मेंटल हेल्थ– मुझे आलोचना बर्दाश्त नहीं होती:  कोई मेरी कमी निकाले, मेरी गलती बताए तो मैं दोस्ती तोड़ लेती हूं, खुद को कैसे बदलूं
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मेंटल हेल्थ– मुझे आलोचना बर्दाश्त नहीं होती: कोई मेरी कमी निकाले, मेरी गलती बताए तो मैं दोस्ती तोड़ लेती हूं, खुद को कैसे बदलूं

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2 घंटे पहले

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सवाल– मेरी उम्र 30 साल है। मैं पेशे से डेटा एनालिस्ट हूं। मेरी प्रॉब्लम ये है कि मैं क्रिटिसिज्म नहीं सह पाती। फ्रेंड्स मेरी बुराई करें तो मैं दोस्ती तोड़ लेती हूं।

मैं डेट पर नहीं जाती क्योंकि मुझे रिजेक्शन का डर लगता है। ऑफिस में कोई मेरे काम को लेकर फीडबैक दे तो मैं उससे भी बात करना बंद कर देती हूं। मेरी मां बहुत ज्यादा स्ट्रिक्ट थीं और हमेशा हर बात के लिए डांटती, क्रिटिसाइज करती थीं।

इस चीज को लेकर मेरे मन में इतना ज्यादा रिएक्शन और गुस्सा भर गया है कि अब ये मेरी प्रोफेशनल लाइफ पर असर डाल रहा है। मुझे ऑफिस में कई बार ये कहा जा चुका है कि मेरा सोशल बिहेवियर अप्रोप्रिएट नहीं है। फीडबैक को लेकर नाराज हो जाना, उसे नेगेटिव तरीके से लेना ठीक नहीं है। मैं भी ये समझ पा रही हूं, लेकिन अपनी सोच और बिहेवियर को चेंज कैसे करूं।

एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।

सवाल पूछने के लिए आपका बहुत शुक्रिया। आप जिस परेशानी से गुजर रही हैं, वो आपकी कोई व्यक्तिगत कमी नहीं है। आलोचना न सह पाना, फीडबैक को पॉजिटिव तरीके से न ले पाना किसी व्यक्ति की अपनी कमजोरी नहीं है।

ये एक प्रेडिक्टेबल पैटर्न है, जिसका संबंध हमारे बचपन के अनुभवों से है। अगर हमारी परवरिश एक ऐसे माहौल में हुई, जहां गलती करना एक्सेप्टेबल नहीं था, मामूली सी कमी पर भी बहुत डांट पड़ती या नेगेटिव तरीके से आलोचना की जाती थी तो इसका प्रभाव हमारे एडल्ट बिहेवियर में भी दिखाई देगा।

रॉयल कॉलेज ऑफ साइकेट्रिस्ट्स (RCPsych) और नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ एंड केयर एक्सेलेंस (NICE) के मॉडल बताते हैं कि बहुत ज्यादा क्रिटिकल माहौल में पले-बढ़े बच्चों में अक्सर कुछ इस तरह की साइकोलॉजी विकसित होती है:

  • ऐसा इंटर्नल इमोशनल सिस्टम, जो थ्रेट यानी खतरे को लेकर बहुत सेंसिटिव होता है।
  • जो आलोचना को एक खतरे की तरह देखता है।
  • नेगेटिव जजमेंट को लेकर डर होता है।
  • ये बिलीफ सिस्टम होता है कि क्रिटिसिज्म का मतलब है रिजेक्शन।
  • रिजेक्शन के डर से व्यक्ति क्रिटिसिज्म से दूर भागता है।
  • जो भी आलोचना करे, उससे दूरी बना लेता है ताकि वह सुरक्षित महसूस कर सके।

बहुत ज्यादा आलोचना के माहौल में पला हुआ बच्चा बड़ा होकर ऐसे एडल्ट में बदल सकता है, जो-

  • डेटिंग अवॉइड करे।
  • आलोचना होने पर दोस्ती तोड़ ले।
  • कमी बताए जाने पर दूरी बना ले।
  • फीडबैक देने पर सहकर्मियों से दूर हो जाए।

ये सब इमोशनल रिएक्शन हैं, जो परवरिश से मिले हैं। ये ऐसा फिक्स कैरेक्टरस्टिक नहीं है, जिसे अपने प्रयास से बदला नहीं जा सकता है।

