रसरंग में चिंतन:  क्या आपने कभी किसी पेड़ को दुलारा है?
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रसरंग में चिंतन: क्या आपने कभी किसी पेड़ को दुलारा है?

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आज की सुबह मस्ती का नशा बिखेरती चली गई। खालीपन का एक लक्षण जानने योग्य है। जब उसे अच्छे विचारों की धूप और सुगंध मिलती है, तब वह सार्थक हो उठता है। यही वह क्षण है, जब हम पेड़ों को सुन सकते हैं। जो व्यक्ति यह कहता है कि पेड़ कुछ नहीं बोलते, तो उस व्यक्ति को बहरा ही मान लेना चाहिए। जब खालीपन खामोशी को आवाज देता है और मस्ती का नशा जम जाता है, तब हमारा सूक्ष्म बहरापन दूर हो जाता है।
घर के छोटे-से बगीचे में जामुन का पेड़ खड़ा है। वह इतना करीब है कि शयनकक्ष की खिड़की से उसके पत्तों को छुआ जा सकता है। उसी जामुन की डालियों पर बया चिड़िया के पंद्रह-बीस घोंसले बने हुए हैं। बया चिड़िया को ‘सुग्गीबाई’ कहना उचित होगा। हमारी इस सुग्गीबाई को न डेढ़ पैसे की कमाई का मोह है और न एक घड़ी की फुरसत। घंटों तक वह केवल काम में लगी रहती है। जामुन का यह पेड़ मानो सुग्गीबाई का सहकारी आवास सोसायटी बन गया है। आजकल सुग्गीबाई क्या कर रही है? घर के ही बगीचे में उगे नारियल के पेड़ों की पत्तियों पर वह लगातार परिश्रम करती रहती है। बहुत कोशिशों के बाद वह एक लंबा रेशा निकालती है और उसे लेकर जामुन के पेड़ पर चढ़ जाती है। नारियल की तलवार जैसी लंबी पत्ती की धार से वह अपनी चोंच से एक लंबा रेशा खींच निकालती है। उसी रेशे को साथ रखकर उसकी चोंच सुई की तरह काम करती है। उसकी कढ़ाई का काम देखने लायक होता है। पेड़ पर जाकर वह अपने घोंसले पर बैठती है और सिलाई शुरू कर देती है।
सुग्गीबाई जैसी दर्जी अभी तक नहीं हुई। उसका रौब देखने लायक है। उसकी काया गौरैया से थोड़ी छोटी और कोमल है, जिस पर पीली आभा सुशोभित है। संस्कृत में सुग्गी को ‘सुगृहा’ अर्थात अच्छे घर में रहने वाली कहा गया है। उसके घोंसले हवा में झूलते रहते हैं। सुग्गीबाई बहुत कम बोलती है। ऐसा भी नहीं कि वह मौन रहती हो। कभी-कभी वह बोलती भी है। कई बार जब पांच-छह सुग्गियां एकत्र हो जाती हैं, तो उनका मौन टूट जाता है। कल सुबह अवश्य होगी…
रात को सोते समय मनुष्य को यह विश्वास होता है कि कल सुबह अवश्य होगी। हम सोकर जल्दी उठें या न उठें, सुबह तो होती ही है। करोड़ों वर्षों से ऐसा ही होता आया है। प्रतिदिन नियत समय पर सुबह होती है, क्योंकि सूरज को देर से आने की आदत नहीं। हर सुबह जब सूर्य उगता है, तो जीवन भी उगता है, ताजगी फैलती है, प्रकाश फैलता है। यदि इसी बीच समझ भी उग जाए, तो समझो मनुष्य भी उगता है।
मनुष्य को भी उगना चाहिए, ताकि वह पूर्ण संतोष के साथ अस्त हो सके। बिस्तर पर लेटते समय यह अनुभव होना चाहिए कि आज मैंने सुगंध की तरह जीवन जिया है। सोने से पहले पांच मिनट दिनचर्या का लेखा-जोखा अवश्य करना चाहिए। जहां-जहां हमने स्वयं से छल किया है, वहां-वहां स्वयं ही आपत्ति दर्ज करनी चाहिए। अतिव्यस्त होने का दिखावा
हमारे आसपास ऐसे अनेक लोग मिल जाते हैं, जो अतिव्यस्त होने का दिखावा करते हैं। इसी कारण वे अपने लिए कभी समय नहीं निकाल पाते। बरसों से हमारे बहुत करीब खड़ा पेड़ हमारे स्नेह की प्रतीक्षा करता रहता है, पर हमारी व्यस्तता हम पर हावी रहती है और पेड़ हमारे दुलार से वंचित रह जाता है। जिनमें किसी भी प्रकार का उत्साह नहीं होता, उनसे सावधान रहना चाहिए। समझदार व्यक्ति को अपने घर के बाहर एक सूचना लगा देनी चाहिए, ‘निराश और बुझे हुए व्यक्तियों का प्रवेश वर्जित है।’ छिछले मानवीय संबंधों के कारण हृदय रोग बढ़ रहे हैं। शोध बताता है कि जो लोग पशु पालते हैं और उन्हें स्नेह-दुलार देते हैं, उनमें हृदय रोग की आशंका कम होती है।
सुबह होने पर ‘उठना’ क्या है? यह प्रश्न न पूछो तो ही अच्छा है। नींद में पूरी तरह डूबा हुआ हमारा ‘मैं’ सुबह धीरे-धीरे जागता है। फिर वह नित्यकर्म निपटाता है, चाय पीता है, नाश्ता करता है, अखबार पढ़ता है और फिर पूरे दिन पेट पालने के काम में डूब जाता है। रात होने पर थका हुआ ‘मैं’ बिस्तर पर करवटें बदलता रहता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि मनुष्य सुबह उठते ही सचमुच उग भी जाता है। सभी रोज उठते हैं, पर उगते कितने हैं? जो प्रतिदिन उगता है और प्रतिदिन अस्त होता है, वही संत कहलाता है। ऐसे संतों को अनुयायी नहीं मिलते, इसलिए वे चरण-स्पर्श के कोमल प्रहारों से काफी हद तक बचे रहते हैं।
पक्षियों के स्थापत्य ज्ञान से चकित हमारी बुद्धि
घोंसले की रचना में जब हम परिंदों को अद्भुत चातुर्य और अलौकिक कौशल प्रदर्शित करते देखते हैं, तो हम विचार में पड़ जाते हैं। दर्जी या सुग्गी जैसे पक्षियों के स्थापत्य ज्ञान से तो हमारी बुद्धि चकित हो जाती है। यह सब केवल अनुकरण प्रवृत्ति का परिणाम नहीं है…
सुग्गी, दर्जी, फूत्की, सक्करखोर, धनेश जैसे पक्षियों की ऐसी घोंसला-रचना के पीछे अनेक जन्मों के संस्कार और प्रेरणा का बल कार्य करता है। (हरिनारायण गिरधरलाल आचार्य द्वारा गुजराती में लिखित ग्रंथ ‘वनवगड़ाना वासी: वनेचर’ से)



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