माइक्रो-स्टेकेशन, न होटल-टिकट बुकिंग का तनाव, न भारी-भरकम बजट:  देश-दुनिया नहीं, घर के पास ही तलाश रहे लोग सुकून; दिनभर में रीचार्ज, थकान भी नहीं
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माइक्रो-स्टेकेशन, न होटल-टिकट बुकिंग का तनाव, न भारी-भरकम बजट: देश-दुनिया नहीं, घर के पास ही तलाश रहे लोग सुकून; दिनभर में रीचार्ज, थकान भी नहीं

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छुट्टियों का नाम सुनते ही दिमाग में क्या आता है…? महंगे टिकट, पासपोर्ट का झंझट, वीसा की लंबी कतारें और महीनों पहले से होटल बुकिंग। पर अब इन चिंताओं के बगैर भी छुट्टियां मनाई जा रही हैं। इस ट्रेंड का नाम है माइक्रो-स्टेकेशन’। इसका सीधा सा मतलब है… दूर देशों की उड़ान भरने के बजाय, घर से महज एक घंटे की दूरी या 50-100 किमी के दायरे में छुट्टी मनाना। बढ़ते हवाई किराए, होटल की आसमान छूती कीमतों और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के इस दौर में बड़ी संख्या में लोग दुनिया नापने के बजाय आस-पास ही सुकून तलाश रहे हैं। यह वैश्विक ट्रेंड बन चुका है। ब्रिटेन के ‘कैंपिंग एंड कैरवानिंग क्लब’ के ताजा आंकड़े बताते हैं कि घर से 50-100 किमी दूर छुट्टियां मनाने वालों में 6% की बढ़ोतरी हुई है। लोग अब लंदन से स्पेन जाने के बजाय पास के शांत शहरों को चुन रहे हैं। यही रुझान अमेरिका में भी दिख रहा है, जहां न्यूयॉर्क व सैन फ्रांसिस्को के लोग ट्रैफिक और महंगी फ्लाइट से बचकर पास के वाइनयार्ड्स या केबिन्स में वीकेंड बिताते हैं। भारत में भी लोग वीकेंड पर शहर से 40-50 किमी दूर फार्महाउस, हेरिटेज विलेज या रिजॉर्ट में सुकून पाने जा रहे हैं। एयरबीएनबी के आंकड़े बताते हैं कि लोग अब हैरो, स्टर्लिंग या भारत के छोटे कस्बों जैसे गैर-पारंपरिक ठिकानों को चुन रहे हैं। ये जगहें बड़े शहरों के पास हैं, बजट में आती हैं और खुली जगह भी आसानी से मिलती है। इस बदलाव के पीछे बड़ा कारण ‘बजट’ व ‘समय की कमी’ है। टूरिज्म एक्सपर्ट रेबेका हम्फ्री कहती हैं बजट, समय और सुकून तीनों जहां साथ मिलें, असली छुट्टी तो वही है। खूबसूरत जगहें दूर नहीं, बल्कि करीब ही होती हैं। कई बार हम उन जादुई जगहों के बारे में जानते भी नहीं। कभी-कभी तनाव भी लाती हैं लंबी और दूर की यात्राएं मनोवैज्ञानिक सारा जेनकिंस कहती हैं लंबी और दूर की यात्राएं नया तनाव लेकर आती हैं-हर जगह तस्वीरें खींचना, प्रसिद्ध जगहों पर लाइन में लगना और खुद को थका देना। जबकि घर से एक घंटे दूर जाने पर ‘अपेक्षाओं का बोझ’ नहीं होता। वहां कोई मशहूर टूरिस्ट स्पॉट नहीं होता, इसलिए बिना दबाव के आराम करते हैं, किताबें पढ़ते हैं या सोते हैं। यह मानसिक रीचार्ज के लिए थेरेपी जैसा है।’



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