पर्णश्री देवी2 घंटे पहले
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शहरी भागदौड़ और तेजी से फैलती तकनीकी दुनिया से इतर भुवनेश्वर शहर से थोड़ा बाहर बलुआ पत्थरों की दो पहाड़ियां सिर उठाए खड़ी हैं। ये हैं उदयगिरि और खंडगिरि। लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व में तराशी गईं ये गुफाएं प्रारंभिक जैन इतिहास की शानदार कहानियों को संजोए हुए हैं। ये केवल पुरातात्विक धरोहर भर नहीं हैं, बल्कि उस समय की सजीव दास्तान है, जब कला, अध्यात्म, सत्ता और आस्था एकसाथ आकार ले रहे थे। जो यात्री ओडिशा के मशहूर मंदिरों से हटकर कुछ नया और अलग देखना चाहते हैं, उनके लिए ये दोनों प्राचीन पहाड़ियां दिल को छू लेने वाला अनुभव देती हैं।
कलिंग की विरासत
ओडिशा के इतिहास को अक्सर दो बड़े अध्यायों से पहचाना जाता है। एक, कलिंग युद्ध जिसने अशोक की जिंदगी का कायाकल्प कर दिया और दूसरा, मंदिर कला की वह परंपरा जिसने कोणार्क और पुरी के शिखर मंदिरों को जन्म दिया। लेकिन इसके समानांतर एक और कथा भी उतनी ही मोहक है- जैन धर्म, उसकी कला और उसकी सौंदर्य परंपरा का विकास। उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाएं महामेघवाहन वंश के राजा खरवेल की देन है। ये ऐसे सम्राट थे, जिन्होंने कला, साहित्य, संगीत और धर्म को भी संरक्षण दिया। अजंता और एलोरा जैसी बौद्ध गुफाओं से अलग यह परिसर मुख्यतः जैन साधुओं के लिए बनाया गया था। यहां की गुफाएं भव्यता के लिए नहीं, बल्कि साधुओं के सादगीपूर्ण और ध्यानमय जीवन के लिए तराशी गई थीं। यह वह स्थान है, जहां मौन, प्रकृति और अनुशासन साधना के हिस्से थे। यहां पहुंचते ही लगता है कि आप किसी संग्रहालय में नहीं, बल्कि समय की सुरंग में प्रवेश कर रहे है, जहां इतिहास दूर से नहीं, आपके साथ खड़ा महसूस होता है।
उदयगिरि: सूर्योदय की पहाड़ी
उदयगिरि का अर्थ होता है सूर्योदय की पहाड़ी। यह पहाड़ी दोनों में सबसे अधिक सुगठित और कलात्मक है। यहां की रानी गुफा सबसे प्रसिद्ध है। यह दो मंजिला गुफा है, जिसमें नृत्य, शिकार और पौराणिक घटनाओं को बारीकी से उकेरा गया है। ये दृश्य केवल सजावट भर नहीं है, बल्कि पत्थरों में लिखी कहानियां हैं, जो अपने समय की संवेदनशीलता और सामाजिक जीवन का प्रमाण हैं। यहां की मूर्तियां उस सुसंस्कृत समाज की झलक दिखलाती हैं, जहां स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी संस्कृति और कला के प्रति राजाओं के सम्मान को अभिव्यक्त करती है। उदयगिरि में ही स्थित एक और महत्वपूर्ण गुफा ‘गणेश गुफा’ है, जिसमें भगवान गणेश की प्रारंभिक प्रतिमाशैली दिखाई देती है। हाथी गुफा पर राजा खरवेल का शिलालेख उकेरा गया है, जिसमें उनके राजनीतिक और सांस्कृतिक योगदान का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह भारत की जैन परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण अभिलेखों में से एक माना जाता है।
खंडगिरि : साधना की ऊंची चट्टान
खंडगिरि की संरचना एकसमान नहीं है और सजावट के मामले में भी सादी है, लेकिन इसकी आध्यात्मिकता गहरी और मन को छूने वाली है। यहां की गुफाएं संकरी हैं, मगर शांत है और इसी वजह से इसका वातावरण ध्यान-साधना के ज्यादा अनुकूल होता है। बहुत से पर्यटक बताते हैं कि यहां की निस्तब्धता ऐसा अनुभव कराती है, जैसे अब भी कोई साधु इन कक्षों में तप कर रहा हो। पहाड़ी की चोटी पर पहुंचते ही जहां एक ओर प्राचीन गुफाओं का संसार दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर फैला हुआ आधुनिक भुवनेश्वर। यह विरोधाभास ही इस स्थल को अनूठा और जादुई बनाता है। यहां आकर ऐसा लगता है, मानो दो सदियां एक ही धरती पर सहजता से एक दूसरे के साथ आ जुटी हों।
आज भी क्यों खास है यह स्थल?
इतिहास, कला, संस्कृति या धर्म में रुचि रखने वालों के लिए ये गुफाएं केवल देखने की जगह नहीं हैं, बल्कि अनुभव करने का अवसर भी है। यहां इतिहास को शीशों में बंद शाेपीस की तरह नहीं देखा जाता, बल्कि यहां आप उससे रूबरू होते हैं। आप उन्हीं कक्षों में खड़े होते है जहां साधु रहते थे, उन्हीं शिलालेखों के सामने जिनमें एक राजा की आवाज आज भी दर्ज है और उन्हीं पत्थरों को छू सकते हैं जिनमें सदियों पहले के कलाकारों की उंगलियों के निशान आज भी बसते हैं।
भ्रमण करने का यह है आदर्श मौसम
•- सबसे अच्छा समय कब?: घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से फरवरी के बीच है, जब मौसम ठंडा और सुहावना होता है।
– फोटोग्राफी कब करें?: सुबह की गुनगुनी धूप में उदयगिरि की मूर्तियां एक खास सुनहरी आभा से चमकती हैं। यह समय फोटो खींचने के लिए सबसे आदर्श होता है।
– और कहां जाएं?: लिंगराज मंदिर, धौली शांति स्तूप, राज्य संग्रहालय और एकम्र क्षेत्रों की भी साथ में यात्रा की जा सकती है।








