2 मिनट पहले
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सवाल: मैं गे हूं और मेरे घरवालों को ये बात पता नहीं है। मेरी उम्र 34 साल है। मैं दिल्ली में रहता हूं और एक एडवर्टाइजिंग कंपनी में कॉपी राइटर हूं। घरवाले काफी समय से मुझ पर शादी के लिए दबाव बना रहे थे, जिसे मैं कुछ-न-कुछ बहाना करके टाल देता था। फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि मेरे घर में सबकुछ बदल गया। दिल्ली के एक अखबार में प्राइड परेड की फोटो छपी थी। उस फोटो में सबसे आगे जिसकी तस्वीर थी, वो मैं था। आंखों पर मास्क लगा था, लेकिन मेरी मां ने देखते ही पहचान लिया कि वो मैं ही हूं। मम्मी-पापा एक महीने के लिए दिल्ली आए थे, लेकिन फोटो छपने के बाद वो अगले ही हफ्ते कानपुर वापस लौट गए। उस दिन के बाद से उन्होंने मुझे शादी के लिए कहना भी बंद कर दिया। उन्होंने मुझसे तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उस दिन के बाद से हमारे बीच एक अजीब सी मुर्दनी छा गई है। पापा मुझसे बहुत फॉर्मल बात करते हैं। मम्मी बात करती हैं, लेकिन उनकी भी टोन बदल गई है। इससे अच्छा तो वो मुझसे पूछ लेते, डांट लेते, लड़ लेते, लेकिन उनकी ये अजीब सी चुप्पी और दूरी मुझे ज्यादा तकलीफ पहुंचा रही है। कानून ने तो हम समलैंगिकों को अधिकार दे दिया, लेकिन हमारे घरों में आज भी ये एक टैबू ही है। पिछले 6 महीने से मेरी भूख, प्यास, नींद सब खराब हो गई है। मैं क्या करूं। घरवालों से कैसे बात करूं।
एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।
जवाब– मैं आपकी परेशानी समझ सकता हूं। यह स्थिति किसी के लिए भी बहुत मुश्किल और तकलीफदेह हो सकती है। 30 सालों से एक मनोचिकित्सक के तौर पर, खासकर समलैंगिक व्यक्तियों और भारतीय परिवारों के साथ काम करते हुए मैंने ऐसे कई मामले देखे हैं, जहां सायलेंस और रिजेक्शन, खुले टकराव से भी ज्यादा चुभता है। आपकी कहानी बताती है कि भारतीय परिवारों में आज भी समलैंगिकता एक बड़ा टैबू है। इसे सहजता से स्वीकार करना आज भी बहुत मुश्किल है। कानून ने भले ही अधिकार दे दिए हों, लेकिन सामाजिक और पारिवारिक मानसिकता को बदलने में समय लगता है।

आपकी वर्तमान स्थिति का आंकलन
आपकी मौजूदा स्थिति के कई महत्वपूर्ण पहलू हैं:
अचानक ‘खुलासा’: ‘प्राइड परेड’ की तस्वीर के जरिए आपकी पहचान का अचानक सामने आ जाना एक इत्तेफाक था। यह आपके नियंत्रण से बाहर था। आपको यह मौका नहीं मिला कि आप पूरी मानसिक, भावनात्मक तैयारी के साथ खुद ये बात अपने पेरेंट्स को बताते। आपका परिवार भी इस सच का सामना करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। यह सबकुछ इतना अप्रत्याशित था कि सबको शॉक लगा।
