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- Minhaj Merchant’s Column – To Make Cities ‘smart’, Fix Accountability For Them.
9 घंटे पहले
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मिन्हाज मर्चेंट, लेखक, प्रकाशक और सम्पादक
सरकार ने 2015 में जब 100 स्मार्ट सिटी विकसित करने की योजना घोषित की थी तो उससे जनता की अपेक्षाएं बहुत अधिक थीं। लोग दशकों से जर्जर बुनियादी ढांचे, गड्ढों से भरी सड़कों, ट्रैफिक जाम और भ्रष्टाचार झेलते आ रहे थे। स्मार्ट सिटीज मिशन ने हालात बदलने का वादा किया था। लेकिन अब तक तो ऐसा नहीं हो पाया है।
ये सच है कि एक्सप्रेस-वे, मेट्रो, पुल, सुरंगें और सी-लिंक जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए गए हैं, लेकिन इनमें खामियां भी सामने आ रही हैं। नए पुल ढह जाते हैं, एक्सप्रेस-वे में दरारें पड़ जाती हैं और सुरंगों में पानी भर जाता है। स्मार्ट सिटीज मिशन के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वच्छता, सार्वजनिक सेवाओं में विश्वस्तरीय सुविधाएं देने और समस्याओं पर डिजिटल माध्यम से कार्रवाई के प्रावधान थे।
2020-2021 में कोविड ने इसके कामकाज को बेपटरी कर दिया। 2023-2024 में सरकार का ध्यान चुनावों पर चला गया। 2025 में मिशन की दसवीं वर्षगांठ पर सरकार ने अपना बचाव करते हुए कहा था कि ‘शहरों का विकास अब एरिया-बेस्ड डेवलपमेंट (एबीडी) के नजरिए से किया जा रहा है, जिसमें सभी 100 शहरों ने टारगेटेड तरीके से विकास कार्यों के लिए कुछ तयशुदा क्षेत्रों का चयन किया है। जनभागीदारी से चुने गए एबीडी क्षेत्रों को ऐसे मॉडल पर विकसित किया जा रहा है, जिसे शहर के बाकी हिस्सों में भी लागू किया जा सके।
इसके अलावा, हर शहर में पैन-सिटी प्रोजेक्ट भी शामिल किए गए हैं, जिनमें बुनियादी ढांचे और सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए तकनीक आधारित समाधान अपनाए जा रहे हैं।’ कागज पर यह सब प्रभावी लगता है। धरातल पर कई क्षेत्रों में प्रगति भी दिखती है। मिशन के 100 में से 28 शहरों में पेयजल सप्लाई बेहतर हुई और नल के जरिए जलापूर्ति वाले घरों की संख्या भी 2014 के 17% से बढ़कर 2026 में 80% हो गई। इंदौर जैसे शहर बेहद साफ-सुथरे हैं और मिशन की रैंकिंग में लगातार पहले स्थान पर रहे हैं।
लेकिन दर्जनों शहर ऐसे भी हैं, जहां अब भी खराब आवास-व्यवस्था, बदहाल सड़कें, कूड़ा-करकट और भ्रष्टाचार बड़ी समस्या बना हुआ है। भले ही स्मार्ट सिटीज मिशन भारत की शहरी समस्याओं से निपटने की अच्छी शुरुआत हो, लेकिन असल सुधारों की जरूरत राजनीतिक स्तर पर है। जब तक शहरों और कस्बों को राज्य सरकारों की निगरानी से आजाद करके उन्हें स्वायत्तता और जवाबदेही नहीं दी जाती, तब तक भारत के शहर बदहाल ही रहेंगे।
मसलन, मुंबई की मेयर के पास नगरीय प्रशासन की कोई शक्तियां नहीं हैं। मेयर का निर्वाचन भी वहां की जनता नहीं करती, बल्कि राज्य में सत्तारूढ़ दल ही उसे चुनते हैं। भारत के सबसे अमीर नगरीय निकाय बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के कमिश्नर नौकरशाह होते हैं। इनमें कई अधिकारी तो बहुत अच्छा काम भी करते हैं, लेकिन उनका कार्यकाल दो साल से भी कम का होता है। तबादला हुआ तो पीछे छूट गई व्यवस्था में स्थायी सुधार करने का उनका प्रोत्साहन भी जाता रहता है।
राजनेताओं, नौकरशाहों और ठेकेदारों की मिलीभगत से ऐसी सड़कें बनाई जाती हैं, जो जल्द खराब हो जाएं। इनमें जानबूझकर घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि उन्हें हर साल मरम्मत की जरूरत पड़े। फिर रिश्वतखोरी का खेल चलता है। मुंबई-गोवा और नासिक की सड़कों की हालत इस बात का प्रमाण है कि राजनेता-नौकरशाह-ठेकेदार गठजोड़ ने भारत के बुनियादी ढांचा विकास को कैसे कमजोर किया है।
लंदन और न्यूयॉर्क में मेयर का चुनाव जनता के वोट से होता है। ये मेयर नागरिकों के प्रति जवाबदेह होते हैं। न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी उन बहुत-से मेयरों में से एक हैं, जिन्होंने न्यूयॉर्क को बदला है। 1970 और 1980 के दशक में न्यूयॉर्क की छवि एक खस्ताहाल शहर की थी। टाइम्स स्क्वायर अपराध और फूहड़पन का अड्डा बन गया था।
इसके बाद रूडी जूलियानी, माइकल ब्लूमबर्ग, बिल डी ब्लासियो और अब ममदानी जैसे मेयरों ने शहर को स्वच्छ बनाया, अपराध कम किया और रिकॉर्ड संख्या में पर्यटकों को आकर्षित किया। जबकि मुंबई में रितु तावड़े निर्वाचित नहीं हुईं, उनका चयन किया गया है। शहर की गड्ढों भरी सड़कों या जर्जर इमारतों के प्रति उनकी सीधी जिम्मेदारी नहीं है। यही वजह है कि मुंबई 100 स्मार्ट शहरों की सूची में निचले पायदान पर है। इस स्थिति को बदलने के लिए भारत के हर शहर में निर्वाचित मेयर होने चाहिए, जो उन्हें वोट देने वाले नागरिकों के प्रति जवाबदेह हों।
- असल सुधारों की जरूरत राजनीतिक स्तर पर है। जब तक शहरों के नेतृत्व को राज्य सरकारों की निगरानी से आजाद करके लंदन और न्यूयॉर्क के मेयरों जैसी स्वायत्तता और जवाबदेही नहीं दी जाती, तब तक वे बदहाल ही बने रहेंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)








