रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  परेश रावल: सांसद बने तो ठुकरा दिया था बंगला
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: परेश रावल: सांसद बने तो ठुकरा दिया था बंगला

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रूमी जाफरी4 मिनट पहले

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जून 2014 में संसद में विनोद खन्ना के साथ बैठे परेश रावल (फाइल फोटो) - Dainik Bhaskar

जून 2014 में संसद में विनोद खन्ना के साथ बैठे परेश रावल (फाइल फोटो)

इंडस्ट्री में मेरे बहुत सारे दोस्त हैं- एक्टर, डायरेक्टर, म्यूजिक डायरेक्टर से लेकर प्रोड्यूसर तक। अनेक लोगों से मेरे गहरे रिश्ते रहे हैं। कुछ करीबी दोस्त ऐसे भी हैं, जिनकी मैं दिल से इज्जत करता हूं। उन्हीं में से एक हैं परेश रावल जी। तो आज मेरे हिस्से के किस्से में बात परेश जी की, उनके कुछ दिलचस्प अनसुने किस्सों की।

परेश रावल जी को मैं बापू कहता हूं। गुजराती में ‘बापू’ उस शख्स को कहा जाता है, जो बेहद सम्माननीय या पूजनीय होता है। परेश जी मेरे लिए वाकई ऐसे ही हैं। हम दोनों ने साथ में बहुत सारी यात्राएं की हैं। हिंदुस्तान की कई जगहों पर साथ घूमे हैं, दुनिया के कई शहरों में साथ गए हैं। बहुत सारी फिल्मों की शूटिंग के दौरान भी हम साथ रहे हैं। उनके साथ रहने और समय बिताने की वजह से ही मैं उन्हें इतना करीब से जान पाया हूं।

थिएटर से उन्हें इतना लगाव रहा है कि स्टार बनने के बाद भी वे थिएटर करते रहे। वे विले पार्ले स्थित भाईदास हॉल में अपने प्ले की रिहर्सल किया करते थे। यह हॉल उनके घर के पास ही था। वे वहां जाने के लिए न तो अपनी गाड़ी को तकलीफ देते थे और न ड्राइवर को। उन्हें घर पर ही छोड़ आते थे। ड्राइवर के लिए वे कहते, ‘ये बेचारा मेरे लिए तीन घंटे क्यों खड़ा रहे। घर जाए, आराम करे। मेरा घर तो पास में ही है। मैं पैदल या रिक्शे से ही चला जाऊंगा।’ और सच में वो पैदल या रिक्शे से ही चले जाते थे। इतनी सादगी से जीने वाले स्टार मैंने नहीं देखे।

मैं उनकी सादगी के ऐसे एक-दो किस्से और बताता हूं ,जो फिल्मी किस्सों से अलग हैं।

बात 2014 की है। उस साल परेश जी लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बन गए थे। तब सरकार ने उनकी स्टारडम को देखते हुए उन्हें बंगला अलॉट कर दिया। लेकिन परेश जी ने कहा, ‘मुझे बंगला नहीं चाहिए, बस फ्लैट दे दीजिए।’ सबने उन्हें खूब समझाया कि बड़े-बड़े लोग तक बंगले के लिए सोर्स लगाते हैं। मंत्रियों तक को बंगले नहीं मिल पाते हैं और आपको अलॉट हुआ है, वह भी 2-3 एकड़ का। इस पर परेश जी ने कहा, ‘ये बंगला मेरी सोच बदल सकता है। मैं मुंबई में फ्लैट में रहता हूं। अगर यहां बंगले में रहने की आदत पड़ गई तो मेरी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बढ़ जाएंगी। मैं फिर एमपी से मंत्री बनना चाहूंगा। हमेशा पावर में रहना चाहूंगा। मेरे भीतर पावर हंगर जाग जाएगी कि मैं बंगले मे रहूं, सरकारी गाड़ियों मे घूमूं। पर मुझे न पावर हंगर चाहिए, न बंगला। मैं मुंबई में फ्लैट में रहता हूं तो यहां भी फ्लैट में रहूंगा, ताकि मेरे अंदर कोई लालच या महत्वाकांक्षा पैदा नहीं हो जाए। मैं सांसद अपने लोगों के लिए काम करने आया हूं और जिस काम से आया हूं, वही करना चाहता हूं। मुझे अपने जीवन में कोई बदलाव नहीं चाहिए।’ और उन्होंने वह अलॉटेड बंगला छोड़ दिया।

इसी बात पर मुझे जुनैद हाजी लारी का एक शेर याद आता है: वो सादगी में भी है अजब दिलकशी लिए, इस वास्ते हम उसकी तमन्ना में जी लिए।

अब एक दूसरा किस्सा बताता हूं। वे विले पार्ले में रहते हैं। वे जब सांसद थे, तब उनके घर पर एक लड़की काम करती थी। उसे विदेश जाने के लिए पासपोर्ट बनवाना था। उसने परेश जी से कहा, ‘सर, आप एमपी हैं। अगर आप अपने लेटरहेड पर मेरे लिए एक सिफारिशी पत्र लिख देंगे कि आप मेरी गारंटी लेते हैं तो पुलिस वेरिफिकेशन में आसानी हो जाएगी।’ इस पर परेश जी ने तुरंत अपने सांसद वाले लेटरहेड पर वह पत्र लिख दिया।

वह लड़की पुलिस स्टेशन गई और इंस्पेक्टर को लेटर दिया। इंस्पेक्टर ने कहा, ‘हमें पता है परेश रावल जी अहमदाबाद से सांसद हैं, लेकिन तुम उनका पता गलत बता रही हो। वे यहां रहते ही नहीं।’ लड़की ने कहा, ‘सर, ये देखिए, उनके लेटरहेड पर यही पता लिखा है।’ इंस्पेक्टर ने कहा, ‘चलो, देखते हैं।’ फिर वह इंस्पेक्टर परेश जी के घर पहुंचा और वहां उन्हें देखकर चौंक गया। बोला, ‘सर, आप हमारे क्षेत्र में रहते हैं और हमें अब तक पता ही नहीं था।’ उसने बताया कि प्रोटोकॉल होता है कि जिस क्षेत्र में सांसद रहता है, वहां के पुलिस स्टेशन को खबर दी जाती है। उसके घर के बाहर हमेशा पुलिस की एक जीप रहती है। पेट्रोलिंग होती है। तो राजनीतिक जीवन में भी उन्होंने अपनी वही सादगी बनाए रखी।

इसी बात पर आज परेश रावल जी के सम्मान में उनकी फिल्म ‘ये तेरा घर ये मेरा घर’ का ये गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए :

‘हंसता हुआ ये प्यारा चेहरा तेरा…’



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