पारिवार की चुप्पी और दूरी: आपके माता-पिता का सीधे सवाल न पूछना, लेकिन उनकी बदलती टोन और व्यवहार एक गहरी चुप्पी का संकेत है। यह चुप्पी अक्सर शॉक, निराशा, भ्रम और शायद शर्मिंदगी के कारण होती है। उनकी तरफ से यह एक प्रोटेक्टिव मैकेनिज्म हो सकता है क्योंकि वे नहीं जानते कि इस स्थिति को कैसे संभालें।
इमोशनल इफेक्ट: पिछले 6 महीनों से आपकी भूख, प्यास और नींद का प्रभावित होना स्पष्ट रूप से चिंता, तनाव और उदासी के लक्षण हैं। यह एक संकेत है कि आपको इमोशनल सपोर्ट और गाइडेंस की सख्त जरूरत है।
कानूनी अधिकार बनाम सामाजिक हकीकत: जैसा कि आपने कहा, कानून ने तो अधिकार दे दिया है, लेकिन सामाजिक मान्यता और पारिवारिक स्वीकृति के बीच अभी भी बड़ा अंतर है। भारतीय संदर्भ में, जहां विवाह और संतानोत्पत्ति को जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है, वहां समलैंगिकता को अक्सर वंश परंपरा को तोड़ने या परिवार के ‘सम्मान’ पर धब्बे की तरह देखा जा सकता है।
खुद को बेहतर समझने के लिए सेल्फ स्क्रीनिंग टूल
आगे बढ़ने से पहले मैं आपको खुद को बेहतर समझने के लिए एक सेल्फ स्क्रीनिंग टूल दे रहा हूं। इसके चार हिस्से हैं और हर हिस्से में 5-6 सवाल हैं। इन सवालों को आपको 1 से 4 के स्केल पर रेट करना है। 1 का मतलब है कि आप बहुत स्ट्रांगली असहमत हैं और 4 का मतलब है कि स्ट्रांगली सहमत हैं। इसके बाद अपना स्कोर चेक करना है। सवाल नीचे ग्राफिक हैं। पहले स्कोर चार्ट को देखिए और फिर सभी सवालों के जवाब दीजिए। इसके बाद हम स्कोर का इंटरप्रिटेशन करेंगे।
स्कोर चार्ट
1- थोड़ा असहमत
2- स्ट्रांगली असहमत
3- थोड़ा सहमत
4- स्ट्रांगली सहमत

स्कोर इंटरप्रिटेशन
- पार्ट 1 के सवालों में अगर 1, 2, 4 सवाल में आपका स्कोर हाई है तो इसका मतलब है कि आप खुद को सहजता और विश्वास से स्वीकार करते हैं।
- कम स्कोर (Q3, Q6) बताते हैं कि आप समलैंगिकता को लेकर अपराध बोध से घिरे हैं।
- पार्ट 2 में हाई स्कोर डर और चिंता का संकेत है।
- पार्ट 3 में हाई स्कोर का मतलब है कि आप क्लोजेट से बाहर आने और खुद को एक्सप्रेस करने के लिए तत्पर हैं।
- कम स्कोर का मतलब है कि आपको खुद पर काम करने की जरूरत है।
- पार्ट 4 में उच्च स्कोर का मतलब है कि सोशल और फैमिली की बाधाएं बहुत ज्यादा हैं। यहां भी आपको खुद पर काम करने के साथ-साथ प्रोफेशनल हेल्प की जरूरत पड़ सकती है ।
अपनी हेल्प कैसे करें
सायलेंस को बातचीत में कैसे बदलें
जीवन की सभी दुखद, विपरीत परिस्थितियों में सबसे जरूरी होता है, समस्या को पहचानकर उसे दूर करने के लिए जरूरी कदम उठाना। यहां हम आपको दो स्टेप्स में सेल्फ हेल्प का पूरा प्लान दे रहे हैं। इसे ध्यान से पढ़कर फॉलो करें।
स्टेप 1
अपनी भावनाओं को समझना और रेगुलेट करना (शुरू के 2-4 सप्ताह)
