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घर के सामने एक घना वृक्ष है। कई लोगों से इस वृक्ष के बारे में पूछा, पर कोई भी उसके बारे में विस्तार से बता नहीं पाया। उसका नाम भी किसी ने नहीं बताया, तो मैंने ही उसका नाम रख दिया – “सत्यकाम’। बिना नाम और लेबल के कोई वस्तु हर तरह से पूर्ण हो, फिर भी उसमें किसी कमी का अहसास बना ही रहता है। वास्तव में इस अहसास के लिए हमारी अपनी अपूर्णता ही जिम्मेदार है। इस वृक्ष की एक विशेषता यह है कि हर ऋतु में इसकी पत्तियों की चमक सदाबहार बनी रहती है। मानो वे अभी-अभी वर्षा में नहाकर आई हों। उसके पड़ोसी वृक्षों की हरियाली की तुलना में इसकी हरियाली कुछ अलग ही दिखाई देती है। शहर की गगनचुंबी इमारतों के बीच किसी तरह टिका यह वृक्ष कितने समय तक जीवित रह पाएगा, कहना कठिन है। क्योंकि मैं स्वयं भी नहीं जानता कि मैं कब तक टिक पाऊंगा। इस वृक्ष के प्रति पक्षियों को भी विशेष लगाव है।
जीना ही हमारा जीवन धर्म :
क्या आपने कभी किसी बिजूके को थककर आलस से अंगड़ाई लेते देखा है? एक विचारक ने कहा है कि जीवन की अपेक्षा मृत्यु अधिक सार्वभौमिक प्रतीत होती है। मरते तो सभी हैं, लेकिन बहुत कम लोग सचमुच जीते हैं। जीवन के उद्देश्य को लेकर लोग उलझन में पड़े रहते हैं। यदि वे उलझन छोड़कर वास्तव में जीना शुरू कर दें, तो शायद समझ सकें कि जीना ही हमारा जीवन धर्म है। खलील जिब्रान, थोरो और हेराक्लिटस जैसे महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने सच में जीकर दिखाया। वे केवल मरे नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक सार्थक मिसाल बन गए। रोज-रोज मरने वालों के सामने रोज-रोज जीने वाले कितने अल्पसंख्यक हैं, यह हम देख सकते हैं। बहुमत के साथ रहने में जो सुविधा मिलती है, उसी से चिपककर हम अपना जीवन काटते रहते हैं।
यह निष्क्रियता हमें उस निर्जीव बिजूके से ही मिली है। कभी-कभी कोई पक्षी उसके कंधे पर आकर बैठ जाता है, पर वह इतना जड़ है कि पक्षी की चेतना का स्पर्श भी उसे छू नहीं पाता। ठीक उसी तरह हम भी समय बिताते रहते हैं। समय की अपनी एक लाचारी है। वह गुजरने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता। जब तक यह अनादि बुद्ध वृक्ष सामने खड़ा है, तब तक किसी विशेष सत्संग या संत समागम की आवश्यकता नहीं लगती। उसकी मातृभाषा मुझे कुछ-कुछ समझ में आने लगी है। वृक्ष की मातृभाषा है मौन। जब मैं मौन धारण करता हूं, तब उसके मौन का थोड़ा सा रहस्य समझ पाता हूं। उस मौन का प्रकाश वृक्ष को घेरे हुए आकाश के खुले विस्तार को धीरे-धीरे मेरे मन में उतार देता है। हर शाम को मानें अंतिम शाम:
सुबह होने वाली है। बिना अंधेरे को धक्का दिए उजाला उसे अपने आंचल में समेट लेता है। पक्षी जागने की तैयारी में हैं। सूर्योदय होने को है। हवा भी अभी पूरी तरह होश में नहीं आई है। जैसे ही सुबह होती है, पक्षी ऐसे उल्लसित हो उठते हैं मानो पहली बार सुबह आई हो। यदि हर सुबह को पहली और हर शाम को अंतिम मानने का भाव बना रहे, तो मनुष्य की दिनचर्या का रंग ही बदल जाए। छोटी-छोटी बातों में दिन गंवाने की आदत छोड़ना आसान नहीं है। रुपये खर्च हो जाएं तो खलता है, पर दिन, महीने और साल यूं ही बीत जाते हैं, तो इसका आभास भी नहीं होता। सुबह होते ही आसपास के वृक्षों से निकलने वाली मंगल ध्वनि सुनाई देने लगती है। हर चोंच से निकलती उस ध्वनि में रामधुन की लय है, बांसुरी की करुण पुकार है और मंदिर की प्रार्थना का गंभीर स्वर है। पूरा मोहल्ला शांत है, हवा में ठंडक है और आकाश की निर्मलता अक्षुण्ण है। ऐसे में पक्षियों का मधुर गान हृदय को भावों से भर देता है। सदा साथ रहते हैं वैराग्य और वैभव :
पतझड़ और वसंत के इस आने-जाने के बीच एक बात मन में पक्की कर लेने का मन होता है। वैभव के बीच भी मनुष्य को वैराग्य का एक द्वीप रचना चाहिए। वैराग्य के बिना वैभव अधिक कल्याणकारी नहीं होता। जहां एकांत का मंदिर हो और मौन का गुंबद हो, वहां आनंद का ध्वज सदा लहराता रहता है। सामने का वृक्ष बिना बोले अपनी मातृभाषा में मुझे धीरे से समझा देता है – वैराग्य और वैभव सदा साथ-साथ रहते हैं। पतझड़ के साथ बदल जाता है सबकुछ :
एक वर्ष में सामने वाले “सत्यकाम’ से मेरी दोस्ती बढ़ गई है। अब पतझड़ ने उसे लगभग लूट ही लिया है। उसका घनत्व, उसकी पत्तियों की संपदा और उसकी हरियाली की शोभा क्षीण हो गई है। वसंत की हवा भी उसे पहले की तरह नहीं झुलाती। मानो कठिन दिनों में उसके अपने ही उससे मुंह मोड़ने लगे हैं। कभी-कभी परिवार में भी पतझड़ के साथ सब कुछ बदल जाता है। उमंग की जगह आहें और स्वागत की जगह अहंकार आ खड़ा होता है। क्षण भर को लगता है, मानो दिनदहाड़े लूट हो गई हो। संबंध झड़ने लगते हैं और बधाइयों की जगह तकाजों की आवाजें सुनाई देती हैं। सब कुछ उजाड़, पराया और बोझिल लगने लगता है। ऐसे समय में दूर से वसंत का एक स्वर सुनाई देता है और मन की आकांक्षाओं को पुनर्जीवित कर देता है।
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