इमोशनल व्यवहार की क्लिनिकल व्याख्या

आगे कुछ बिंदुओं में इस तरह के इमोशनल व्यवहार को मनोविज्ञान के नजरिए से समझाने की कोशिश की गई है।

चाइल्डहुड क्रिटिसिज्म का यकीन में बदलना

अब सवाल ये उठता है कि ऐसा होता क्यों है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बचपन में लगातार हो रही आलोचना से बच्चे के मन में एक बिलीफ सिस्टम यानी एक गहरा विश्वास बैठ जाता है। वो यकीन करने लगता है कि–

  • मैं अच्छा नहीं हूं।
  • मैं प्यार और रिस्पेक्ट के लायक नहीं हूं।
  • अगर कोई मेरी गलती सुधार रहा है तो इसका मतलब कि वो मुझे रिजेक्ट कर रहा है।
  • प्यार और रिस्पेक्ट पाने के लिए मुझे बिल्कुल परफेक्ट होना पड़ेगा।

इमोशनल मेमोरी एक्टिवेशन

  • बचपन से ये विश्वास मन में बैठ गया है।
  • हमारे ब्रेन ने आलोचना को प्यार की कमी, रिजेक्शन और डिसरिस्पेक्ट के साथ जोड़ लिया है।
  • अब एडल्ट लाइफ में जब कोई हमारी आलोचना करता है तो बचपन का वो मेमोरी सिस्टम एक्टिवेट हो जाता है।

सेफ्टी बिहेवियर्स

  • आलोचना होते ही हम थ्रेट यानी खतरा महसूस करने लगते हैं।
  • खतरा महसूस करने पर खुद को बचाने की कोशिश करते हैं।
  • बात न करना, दूरी बनाना, अवॉइड करना, खुद को बंद कर लेना, चुप हो जाना, ये सब सेफ्टी बिहेवियर्स हैं। यानी खतरा महसूस करने पर खुद को बचाने की कोशिश।

फंक्शनल इंपैक्ट

इस व्यवहार का प्रभाव कई तरीकों से हमारे एडल्ट लाइफ के रिश्तों और जीवन पर पड़ता है। जैसेकि-

  • टीमवर्क नहीं कर पाते।
  • प्रोफेशनल ग्रोथ बाधित होती है।
  • रिलेशनशिप बनाने में मुश्किल होती है।
  • अकेलापन हावी हो सकता है।

आप आलोचना को कैसे लेते हैं?

सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट करें

यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में तीन सेक्शंस में कुल 10 सवाल हैं। सेक्शन A में इमोशनल प्रतिक्रिया, B में व्यावहारिक प्रतिक्रिया और C में थिंकिंग पैटर्न से जुड़े सवाल हैं।

आपको इन सवालों को ध्यान से पढ़ना है और 0 से 3 के स्केल पर इसे रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल का आपका जवाब अगर ‘कभी नहीं’ है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब ‘हमेशा’ है तो 3 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें।

नंबर के हिसाब से उसका इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया है। जैसेकि अगर आपका स्कोर 0 से 8 के बीच है तो इसका मतलब है कि आप आलोचना को लेकर मामूली सेंसिटिव हैं। लेकिन अगर आपका स्कोर 27 से ज्यादा है तो आपको CBT थेरेपी और प्रोफेशनल हेल्प की जरूरत है।

आलोचना और फीडबैक में क्या फर्क है

बचपन में हम कमजोर और दूसरों पर निर्भर होते हैं। लेकिन एडल्ट होने के बाद अपने जीवन की जिम्मेदारी और एजेंसी हमारे हाथों में होती है। इसलिए हम अपने एडल्ट बिहेवियर के साइकोलॉजिकल कारणों को समझकर उसे बदलने की कोशिश कर सकते हैं।

इसलिए यहां यह समझना जरूरी है कि आलोचना और फीडबैक में क्या फर्क है। नीचे ग्राफिक में देखिए–

क्यों जरूरी है कंस्ट्रक्टिव क्रिटिसिज्म

कठोर चाइल्डहुड एन्वायर्नमेंट ने बच्चे को ये यकीन दिलाया कि आलोचना का मतलब रिजेक्शन होता हैं। वहीं फर्ज करिए कि अगर प्यार और संवेदनशीलता के साथ बच्चे को फीडबैक दिया जाता, गलतियां सुधारने और खुद को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित किया जाता तो इसका नतीजा बिल्कुल उलटा होता। वो व्यक्ति क्रिटिसिज्म को पॉजिटिव तरीके से लेता।