1. अपनी भावनाओं को पहचानें: आप इस समय कैसा महसूस कर रहे हैं? गुस्सा, दुख, अकेलापन, अपराधबोध, निराशा? इन सभी भावनाओं को पहचानें और स्वीकार करें।
क्यों जरूरी: भावनाओं को दबाने से वे और बढ़ती हैं। पहचानना उन्हें संभालने का पहला कदम है ।
क्या करें: जर्नल लिखें। अपनी भावनाओं को कागज पर उतारें। दुख, गुस्सा, निराशा, गिल्ट, खुशी जो भी महसूस हो, उसे शब्दों में दर्ज करें। अपनी हर फीलिंग को पहचानें और स्वीकार करें।
2. अपनी जरूरतों पर ध्यान दें: फूड, स्लीप, हेल्थ का ख्याल रखने जैसी बुनियादी जरूरतों को प्रिऑरिटी पर रखें।
क्यों जरूरी: भूख, प्यास और नींद का गड़बड़ होना गंभीर है। इससे इमोशनल हेल्थ के साथ फिजिकल हेल्थ भी गड़बड़ हो सकती है। अच्छी नींद और पोषण आपको भावनात्मक रूप से मजबूत बनाएंगे।
क्या करें:
- एक नियमित दिनचर्या बनाने की कोशिश करें।
- खाने और सोने का समय तय करें।
- भले ही आपको भूख न लगे, कुछ हल्का जरूर खाएं।
- इमोशनल ओवर ईटिंग से बचें।
- दुखी महसूस करने के कारण जंक फूड न खाएं।
- बिस्तर पर जाने से पहले गैजेट्स से दूर रहें।
3. अपना सपोर्ट सिस्टम बनाएं: दिल्ली में LGBTQ+ समुदाय के ग्रुप से जुड़ें। उन लोगों से दोस्तियां करें, जिनकी कहानी आप जैसी है। जो जीवन में ऐसे ही अनुभवों से गुजरे हैं।
क्यों जरूरी: इससे आपको महसूस होगा कि आप अकेले नहीं हैं। दूसरों के अनुभवों से सीखना और अपने अनुभव साझा करना इमोशनली मजबूत बनाता है।
क्या करें:
- सोशल मीडिया पर ऐसे ग्रुप ढूंढें और उनसे जुड़ें।
- उनकी ग्रुप एक्टिविटीज में हिस्सा लें।
- अपने कॉज से जुड़े सोशल इवेंट्स में हिस्सा लें।
- घर पर हमविचार दोस्तों, लोगों को बुलाएं।
- साथ मिलकर कोई क्रिएटिव एक्टिविटी करें।
4. सेल्फ कंपैशन की प्रैक्टिस करें: अपने साथ कठोर न हों। यह आपकी गलती नहीं है कि आप गे हैं और न ही यह आपकी गलती है कि आपकी तस्वीर छपी। खुद को माफ करें और अपने प्रति दयालु रहें।
क्यों जरूरी: जब हम खुद को एक्सेप्ट करते हैं और खुद की रिस्पेक्ट करते हैं तो बहुत सारा तनाव और भावनात्मक उलझनें अपने आप कम हो जाती हैं।
क्या करें: रोज रात में सोने से पहले डायरी लिखें।
- चार बातें, जो आपको अपने बारे में अच्छी लगती हैं।
- दिन भर की वो अच्छी बातें, जिनसे आपके चेहरे पर मुस्कान आई।
- समलैंगिकों की प्रेरक कहानियां पढ़ें और फिल्में देखें।
- सेक्शुएलिटी से जुड़ा विज्ञान पढ़ें और खुद को ज्यादा-से-ज्यादा एजूकेट करें।

स्टेप 2
पेरेंट्स के साथ बातचीत की शुरुआत कैरे करें (4-8 सप्ताह)
1. अपने सेल्फ प्रोटेक्शन का आंकलन करें:
- क्या आप आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं?
- क्या आपके पास रहने के लिए अपना घर है?
- क्या आप किसी भी क्रिटिकल सपोर्ट के लिए परिवार पर निर्भर हैं?
- क्या आपकी जॉब सुरक्षित है?
