6 घंटे पहले
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मेघना पंत, पुरस्कृत लेखिका, पत्रकार और वक्ता
नए श्रम कानून सुधारों ने महिलाओं को रात की शिफ्ट में काम करने की अनुमति दी है। लेकिन असल सवाल यह नहीं है कि महिलाएं रात में काम कर सकती हैं या नहीं। असल सवाल यह है कि क्या हम अब उन्हें काम करते समय सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं? क्योंकि सुरक्षा को केवल महिलाओं के साहस पर छोड़ दिया जाए, तो ये सुधार असफल हो जाएंगे।
सुरक्षा के उपाय न तो नारे हो सकते हैं और न ही दफ्तरी सर्कुलर। वे व्यावहारिक, लागू किए जाने योग्य और गैर-समझौतावादी होने चाहिए। वास्तविक सुरक्षा का मतलब है अनिवार्य एस्कॉर्ट नीतियां- वैकल्पिक नहीं, मांगे जाने पर नहीं- बल्कि अनिवार्य। इसका यह भी अर्थ है कि “लास्ट-माइल’ तक सुनिश्चित परिवहन।
इसमें वेरिफाइड ड्राइवर, जीपीएस से ट्रैक किए जाने वाले वाहन, बदलते रूट्स, रोशन पार्किंग एरिया और निकास मार्ग शामिल हैं। पैनिक-बटन सजावट के लिए नहीं होने चाहिए, वे पुलिस और आंतरिक प्रतिक्रिया टीमों से सीधे जुड़े हों। आपातकालीन एप महानगरों के डेमो तक सीमित न रहें; वे दूसरे राज्यों में भी काम करें। शिकायत अधिकारी 24 बाय 7 उपलब्ध हों और सुरक्षा समितियों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व हो।
और सबसे अहम बात- जवाबदेही स्पष्ट हो। अगर किसी महिला को क्षति पहुंचती है तो इसके लिए नियोक्ता सिर्फ “चिंतित’ नहीं हो सकता। उसकी जिम्मेदारी तय हो। क्योंकि हकीकत यही है कि रात की शिफ्ट में काम करने वाली महिला को एक्सेल शीट से डर नहीं लगता, उसे डर लगता है यात्रा से। वाहनों के इंतजार से। मदद के लिए पुकारने के बाद छा जाने वाली खामोशी से।
लेकिन सुरक्षा भी तस्वीर का एक हिस्सा ही है। कामकाजी महिलाओं को किफायती चाइल्डकेयर की भी जरूरत है, ताकि मातृत्व उनके करियर को समाप्त कर देने वाली घटना न बन जाए। लचीले वर्क-मॉडल अपराधबोध से भरे अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य व्यवस्था होने चाहिए।
महिलाओं के लिए नौकरियां सिर्फ गुजर-बसर नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा का भी साधन हैं। और निर्णय लेने वाली मेजों पर महिलाओं की मौजूदगी भी अनिवार्य है, क्योंकि जिन शहरों, परिवहन प्रणालियों और दफ्तरों की डिजाइन महिलाओं के बिना की जाती है, वे कभी महिलाओं को सुरक्षित महसूस नहीं करा सकते। यह महिलाओं को रात में काम के लिए मजबूर करने का सवाल नहीं है। यह महिलाओं को वास्तविक विकल्प देने का सवाल है- ऐसे विकल्प, जिन्हें अच्छे बुनियादी ढांचे, कानूनों के सख्त अमल और मानवीय गरिमा का समर्थन प्राप्त हो।
महिलाओं की सुरक्षा एक आर्थिक मुद्दा भी है। जब महिलाएं असुरक्षित महसूस करती हैं तो वे काम से बाहर हो जाती हैं। जब वे काम करना छोड़ती हैं, तो परिवारों की आय घटती है। और जब परिवारों की आय घटती है, तो अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है। भारत अपने कार्यबल के आधे हिस्से को शामिल किए बिना 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था नहीं बन सकता।
यह साल 2026 है और आज भी भारतीय महिलाओं में से केवल लगभग एक-तिहाई ही श्रमबल में भाग लेती हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा लगभग तीन-चौथाई है। इन एक-तिहाई कामकाजी महिलाओं का अधिकांश हिस्सा भी अनौपचारिक और असुरक्षित नौकरियों में है और आर्थिक झटकों के समय सबसे पहले उन्हीं पर चोट पड़ती है।
स्नातकों में महिलाओं की हिस्सेदारी 51% होने के बावजूद- मैकिन्से के एक अध्ययन के अनुसार- भारत में वे एंट्री-लेवल भूमिकाओं में 29% ही हैं। वरिष्ठ प्रबंधन में तो यह संख्या घटकर 9% रह जाती है और सीईओ स्तर पर तो यह 1% से भी कम है। आश्चर्य नहीं कि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने जेंडर समानता के मामले में भारत को 153 देशों में 112वां स्थान दिया है। ये हालात बदलने चाहिए। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)








