गौरव पाठक7 घंटे पहले
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भोजन और पेय सबसे बुनियादी उपभोक्ता वस्तुएं हैं। जब हम किसी रेस्तरां में खाना खाते हैं या दुकान से पैक्ड पेय खरीदते हैं तो हम स्वाभाविक रूप से मान लेते हैं कि वह सुरक्षित होगा। लेकिन खाने-पीने की चीजों में बाहरी अशुद्धियां या प्रदूषक तत्व पाए जाने के कई मामले उपभोक्ता आयोगों के सामने आए हैं। ऐसे मामले यह बताते हैं कि निर्माताओं और सेवा प्रदाताओं की क्या जिम्मेदारी है और साथ ही यह भी उपभोक्ता कानून के तहत उपभोक्ता क्या समाधान हासिल कर सकते हैं।
क्या है कानूनी ढांचा?
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(11) ‘सेवा में कमी’ को परिभाषित करती है और धारा 2(10) के तहत उपभोक्ता अदालतें और आयोग ‘त्रुटिपूर्ण वस्तुओं’ के मामलों में मुआवजा देने का अधिकार रखते हैं। इसके अतिरिक्त, खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 असुरक्षित या मिलावटी खाद्य पदार्थों की बिक्री को प्रतिबंधित करता है। इस अधिनियम की धारा 26(5) यह स्पष्ट करती है कि यदि किसी बैच की एक भी वस्तु असुरक्षित पाई जाती है तो पूरा बैच उपभोग के लिए असुरक्षित माना जाएगा। ये दोनों कानून मिलकर रेस्तरां, बॉटलिंग कंपनियों और निर्माताओं पर खाद्य वस्तुओं को सुरक्षित, स्वच्छ और बाहरी अशुद्धियों से मुक्त रखने का दायित्व डालते हैं।
जब मिली रेस्तरां के खाने में अशुद्धियां :
मुंबई जिला उपभोक्ता आयोग के सामने हाल ही में एक मामला आया, जिसमें एक ग्राहक को अपने खाने में पत्थर जैसा कण मिला, जिससे उसके दांत की क्राउन (डेंटल कैप) टूट गई। आयोग ने रेस्तरां को सेवा में कमी का दोषी माना और मुआवजा देने का आदेश दिया। आयोग ने कहा कि भोजन प्रदाताओं का यह दायित्व बनता है कि वे सुनिश्चित करें कि भोजन हानिकारक पदार्थों से मुक्त हो। इसी तरह के. दामोदरन बनाम होटल सरस्वती (2007) मामले में भी कर्नाटक आयोग ने भोजन में पथरीला कण मिलने से उपभोक्ता के दांत को चोट पहुंचने पर हर्जाना दिया था।
पैक्ड पेय पदार्थ में अशुद्धियां :
पैक्ड पेय पदार्थ अक्सर मुकदमों का विषय बनते आए हैं। पेप्सिको इंडिया बनाम श्याम गुमटे (2019) मामले के अनुसार पेप्सी की एक सीलबंद बोतल में फंगस पाया गया। कंपनी ने तर्क दिया कि बोतल की सील के साथ छेड़छाड़ की गई, लेकिन महाराष्ट्र राज्य आयोग ने पब्लिक एनालिस्ट की रिपोर्ट के आधार पर पेय पदार्थ को उपभोग के लायक नहीं माना और मुआवजा देने का आदेश दिया। इसी तरह प्रेम कुमार बनाम हिंदुस्तान कोका कोला (2024) मामले में तमिलनाडु राज्य आयोग के सामने ऐसी बोतल पेश की गई थी, जिसके भीतर एक मरा हुआ बिच्छु तैर रहा था। आयोग ने सील के सही-सलामत होने के आधार पर बोतल के साथ छेड़छाड़ की संभावना को खारिज कर दिया और निर्माता व बॉटलर को जिम्मेदार ठहराते हुए हर्जाना देने का आदेश दिया।
नजीरों से निकलने वाले सिद्धांत
– खाने-पीने की चीजें बेचने वालों की यह सख्त जिम्मेदारी है कि वे सुरक्षित हों। अगर भोजन या पेय पदार्थ में बाहरी/अवांछित तत्व पाए जाते हैं तो यह “सेवा में कमी’ मानी जाएगी, चाहे उपभोक्ता ने उसका उपभोग किया हो या न किया हो।
– अदालतों ने यह दलील खारिज कर दी कि सीलबंद बोतल में बाहरी अशुद्धि नहीं हो सकती। अगर लैब की रिपोर्ट या तस्वीरें मिलावट या अशुद्धि साबित करती हैं तो सीलबंद होने का तर्क मान्य नहीं है।
– पब्लिक एनालिस्ट या खाद्य सुरक्षा प्रयोगशालाओं की रिपोर्ट को अदालत बहुत महत्व देती है। अगर बोतल की सील सही-सलामत है तो यही माना जाता है कि गलती निर्माता की ही है।
– आमतौर पर दोष निर्माता और बॉटलर पर डाला जाता है। दुकानदार तब तक बचा रहता है, जब तक उसकी लापरवाही साबित न हो। लेकिन अगर उत्पाद की असलियत पर शक हो, तो अपवादस्वरूप रिटेलर को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
– उपभोक्ताओं के लिए सबक यह है कि वे ऐसा सामान सुरक्षित रखें, बिल संभालकर रखें और सबूत के साथ फौरन उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज करें।
(लेखक सीएएससी के सचिव भी हैं।)








