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पिछले सप्ताह हमने जाना था कि जगन्नाथ पुरी के मंदिर में जगन्नाथ और बलभद्र द्वारा पहनी जाने वाली योद्धा पोशाक को ‘नागार्जुन’ कहा जाता है। इसके अलावा, हमने ओड़िया महाभारत में उल्लिखित अर्जुन और नाग कन्या के पुत्र नागार्जुन के बारे में भी जाना। आज की कड़ी में हम हिंदू आख्यानों में वर्णित नागार्जुन के अन्य स्वरूपों के बारे में जानेंगे और साथ ही यह भी उनमें क्या संदेश छिपे हुए थे।
उत्तराखंड के पंडवानी लोकगीतों में भी नागार्जुन का उल्लेख मिलता है। जैसे कि हमने पिछले सप्ताह ओड़िया महाभारत के उदाहरण में देखा, वैसे ही इन गीतों में भी अर्जुन ने नागार्जुन से इसलिए युद्ध किया क्योंकि वे अपने पिता पाण्डु के अंतिम संस्कार के लिए गेंडा प्राप्त करना चाहते थे। इन गीतों में गेंडा वास्तव में गयासुर है, जो अपने पूर्व जन्म में ब्राह्मण था और जिसने गौ-हत्या का अपराध किया था।
यह कहानी हमें खाद्य और मृत्यु के बीच के संबंध की ओर संकेत करती है। मृतकों को भी भोजन कराना आवश्यक माना गया है और भोजन के उत्पादन में जीवों की हत्या होती है। अधिक खाने और अधिक खिलाने से अधिक जीवों का वध होता है। किसी राजा के लिए इस संतुलन को समझना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि वह स्वयं भी भक्षण करता है और उससे अपेक्षा की जाती है कि वह दूसरों को भी भोजन कराए। अतः उसका दोनों पर संयम रखना ही धर्म का पालन करना है। संभवतः गेंडा राजा का एक रूपक है, जंगल का शीर्ष शाकभक्षी, जिसका कोई अन्य जीव शिकार नहीं करता।
नागार्जुन से जुड़ी एक अन्य लोककथा महाभारत की कथा-परंपरा पर आधारित है। एक लोककथा में अर्जुन के पुत्र बब्रुवाहन ने उन्हें पराजित किया। बब्रुवाहन अर्जुन और मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा के पुत्र थे। संस्कृत महाकाव्य में अर्जुन की नाग पत्नी उलूपी और उनके पुत्र इरवान का उल्लेख मिलता है।
तमिल लोक महाभारत में इरवान को अरवान कहा जाता है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में जब पाण्डवों को बताया गया कि विजय सुनिश्चित करने के लिए काली देवी को एक योद्धा की बलि देनी होगी, तब अरवान ने आत्म-बलि का निर्णय लिया। उसकी अंतिम इच्छा थी कि मृत्यु से पहले उसका विवाह हो और उसकी पत्नी उसके निधन पर शोक व्यक्त करे। चूंकि कोई स्त्री उससे विवाह के लिए तैयार नहीं हुई, इसलिए कृष्ण ने मोहिनी का रूप धारण कर उसकी दोनों इच्छाएं पूरी कीं। मृत्यु के बाद अरवान का सिर एक पेड़ पर रखा गया, ताकि वह कुरुक्षेत्र के युद्ध की घटनाओं का साक्षी बन सके। वहां से उसे समझ में आया कि यह युद्ध वास्तव में विष्णु द्वारा आयोजित था, ताकि पथभ्रष्ट राजाओं का रक्त देवी को अर्पित किया जा सके। देवी राजाओं से इसलिए क्रोधित थीं क्योंकि वे स्वयं भक्षण करते थे, पर दूसरों को भोजन नहीं कराते थे।
पेड़ पर रखे सिर की यह कथा, जिसमें वह कौरवों और पाण्डवों के युद्ध का साक्षी बनता है, राजस्थान में भी मिलती है। यहां यह सिर खाटू श्यामजी का माना जाता है। वे अर्जुन के नहीं, बल्कि भीम के पुत्र घटोत्कच और नाग कन्या अहिलावती के पुत्र हैं। उन्हें नेपाल और उत्तराखंड में बर्बरीक, ओडिशा में बेलालसेन और गुजरात में बलियादेव के नाम से जाना जाता है।
केरल में नागार्जुन की कथा ने एक अलग रूप लिया। हम जानते हैं कि शिव ने किरात रूप धारण कर अर्जुन से युद्ध किया था। केरल की लोक परंपरा के अनुसार, इसी रूप ने पार्वती को आकर्षित किया और उनके मिलन से एक शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न हुआ। यह उच्छृंखल पुत्र समाज के नियमों का पालन नहीं करता था। अंततः विष्णु ने उसे शांत किया और उसे एक स्वर्ण तलवार प्रदान की। बदले में उसने धर्म की रक्षा का वचन दिया।
उत्तर केरल में उसे वेट्टक्कोरुमाकन या किराथ-सुनु, अर्थात् किरात देवता के पुत्र के रूप में पूजा जाता है। वेट्टक्कोरुमाकन शिकारियों को यह सिखाते हैं कि शिकारी और शिकार, दोनों का सम्मान आवश्यक है और जिस पर हमारा अधिकार नहीं है, उस पर दावा नहीं करना चाहिए। यह अर्जुन के व्यवहार के विपरीत शिक्षा है, जिन्होंने अपने राजसी विशेषाधिकार का उपयोग करने का प्रयास किया।
नागार्जुन से लेकर अरवान और वेट्टक्कोरुमाकन तक, महाभारत से उपजी ये विविध लोककथाएं राष्ट्रीय कम और क्षेत्रीय अधिक हैं। इनके माध्यम से यह सुनिश्चित किया गया कि धर्म की अवधारणा पूरे भारत में प्रसारित हो सके।
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