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हर दिन आप खुद को कितनी बार कोसते हैं? शायद इसलिए कि समय पर जिम नहीं जा पाए या माता-पिता को फोन करना भूल गए। हर छोटी भूल पर अपराधबोध होता ही है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया की मनोचिकित्सक डॉ. जेनिफर रीड कहती हैं कि गिल्ट (अपराध बोध) बेहतर इंसान बनने के लिए प्रेरित कर सकती है, लेकिन जब यह ज्यादा हो जाए तो चिंता, गुस्सा व अवसाद का कारण बनती है। डॉ. रीड के अनुसार, ऐसे में इस भावना को समझकर इससे बाहर निकलना जरूरी है। पढ़िए जरूरी टिप्स… गलती सभी से होती है डॉ. रीड कहती हैं कि जब हम कोई गलती करते हैं, तो अक्सर उसे अपने चरित्र से जोड़ लेते हैं। जैसे, अगर कुछ अच्छा काम नहीं किया, तो खुद को ‘आलसी’ मान लेना। यह सोच एक मानसिक भ्रम है, इससे आत्मसम्मान पर असर पड़ता है। बेहतर है कि गलती को एक घटना मानें, न कि व्यक्तित्व का हिस्सा। जैसे- दोस्त का जन्मदिन भूल गया… कहना ठीक है, पर ‘मैं बुरा दोस्त हूं…’कहना गलत है। डॉ. रीड बताती हैं कि अपराधबोध से उबरने के लिए अंदर के आलोचक को शांत करें। बार-बार खेद न जताएं। समझें- इंसान गलती करता है और हर गलती का अर्थ यह नहीं कि आप अच्छे इंसान नहीं हैं। सकारात्मक दिशा अपराध बोध बेहतर बनने की प्रेरणा भी देता है। रिश्तों में हुई गलती का गिल्ट हमें सुधार की ओर ले जा सकता है। डॉ. रीड कहती हैं कि अगर अच्छा बदलाव हो रहा है, तो उसे अपनाएं। अपराधबोध को पहचानें और खुद से पूछें- क्या ये वाजिब है? क्या मैं इसे सुधार सकता हूं? अगर जवाब हां है, तो कदम उठाएं। अगर नहीं, तो खुद को माफ करना सीखें। इससे मानसिक शांति मिलेगी। प्रोफेशनल की मदद लेने से नहीं हिचकें अपराध बोध अगर नींद, भूख या कामकाज पर असर डाल रहा है, तो मनोचिकित्सक से मिलना जरूरी है। डॉ. रीड कहती हैं कि गिल्ट को नजरअंदाज करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है। थेरेपी से आप अपनी सोच को समझ सकते हैं और उसे बदल सकते हैं।
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