मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:  75 वर्ष के पीएम मोदी के सामने हैं ये 8 बड़ी चुनौतियां
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मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम: 75 वर्ष के पीएम मोदी के सामने हैं ये 8 बड़ी चुनौतियां

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5 घंटे पहले

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मिन्हाज मर्चेंट लेखक, प्रकाशक और सम्पादक - Dainik Bhaskar

मिन्हाज मर्चेंट लेखक, प्रकाशक और सम्पादक

नरेंद्र मोदी 63 वर्ष की आयु में प्रधानमंत्री बने थे और अब वे 75 वर्ष के हैं। उनके जन्मदिन पर उनके 11 वर्षों से अधिक के कार्यकाल की उपलब्धियों का तो व्यापक विश्लेषण हो चुका है। लेकिन उनके तीसरे कार्यकाल के शेष 44 महीनों में उनके सामने प्रमुख 8 चुनौतियां कौन-सी हैं? आइए, इन्हें समझें।

1. रोजगार और महंगाई पर विशेष ध्यान होना चाहिए। इंडिया टुडे के एक ताजा राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में मतदाताओं के बीच यही दो सबसे बड़ी चिंताएं सामने आई थीं। हालांकि महंगाई दर 3% से नीचे आ गई है और खाने-पीने की चीजों की कीमतें भी कम हुई हैं, लेकिन वेतनमानों में आई अवरुद्धता ने इन लाभों को कम कर दिया है। अच्छी तनख्वाह वाले रोजगारों की किल्लत है। तिस पर, अब एआई भी प्राथमिक स्तर की कोडिंग नौकरियों पर कुठाराघात कर रहा है। आईटी कंपनियां छंटनी कर रही हैं या नई नौकरियां चाहने वालों का वेतन कम कर रही हैं। अमेरिकी टैरिफ ने कपड़ा श्रमिकों, रत्न व आभूषण उद्योग और चमड़ा उद्योग जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को प्रभावित किया है। भारत-अमेरिका ट्रेड वार्ता फिर शुरू होने से सम्भव है हाई टैरिफ ज्यादा दिन न रहें, लेकिन दीर्घकालिक समाधान तो हमारी वर्कफोर्स की उत्पादकता में सुधार से ही होगा।

2. भ्रष्टाचार महामारी के स्तर पर पहुंच गया है। खासकर, राज्य और नगरपालिकाओं के स्तर पर। पीएम की भ्रष्टाचार-मुक्त छवि तो बरकरार है। लेकिन उन्हें नगरीय निकायों में भ्रष्टाचार कम करने के लिए सख्ती दिखानी होगी, जिस कारण देश में आए दिन पुल ढह रहे हैं, सड़कों में गड्ढे हैं, साफ-सफाई खस्ताहाल है। तीसरे कार्यकाल में यह उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए।

3. अमेरिका और चीन के साथ मोदी की संतुलित रणनीति ने भारत को एक परिवर्तनशील ताकत के रूप में स्थापित किया है। भारत में नए अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर की नियुक्ति संबंधी कार्यक्रम में विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि भारत आज अमेरिका के सबसे महत्वपूर्ण रिश्तों में से एक है। 21वीं सदी की कहानी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में लिखी जाएगी और भारत इसके केंद्र में है। ट्रम्प के करीबी गोर ने यह भी कहा कि हम टैरिफ को लेकर समझौते से बहुत दूर नहीं हैं। उधर चीन भी भारत के प्रति गर्मजोशी दिखा रहा है। लेकिन वह अवसरवादी दोस्त है। अमेरिका और चीन के साथ सुनियोजित भू-राजनीतिक रणनीति अपनानी पड़ेगी।

4. पाकिस्तान दीर्घकालीन समस्या है। ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के सैन्य हवाई ठिकाने और आतंकवादी शिविर बर्बाद हो गए थे। अब उसने क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण शुरू कर दिया है। पाकिस्तान के कट्टर सैन्य प्रमुख असीम मुनीर एक अप्रत्याशित फैक्टर बने हुए हैं। मोदी के​ लिए यह अनिवार्य है कि वे पाकिस्तान पर लगातार सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बनाए रखें।

5. मोदी की मणिपुर यात्रा भले ही विलंब से हुई, लेकिन अब ना सिर्फ उस राज्य को विकास के लिए पैसा मुहैया कराना होगा, बल्कि मैतेई और कुकी समुदायों के बीच शांति का स्थायी हल भी निकालना होगा। अगले छह महीनों में चार प्रमुख राज्यों में चुनाव होने हैं। नवंबर में बिहार और अगले साल अप्रैल में असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु। मोदी को राहुल गांधी द्वारा शुरू किए गए ‘वोट चोरी’ अभियान को भी बेअसर करना पड़ेगा। तमिलनाडु और बंगाल के परिणामों का देशव्यापी असर होगा। दोनों राज्यों में सत्ताविरोधी लहर है, लेकिन मजबूत क्षेत्रीय वोट बैंक भी हैं।

6. अत्यधिक नियम थोपना मोदी कार्यकाल की एक कमी रही है। आरबीआई से सेबी तक, नौकरशाही ही हर प्रमुख संस्थान को चला रही है। ईज ऑफ डुइंग बिजनेस के बजाय नियम-कायदों की अधिकता जटिलताओं को बढ़ाती है। मोदी को जल्द ही लालफीताशाही को खत्म करने के कदम उठाने होंगे।

7. मोदी सरकार के तीनों कार्यकालों में धीमा और अप्रभावी संवाद एक बड़ी कमी रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान और उसके बाद यह स्पष्ट तौर पर दिखा था। इससे विरोधियों को फायदा मिलता है। प्रधानमंत्री कार्यालय को एक बेहतर मीडिया निदेशक चाहिए, जो महत्वपूर्ण नीतियों और घटनाओं पर तत्काल मीडिया ब्रीफिंग की हैसियत रखता हो। पुष्ट सूचनाओं के अभाव में दुष्प्रचार हावी हो जाता है।

8. 2029 के लोकसभा चुनाव में एनडीए का नेतृत्व करते वक्त मोदी 79 वर्ष के होंगे। यदि वे जीते तो संभावित चौथे कार्यकाल के अंत तक 84 के होंगे। मोदी भारत के सबसे फिट प्रधानमंत्रियों में से एक हैं। लेकिन हर नेता को अपने उत्तराधिकार की रूपरेखा पर भी विचार करना चाहिए।

  • रोजगार और महंगाई पर प्रधानमंत्री का विशेष ध्यान होना चाहिए। भ्रष्टाचार कम करने के लिए सख्ती दिखानी भी जरूरी है। विदेश नीति के मोर्चे पर संतुलित रणनीति की दरकार है। हमारे लिए दुनिया के सामने अपना नैरे​टिव स्पष्ट करना भी जरूरी है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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