रसरंग में चिन्तन:  किसी कविता से कम नहीं होता एक पतंगे का आनंद!
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रसरंग में चिन्तन: किसी कविता से कम नहीं होता एक पतंगे का आनंद!

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गुणवंत शाह10 घंटे पहले

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हम सब जानते हैं, पतंगे को कभी कोई रोग नहीं होता। वजह यही है कि वह अपने तरीके से बिंदास होकर अपना जीवन जीता है। इंसान की बात अलग है। वह दूसरों के तरीकों से अपना जीवन जीने की कोशिश में लगा रहता है।

रात को गहरी नींद लेने के बाद हमारे अस्तित्व में जो ताजगी आती है, उसे हम रोजमर्रा की भागदौड़ में बरबाद करते चले जाते हैं। हमने कितने दिन, कितने सप्ताह और न जाने कितने साल व्यर्थ गंवा दिए, इसका हमें एहसास तक नहीं होता। जिस व्यक्ति को अपनी बरबादी के दिन याद न हों और जिसका इस पर कोई अफसोस न हो, उसे और कई पीड़ाओं के लिए तैयार रहना चाहिए।

जीवन में इंसान अनेक तरह की पीड़ाएं भोगता है। इनमें से कुछ को चुनने की स्वतंत्रता हमारे पास फिर भी रहती है, लेकिन मनचाही पीड़ा का चयन करना हमारे लिए सबसे कठिन होता है। हर सुबह हमारे सामने नई दुल्हन की तरह आती है, अपने आंचल में ढेरों आकांक्षाएं समेटे हुए। उसके आते ही हमारे मन के कोने-कोने में नई ऊर्जा दौड़ने लगती है।

पतंगे की होती है अपनी लय: बैठे पतंगे को निहारना, क्या इसे कोई ‘काम’ कहा जा सकता है? इंसान यह मानता है कि उसे हर समय किसी न किसी महत्वपूर्ण कार्य में व्यस्त रहना चाहिए। लेकिन कौन-सा कार्य वास्तव में महत्वपूर्ण है, यह समझने में पूरी जिंदगी छोटी पड़ जाती है। शायद पतंगे को इस उलझन से नहीं गुजरना पड़ता। किसी फूल की पंखुड़ी पर बैठकर अपने पंखों को स्थिर कर लेना और उसी क्षण में पुष्पमय, मधुर और जीवनमय बने रहना, यही सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। यह पतंगा भली-भांति जानता है। हर पतंगा अपने आसपास की हवा में मंडराता हुआ एक कविता रचता है। जो कविता को जी नहीं सकते, उन्हें कविता लिखकर ही संतोष करना पड़ता है। जिनके जीवन में लय से नाता टूट चुका हो, उन्हें पिंगल शास्त्र की शरण में आकर छंदबद्ध नियमों में बंधना होता है।

जीवन की लय के बिना केवल अक्षरों की लय पतंगे को रास नहीं आती। जिनके जीवन में ज्ञान की कमी होती है, वे पुस्तकों की ओर भागते हैं। जो अपने जीवन में आनंद की कमी महसूस करते हैं, वे नशे का सहारा लेते हैं। जो भीतर से स्वयं को असुरक्षित मानते हैं, वे अस्त्र-शस्त्र का सहारा लेते हैं। सच्ची भूख लगने का इंतजार करना हर किसी के बस की बात नहीं है। पर भोजन सामने आने पर उसे रुक-रुककर खाना बहुत कठिन है। जब-तब, जहां-तहां कुछ भी खा लेना, यह अन्न का अपमान है। हमेशा खाने के लिए जीने वाले लोग अंततः इस स्थिति तक पहुंच जाते हैं कि कहते हैं- अब कुछ भी रुचिकर नहीं लगता। खाने की इच्छा ही नहीं रहती। खाने की इस इच्छा की अकाल मृत्यु के बाद जो शोकसभा आरंभ होती है, उसे ही बीमारी कहा जाता है। कविता का उद्देश्य : पोलैंड के नोबेल पुरस्कार विजेता कवि चेस्लाव मिलोज ने कहा था- ‘कविता का उद्देश्य हमें यह याद दिलाना है कि केवल एक व्यक्ति बने रहना कितना कठिन है।’ यहां ‘एक व्यक्ति बने रहना’ वाक्य दिल को छू जाता है। मनुष्य जीवन भर अपने अहंकार को मथता रहता है, तब जाकर बड़ी मुश्किल से वह वही बन पाता है जो वह वास्तव में है। ऐसे ही विचारों से जूझते हुए चुआंग त्झू को एक सपना आया कि वह स्वयं एक पतंगा बन गया है। हमारे नसीब में ऐसा सपना कहां! अगर हमारे सपनों का वीडियो बने तो शायद हम खुद ही शर्म से मर जाएं। डराता है भीतर की गहराई का अंधकार इंसान भीड़ की शरण में इसलिए जाता है, क्योंकि वह अपने एकांत से डरता है। अपनी ही आत्मा से साक्षात्कार करना उसे भयावह लगता है। हमारे भीतर जो गहराई है, उसका ही अंधकार हमें डराता है। ऐसे में लगता है कि सरल होना ही सबसे कठिन कार्य है। श्री माताजी ने कहा है – ‘यदि मनुष्य अपनी जटिलताओं को न बढ़ाए तो उसका जीवन बहुत सरल हो सकता है।’ पतंगे का जीवन सरलता की कविता है, जबकि मनुष्य का जीवन संकीर्णताओं से भरा हुआ है। संस्कृत व्याकरण में तीन लिंग, तीन वचन और तीन काल हैं। इसके अलावा कर्ता और क्रिया की कैद में पड़े शब्दों की भीड़ में मनुष्य इतना उलझ गया है कि जो कहना चाहता है, वही शब्दों में छिपा देता है।



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