क्यों जरूरी: भावनात्मक बातचीत शुरू करने से पहले अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना सबसे महत्वपूर्ण है।
2. बातचीत का मसौदा तैयार करें: एक कागज पर लिखकर और आईने के सामने बोलकर रियाज करें। आप अपने माता-पिता से क्या और कैसे बात करना चाहते हैं।
क्या कहें:
- उन्हें साफ बताएं कि आप गे हैं।
- उन्हें बताएं कि यह आपका चुनाव नहीं है। यह प्राकृतिक है।
- उन्हें बताएं कि आप उन्हें प्यार करते हैं और यह रिश्ता आपके लिए कितना महत्वपूर्ण है।
- उन्हें कहें कि अखबार में तस्वीर छपने से पहले जो उनका प्यारा बेटा था, आप अब भी उनके वही बेटे हैं।
क्या न कहें: उन पर कोई आरोप लगाने से बचें। जैसे, “आपने मुझे कभी नहीं समझा।”
3. प्रतिक्रियाओं के लिए तैयार रहें: वे शायद चौंकें, गुस्सा हों, दुख प्रकट करें, या इस बात को अस्वीकार करें। उनकी सीमाओं को समझें। हर तरह की प्रतिक्रिया के लिए मानसिक रूप से तैयार रहें।
क्यों जरूरी: बातचीत की तैयारी इसलिए जरूरी है कि ताकि उस क्षण में आप अपना आपा न खोएं। भावुक या क्रोधित न हों। ताकि आप अपनी बात को लेकर ज्यादा आत्मविश्वास महसूस कर सकें। जितनी क्लैरिटी आपके भीतर होगी, उतनी साफगोई से और बेहतर ढंग से आप बातचीत कर पाएंगे और स्थिति को संभाल पाएंगे।
4. सही समय और जगह चुनें: जब आप और आपके माता-पिता दोनों शांत हों, तब बात करें। किसी भी महत्वपूर्ण पारिवारिक कार्यक्रम या तनावपूर्ण समय से बचें। दिल्ली में आपके घर पर या किसी शांत जगह पर बात करना सबसे अच्छा रहेगा। आप उन दोनों को लेकर कहीं वेकेशन के लिए जा सकते हैं और वहां आराम से मौका देखकर बात कर सकते हैं।
क्यों जरूरी: सही माहौल में बातचीत ज्यादा सफल और सार्थक होती है।
5. पहले किससे बात करें: अगर आपके माता-पिता में से कोई एक (जैसे आपकी मां) ज्यादा समझने वाली लगती हैं, तो उनसे पहले बात करने पर विचार करें।
क्यों जरूरी: एक व्यक्ति दूसरे को समझने में मदद कर सकता है।

निष्कर्ष
शुरू में सभी के लिए बात करना और फैक्ट को स्वीकार करना मुश्किल होगा। लेकिन अगर प्यार, समझदारी और जिम्मेदारी से पहल की जाए, एक–दूसरे को समय और मौका दिया जाए तो इस बात की संभावना है कि वक्त के साथ चीजें बेहतर हो जाएंगी। यहां ज्यादा समझदारी आपको दिखानी है और पूरी तैयारी के साथ पहल करनी है। बात करते हुए पॉजिटिव रहना है। उनका मन जरूर बदलेगा। …………………… ये खबर भी पढ़िए… मेंटल हेल्थ- बचपन में मम्मी–पापा ने मुझे छोड़ दिया:नाना–नानी ने पाला, नानी के जाने के बाद से मैं गहरे डिप्रेशन में हूं, मैं क्या करूं

मैं 29 साल का हूं। जब मैं डेढ़ साल का था, तब मम्मी-पापा का तलाक हो गया। मम्मी ने दूसरी शादी कर ली और मुझे नानी के पास छोड़ दिया। पापा को मैंने 19 साल की उम्र तक देखा भी नहीं। दोनों ने कभी मुझसे संपर्क नहीं किया। मुझे नाना-नानी ने पाला, और नानी से मेरी गहरी भावनात्मक जुड़ाव था। दो साल पहले नाना की और छह महीने पहले नानी की मौत हो गई। तब से मैं गहरे डिप्रेशन में चला गया हूं। मैं क्या करूं? पूरी खबर पढ़िए…








