मुजीब मशाल का कॉलम:  भारत अमेरिका से और पाकिस्तान चीन से हथियार ले रहा है
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मुजीब मशाल का कॉलम: भारत अमेरिका से और पाकिस्तान चीन से हथियार ले रहा है

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10 घंटे पहले

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मुजीब मशाल द न्यूयॉर्क टाइम्स के साउथ एशिया ब्यूरो चीफ - Dainik Bhaskar

मुजीब मशाल द न्यूयॉर्क टाइम्स के साउथ एशिया ब्यूरो चीफ

भारत को पश्चिमी देशों और पाकिस्तान को चीन की सैन्य मदद बढ़ने से वैश्विक गठबंधनों में बदलाव के संकेत मिलते हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय तनाव भड़कने की एक अन्य जमीन तैयार हो गई है। पिछली बार 2019 में भारत और पाकिस्तान के बीच टकराव के समय अमेरिकी अधिकारियों को दोनों देशों में परमाणु हथियारों की हलचल नजर आई थी।

इससे अमेरिका फौरन सक्रिय हुआ। विदेश सचिव माइक पोम्पियो ने आधी रात दोनों पक्षों को फोन पर समझाया कि वे परमाणु युद्ध की तैयारियां न करें। पोम्पियो ने अपने संस्मरणों में इस वाकये का जिक्र किया है। शुरुआती झड़प के बाद वह टकराव जल्द ही ठंडा पड़ गया था। लेकिन पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा 26 भारतीय पर्यटकों की हत्या के बाद दोनों देश फिर से सैनिक टकराव में उलझ गए हैं।

भारत परंपरागत रूप से गुटनिरपेक्ष देश रहा है। लेकिन अब वह अमेरिका के प्रति अपनी हिचक छोड़कर अमेरिका और पश्चिमी देशों से अरबों रुपए के हथियार खरीद रहा है। वहीं भारत ने शीतयुद्ध के दौर के अपने सहयोगी रूस से हथियारों की खरीद में भारी कटौती की है।

अफगानिस्तान में युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिका के लिए पाकिस्तान की उपयोगिता कम हो गई है। वह अब अमेरिकी हथियार नहीं खरीदता है। इसके बजाय पाकिस्तान अपना अधिकतर फौजी साज-सामान चीन से खरीद रहा है। इस हलचल ने दक्षिण एशिया में महाशक्तियों की राजनीति को नया मोड़ दिया है।

अमेरिका ने चीन का मुकाबला करने के लिए भारत को पार्टनर बनाया है। वहीं चीन ने पाकिस्तान पर अपना हाथ रखा है। ‌‌वह वहां भारी निवेश कर रहा है। इसके साथ अभी हाल के वर्षों में भारत और चीन के बीच रिश्ते बिगड़े हैं। दोनों की सेनाओं में झड़पें हो चुकी हैं।

दक्षिण एशिया में सैन्य-टकरावों के इतिहास से स्थिति पेचीदा हो सकती है। भारत-पाकिस्तान के बीच कई बार फौजी तनातनी को देखते हुए स्थिति हाथ से बाहर निकलने का खतरा है। पूर्व राजनयिक एशली टेलिस का कहना है, भारत के सुरक्षा हितों में अमेरिका की अहम भूमिका है। दूसरी ओर पाकिस्तान के लिए चीन की ऐसी ही स्थिति है। पाकिस्तान से तनाव के बीच इस बार अमेरिका भारत के ज्यादा नजदीक है।

22 अप्रैल को पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ट्रम्प और वेंस से बात कर चुके हैं। ट्रम्प प्रशासन के कई अधिकारियों द्वारा भारत का समर्थन करने से नई दिल्ली में कई अधिकारी मानते हैं कि अमेरिका ने पाकिस्तान के खिलाफ बदले की कार्रवाई के लिए भारत को हरी झंडी दे दी है।

स्थिति में बदलाव का एक संकेत रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन की परिदृश्य में गैरमौजूदगी से भी मिलता है। आतंकवादी हमले के बाद दुनिया के एक दर्जन से अधिक नेताओं ने मोदी को टेलीफोन किए हैं। हमले के एक हफ्ते बाद रूस के विदेश मंत्री ने भारतीय विदेश मंत्री से बात की।

अधिकारियों का कहना है, मोदी और पुतिन के बीच इस सप्ताह बात हुई है। उधर चीन ने पाकिस्तान के लिए अपना खुला समर्थन जाहिर किया है। पूर्व अमेरिकी डिफेंस अधिकारी लिंडसे फोर्ड की टिप्पणी पर गौर कीजिए। वे कहते हैं, भविष्य में भारत अमेरिकी और यूरोपीय हथियारों और पाकिस्तान चीनी हथियारों से लड़ेंगे। बीते दशक में यह पैटर्न उभरा है।

किसी समय अमेरिका पाकिस्तान का सबसे बड़ी फौजी सप्लायर था। चीन दूसरे नंबर पर था। अमेरिका के मुंह मोड़ने से पाकिस्तान ने चीन की तरफ रुख किया। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इस्टीट्यूट के अनुसार 2000 के दशक के मध्य में पाकिस्तान के 38% हथियारों की सप्लाई चीन करता था। पिछले चार वर्षों में उसने 80% हथियार दिए हैं।

उधर भारत ने भी रूस पर निर्भरता कम की है। 2006 से 2010 के बीच भारत के 80% प्रमुख हथियार रूस से आए थे। पिछले चार वर्षों में यह आंकड़ा 38% रह गया है। भारत ने आधे से ज्यादा हथियार अमेरिका और उसके इजराइल, फ्रांस जैसे सहयोगी देशों से हासिल किए हैं। पाकिस्तान के लिए एकमात्र अपवाद अमेरिका के एफ-16 विमान हैं।

2019 के बाद भारत अपनी सेनाओं के आधुनिकीकरण पर अरबों रुपए खर्च कर रहा है। पाकिस्तान से टकराव के साथ भारत के सामने चीन ज्यादा बड़ा खतरा है। वह पाकिस्तान की भी मदद कर रहा है। अमेरिकी अधिकारियों को चिंता है कि आपसी संदेह और छोटी-सी गलती या आदेशों के दायरे से बाहर जाकर कार्रवाई किए जाने से संघर्ष का विनाशकारी विस्तार हो सकता है।

(द न्यूयॉर्क टाइम्स से)

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