कंस्ट्रक्टिव क्रिटिसिज्म बेहद जरूरी और पॉजिटिव चीज है, जो हमें हमेशा बेहतर बनाने का काम करती है। पर्सनल से लेकर प्रोफेशनल स्पेस में कंस्ट्रक्टिव क्रिटिसिज्म बहुत अहम भूमिका अदा करता है। नीचे ग्राफिक में देखिए कि ये क्यों जरूरी है।

अपना बिहेवियर पैटर्न कैसे बदलें

CBT (कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी) की मदद से हम अपनी सोच और बिहेवियर पैटर्न को बदल सकते हैं। इसके लिए मैं यहां आपको कुछ टूल दे रहा हूं।

टूल 1

पॉज-नेम-रीफ्रेम

जब कोई आलोचना करे, कमी बताए या फीडबैक दे तो तुरंत रिएक्ट करने की बजाय-

  • थोड़ा ठहरें और तीन बार गहरी सांस लें।
  • अपने रिएक्शन को पहचानें और खुद से पूछें: “ये मेरा पुराना पैटर्न है, जो इस बात पर रिएक्ट कर रहा है।”
  • अपने रिएक्शन को रीफ्रेम करें: “इस फीडबैक के पीछे मेरी मदद करने का इरादा है।”

टूल: 2

2 ट्रुथ मेथड

खुद से ये दोनों सच दोहराएं:

  • सच 1: बचपन में आलोचना ने मुझे तकलीफ पहुंचाई।
  • सच 2: अब बतौर वयस्क फीडबैक अच्छा और मददगार है।

टूल 3

अपने बुनियादी विश्वास को बदलना

  • पुराना विश्वास: “आलोचना का मतलब है कि मैं अच्छी नहीं हूं।”
  • नया विश्वास: “फीडबैक एक जानकारी है, ये कोई जजमेंट नहीं है। फीडबैक का मतलब ये नहीं कि मैं बेकार हूं।”
  • किसी भी मुश्किल बातचीत से पहले इस बात को कई बार अपने मन में दोहराएं।

टूल 4

बिहेवियर प्रैक्टिस (बदलाव के लिए जरूरी)

  • धीरे-धीरे उन सारी स्थितियों का सामना करें, जिसे आप जनरली अवॉइड करती हैं।
  • किसी सहकर्मी से पूछें: “इस रिपोर्ट को मैं कैसे और बेहतर बना सकती हूं?”
  • दोस्त को असहमत होने का मौका दें। वो असहमति जताए तो उससे दूरी न बनाएं।
  • ऐसी जगहों पर सोशलाइज करें या डेट पर जाएं, जहां बहुत ज्यादा दबाव महसूस न हो।
  • बार-बार इन स्थितियों का सामना करने से धीरे-धीरे डर कम होता है और आत्मविश्वास बढ़ता है।

प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी

अगर स्थिति सामान्य सेल्फ हेल्प से न सुधरे तो आपको प्रोफेशनल हेल्प की जरूरत पड़ सकती है। नीचे ग्राफिक में दिए पॉइंट्स देखें। इन स्थितियों में प्रोफेशनल हेल्प लेना मददगार हो सकता है।

निष्कर्ष

परिवारों में बच्चों को डिसिप्लिन करने या प्रेरित करने के लिए आलोचना का इस्तेमाल किया जाता है। बच्चों को अक्सर सुधार के साथ-साथ आश्वासन नहीं मिलता। इसी कारण बड़े होने पर, वे फीडबैक को थ्रेट या रिजेक्शन के रूप में देखते हैं। इस कल्चरल बैकग्राउंड को समझने पर हम खुद को दोष नहीं देंगे और अपने इमोशनल रिएक्शन के कारणों को बेहतर समझ पाएंगे।

आलोचना के प्रति आपका संवेदनशील होना स्वाभाविक है। लेकिन इसे बदला जा सकता है। आपको अपने इमोशनल बिहेवियर पर काम करने की जरूरत है। आप अपने बुनियादी यकीन को बदल सकती हैं। इसका प्रभाव आपके आत्मविश्वास और रिश्तों पर भी पड़ेगा। जब आपके इमोशनल रिएक्शन बदलेंगे तो आपका पर्सनल और प्रोफेशनल स्पेस ज्यादा सुंदर और सेफ महसूस होगा।

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