल ओबेसिटी की स्थिति में शरीर की अतिरिक्त चर्बी के कारण अंगों और टिश्यू प्रभावित होती है। खासकर पेट के पास जमा चर्बी शरीर में सूजन बढ़ाने वाले रसायन और हार्मोन छोड़ती है। इससे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग और उच्च कोलेस्ट्रॉल जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। अतिरिक्त चर्बी इन बीमारियों के विकास का शुरुआती कारण भी बन सकती है। क्या बीएमआई पूरी तरह बेअसर है? नहीं। बीएमआई अब भी मोटापे की पहचान का एक आसान जांच उपकरण है। हालांकि, किसी व्यक्ति के सही आकलन के लिए अन्य जांचों भी शामिल करना चाहिए।
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