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- Syed Ata Hasnain’s Column – Several Countries Have An Interest In Pakistan For Various Reasons.
7 घंटे पहले
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सैयद अता हसनैन बिहार के राज्यपाल और कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर
पाकिस्तान गंभीर संकटों से घिरा है। आर्थिक स्थिति कमजोर है, राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है, बलूचिस्तान में अलगाववाद बढ़ रहा है, खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के हमले तेज हो गए हैं और पीओके में भी असंतोष सामने आने लगा है। तो क्या पाकिस्तान अब टूटने के कगार पर है? पाकिस्तान के सामने असल चुनौती उसकी संघीय व्यवस्था की है। वह अनेक भाषाओं, जातीय समूहों और क्षेत्रीय पहचानों से मिलकर बना है। इतने विविध समाज को एक सूत्र में बांधने का काम वहां लोकतांत्रिक संस्थाओं से अधिक सेना ने किया है।
लेकिन किसी भी राष्ट्र की स्थायी एकता ताकत नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और राजनीतिक सहमति पर टिकी होती है। आज बलूचिस्तान में लोग राजनीतिक अधिकारों की मांग कर रहे हैं। खैबर पख्तूनख्वा आतंकवाद और सुरक्षा अभियानों के बीच लगातार अशांत है। सिंध में समय-समय पर क्षेत्रीय पहचान का प्रश्न उभरता रहता है, जबकि मुहाजिर समुदाय भी अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर असंतुष्ट रहा है।
अब पीओके में भी आर्थिक मुद्दों से शुरू हुआ जन-आंदोलन शासन व्यवस्था और इस्लामाबाद के नियंत्रण पर सवाल उठाने लगा है। इनमें से कोई भी अकेले पाकिस्तान की अखंडता के लिए तत्काल खतरा नहीं है। लेकिन जब इतने मोर्चों पर असंतोष एक साथ दिखाई दे, तो यह स्पष्ट संकेत होता है कि संघीय ढांचे के भीतर गंभीर दरारें मौजूद हैं। फिर भी पाकिस्तान आज तक कैसे टिका है?
इसका सबसे बड़ा कारण उसकी आंतरिक मजबूती नहीं, बल्कि सामरिक महत्व है। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति उसे दक्षिण एशिया, मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र के बीच महत्वपूर्ण कड़ी बनाती है। उसके पास परमाणु हथियार हैं और उसकी सीमाएं संवेदनशील क्षेत्रों से जुड़ी हैं। यही कारण है कि बड़ी ताकतें पाकिस्तान के पूर्ण पतन का जोखिम उठाना नहीं चाहतीं। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने उसे अपना सहयोगी बनाया था।
अफगान युद्ध और उसके बाद आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक अभियान में भी पाकिस्तान की उपयोगिता बनी रही। आर्थिक संकटों के बावजूद आईएमएफ सहित कई संस्थाओं ने बार-बार उसकी आर्थिक सहायता की। पाकिस्तान को अब तक आईएमएफ से अनेक राहत पैकेज मिल चुके हैं। यह आर्थिक ही नहीं, भू-राजनीतिक निर्णय भी रहे हैं। आज चीन पाकिस्तान का सबसे बड़ा रणनीतिक साझेदार है।
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपेक) केवल एक आर्थिक परियोजना नहीं, बल्कि चीन की दीर्घकालिक सामरिक योजना का हिस्सा है। इसके माध्यम से चीन अरब सागर तक पहुंच बनाना चाहता है और भारत पर रणनीतिक दबाव बनाए रखना भी उसके हित में है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि बाहरी निवेश किसी देश की अर्थव्यवस्था को सहारा दे सकता है, उसकी राष्ट्रीय एकता नहीं बना सकता।
अमेरिका की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं, फिर भी वह पाकिस्तान को पूरी तरह अस्थिर नहीं देखना चाहता। उसकी चिंता परमाणु हथियारों की सुरक्षा, आतंकवाद और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ी है। वहीं सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देशों के लिए भी पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदार बना हुआ है। अलग-अलग कारणों से कई देश पाकिस्तान में रुचि रखते हैं।
लेकिन बाहरी सहयोग पाकिस्तान की आंतरिक समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं है। पाकिस्तान का नेतृत्व अकसर अपनी आंतरिक विफलताओं का दोष बाहरी शक्तियों- विशेषकर भारत पर डालने का प्रयास करता है। इससे कुछ समय के लिए घरेलू राजनीति में लाभ मिल सकता है, लेकिन शासन, अर्थव्यवस्था और जनता की वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं होता।
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वह न तो पाकिस्तान की कमजोरियों पर अत्यधिक उत्साहित हो और न ही उसे कमतर आंके। एक अस्थिर पाकिस्तान भारत के लिए भी नई चुनौतियां पैदा कर सकता है। परमाणु सुरक्षा, सीमापार आतंकवाद, शरणार्थियों का दबाव और चीन की बढ़ती भूमिका जैसे अनेक जोखिम हमारे सामने आ सकते हैं। इसलिए भारत की नीति भावनाओं के बजाय यथार्थवादी रणनीति पर आधारित होनी चाहिए। हमें पाकिस्तान के टूटने की भविष्यवाणियों में उलझने के बजाय इस संभावना के लिए तैयार रहना चाहिए कि वह भीतर से कमजोर होते हुए भी बाहरी शक्तियों के कारण लंबे समय तक बना रह सकता है।
- क्या पाकिस्तान सेना और विदेशी सहयोग के सहारे चलने के बजाय अपने नागरिकों के विश्वास पर आधारित देश बन पाएगा? जब तक इसका उत्तर नहीं मिलता, उसकी आंतरिक कमजोरी और सामरिक उपयोगिता- दोनों बनी रहेंगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)








