रसरंग में मायथोलॉजी:  कर्नाटक: तीन प्राचीन धर्मों के अनूठे संगम का रहा साक्षी
अअनुबंधित

रसरंग में मायथोलॉजी: कर्नाटक: तीन प्राचीन धर्मों के अनूठे संगम का रहा साक्षी

Spread the love


देवदत्त पट्टनायक3 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक
श्रीरंगपटना स्थित रंगनाथ स्वामी मंदिर। - Dainik Bhaskar

श्रीरंगपटना स्थित रंगनाथ स्वामी मंदिर।

पिछले सप्ताह के लेख में हमने विजयनगर साम्राज्य के बारे में जाना। यह भी जाना कि कैसे यह साम्राज्य तथा संपूर्ण दक्खन का क्षेत्र कर्नाटक राज्य कहलाता था और उसमें तथा आधुनिक कर्नाटक राज्य में अंतर को समझा। आइए इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कर्नाटक राज्य की अन्य राजनीतिक शक्तियों के बारे में भी जानते हैं।

आधुनिक कर्नाटक राज्य के क्षेत्र में वैदिक संस्कृति के आने से बहुत पहले वहां के प्रागैतिहासिक निवासी मृतकों के लिए विशाल डोलमेन पत्थर खड़े कर रहे थे। संभव है कि ये लोग पशुपालक और खनिक थे और 4000 वर्ष पहले हड़प्पा सभ्यता को सोना उपलब्ध कराते थे। एक किंवदंती के अनुसार, लगभग 2300 वर्ष पहले चाणक्य के शिष्य चंद्रगुप्त मौर्य अपने जीवन के अंतिम चरण में जैन धर्म अपनाकर एक भीषण सूखे के समय पाटलिपुत्र से मैसूर के क्षेत्र में आए थे। यहां उन्होंने अपने गुरु भद्रबाहु के साथ धार्मिक अनुष्ठान के तहत आमरण उपवास किया। उनके पोते सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाकर उत्तर कर्नाटक के क्षेत्र में कई आदेशपत्र और स्तूप बनवाए। दरअसल, यहां के सन्नति स्तूप में अशोक की सबसे प्राचीन प्रतिमा पाई जाती है।

लगभग 1400 वर्ष पहले चालुक्य राजाओं ने कन्नौज के राजा हर्षवर्धन के दक्षिणी विस्तार और अरबों के पूर्वी विस्तार को रोका। वे शिव और विष्णु के उपासक थे। उनके संरक्षण से बादामी, पट्टडक्कल और ऐहोले की गुफाओं में इन देवताओं की प्रारंभिक प्रतिमाएं बनवाई गईं और इस प्रकार राजनीति में हिंदू धर्म का निर्णायक प्रभाव शुरू हुआ। इसके बाद, लगभग 1200 वर्ष पहले राष्ट्रकूट राजवंश ने चालुक्यों की जगह लेकर कन्नौज पर अधिकार पाने की कोशिश की। इस प्रयास में उन्हें पूर्व के पाल राजवंश और पश्चिम के प्रतिहार राजवंश से संघर्ष करना पड़ा। अमोघवर्ष इस राजवंश के सबसे प्रसिद्ध सम्राट थे। वे सैन्य अभियानों और कूटनीति के साथ-साथ साहित्य में भी महत्वपूर्ण योगदान के लिए जाने जाते हैं। दुर्भाग्य से, इतने प्रसिद्ध राजा आज कर्नाटक के बाहर बहुत कम जाने जाते हैं।

करीब 1000 वर्ष पहले दक्षिण कर्नाटक के गंग राजवंश के समय जैन समुदाय ने मैसूर के पास गोमतेश्वर बाहुबली की सुप्रसिद्ध प्रतिमा बनवाई। यह वही स्थान है, जहां चंद्रगुप्त मौर्य ने आमरण उपवास किया था। इसके बाद पश्चिमी चालुक्य और चोल राजवंशों के बीच भीषण युद्ध हुए। इसी समय, दक्षिण कर्नाटक में 11वीं सदी में रामानुजाचार्य और 13वीं सदी में माधवाचार्य वेदांत का प्रचार करने लगे। दूसरी ओर, उत्तर कर्नाटक की भूमि पर 12वीं सदी में बसवण्णा ने मंदिर और जाति व्यवस्था को चुनौती दी। उन्होंने आत्म-लिंग के रूप में शिव की उपासना का संदेश दिया, जिसे श्रद्धालु अपने गले के तावीज में धारण करते थे।

गंग राजवंश के बाद होयसल राजाओं ने सत्ता संभाली। उनकी सहायता से कन्नड़ भाषा में जैन रामायण और महाभारत की रचना हुई। उन्होंने बेलूर और हलेबिडु में तारे के आकार वाले मंदिर बनवाए, जो अपनी अद्वितीय नक्काशी के लिए प्रसिद्ध हैं। इस काल में ग्रामीण समाज वीर-गल नामक पत्थर उन योद्धाओं की स्मृति में खड़े करता था, जिन्होंने गांवों की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए थे। जैसे-जैसे जैन धर्म का प्रभाव घटा, हिंदू धर्म का प्रभाव बढ़ने लगा। इसी समय कावेरी नदी के तीन द्वीपों पर विष्णु के रंगनाथ रूप को समर्पित मंदिर बनाए गए। आज इन मंदिरों के विशाल गोपुरम उनकी पहचान हैं, हालांकि ये गोपुरम मूल मंदिरों के निर्माण के बहुत बाद में विजयनगर साम्राज्य के समय शक्ति के प्रदर्शन के रूप में बनाए गए थे।

विजयनगर साम्राज्य के शुरुआती दौर में विरुपक्ष के रूप में शिव उसके संरक्षक देवता थे, जो कन्नड़ भाषी क्षेत्र में स्थित थे। लेकिन कृष्णदेवराय ने जब तेलुगु भाषी क्षेत्र पर नियंत्रण किया तो तिरुपति बालाजी उनके संरक्षक देवता बन गए। इससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय न केवल शिव और विष्णु उपासकों में, बल्कि राजदरबार में भी कन्नड़ और तेलुगु भाषियों के बीच प्रतिद्वंद्विता थी। कई यूरोपीय यात्री विजयनगर की भव्यता, उसकी समृद्धि और उसके अनेक बाजारों तथा मंदिरों को देखकर आश्चर्यचकित रह जाते। लेकिन सन 1565 में यह महानगर पांच दक्खनी सुल्तानों के हाथों नष्ट हुआ और उसके राजाओं को दक्षिण की ओर जाना पड़ा। इसके बावजूद इस भूमि में विजयनगर की स्मृतियां जीवित रहीं, वही भूमि जहां स्वयं श्रीराम ने सीता को मुक्त कराने के लिए सहायता प्राप्त की थी।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *