देवदत्त पट्टनायक5 घंटे पहले
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1954 के प्रयागराज कुम्भ (तब इलाहाबाद कुम्भ) की एक तस्वीर। फोटो साभार : जेम्स बुरके, स्रोत : लाइफ आर्काइव्स।
लोग नदियों के संगम अर्थात प्रयाग पर हजारों वर्षों से एकत्रित होते आए हैं। उत्तराखंड में पांच ऐसे प्रयाग हैं जिनसे गंगा नदी उत्पन्न होती है। प्रयागराज को यह नाम इसलिए दिया गया, क्योंकि वहां आकाशीय गंगा, पार्थिव यमुना और भूमिगत सरस्वती का संगम है। इस प्रकार, वहां तीन नदियों का संगम तीन लोकों के संगम का प्रतीक है।
साधारणतः ये मेले शिशिर अयनांत (नाशिक), वसंत विषुव (प्रयागराज), ग्रीष्म अयनांत (हरिद्वार) और शरद विषुव (उज्जैन) के समय होते हैं। इस समय सूर्य क्रमशः मकर, मेष, कर्क और तुला राशियों में प्रवेश करता है। भारत के विभिन्न भागों में चंद्र और गुरु ग्रह के स्थान के मद्देनजर यह समय और भी विशिष्ट बन जाता है।
पृथ्वी के आस-पास क्षितिज को लगकर आकाश 12 राशियों से बने एक महामार्ग समान है। चंद्र इस महामार्ग से प्रतिमाह, सूर्य प्रतिवर्ष और गुरु ग्रह 12 वर्षों में एक बार बढ़ता है। इसलिए 2021 में हरिद्वार में कुम्भ मेला तब हुआ जब गुरु ग्रह कुम्भ राशि में था। इस वर्ष प्रयागराज का कुम्भ मेला तब हो रहा है, जब गुरु ग्रह ऋषभ राशि में है और नाशिक तथा उज्जैन में कुम्भ मेले तब होंगे जब गुरु ग्रह सिंह राशि में होगा। जब गुरु ग्रह 144 वर्षों में पृथ्वी की 12 परिक्रमाएं पूर्ण करता है, तब महाकुम्भ होता है। संयोगवश इस वर्ष का कुम्भ मेला महाकुम्भ मेला है। ये नाम राजाओं द्वारा दिए गए, जो जानते थे कि लोग त्योहार पसंद करते हैं और आंकड़ों तथा तारों में तार्किक संबंध देखना चाहते हैं।
वैदिक ज्योतिषशास्त्र के अनुसार आकाशीय महामार्ग 27 नक्षत्रों में विभाजित है। उसे बारह राशियों में विभाजित करने की प्रथा बाद में लगभग 300 ईस्वी में रोमीय और यूनानी समुद्री व्यापारियों के साथ आई। हालांकि वेदों, रामायण और महाभारत में राशिचक्र का उल्लेख नहीं है, वह 500 ईस्वी में गुप्त राजाओं के समय के ज्योतिषशास्त्र पर लिखे रोमक सिद्धांत इत्यादि ग्रंथों का महत्वपूर्ण भाग बन गया।
शुरू में एकमात्र कुम्भ मेला गंगा नदी के पहाड़ों से मैदानों में प्रवेश स्थान अर्थात हरिद्वार में, मेष संक्रांति (वसंत विषुव) के दिन गुरु ग्रह के इस राशिचक्र में प्रवेश करने पर मनाया जाता था। अब, ‘कुम्भ’ शब्द का सभी मेलों के लिए उपयोग होता है, जैसे प्रतिवर्ष मकर संक्रांति (उत्तरायण के प्रारंभ) के निकट प्रयागराज में होने वाले माघ मेले और नाशिक के सिंहस्थ मेले के लिए, जो कर्क संक्रांति (दक्षिणायन के प्रारंभ) के निकट होता है।
500 ईस्वी के बाद जबसे हिंदू धर्म ज्यादातर मंदिरों और तीर्थयात्राओं पर केंद्रित हो गया, तबसे पुराणों में कई तीर्थस्थलों का उल्लेख किया गया। बौद्ध ग्रंथों में हिंदुओं को तीर्थिका कहा जाने लगा, जो तीर्थस्थल जाकर स्नान करके देवों तथा पूर्वजों को पूजते थे। सातवीं सदी के चीनी तीर्थयात्रियों के लेखनों में प्रयाग मेले का उल्लेख है और यह भी कि कैसे हिंदू मानते थे कि जिनकी मृत्यु इस मेले में होती थी, वे स्वर्ग पहुंचते थे।
नाशिक और उज्जैन में होने वाले तपस्वियों के मेलों को 17वीं सदी से मराठा सरदारों ने बढ़ावा दिया। ये मेले त्र्यम्बकेश्वर और महाकाल के मंदिरों से जुड़े थे। राजपूतों की तरह मराठा सरदार भी हिंदू धर्म के संरक्षक होने का दर्जा हासिल करना चाहते थे। ‘शाही’ और ‘पेशवाई’ जैसे शब्दों में मुगलों और मराठों का प्रभाव दिखाई देता है।
इस्लाम के सूफी गाजी योद्धाओं से लड़ने के उद्देश्य से 1500 के बाद शैव, वैष्णव और सिख तपस्वी-योद्धाओं के अखाड़े अस्तित्व में आए। लेकिन किंवदंतियों के अनुसार, उन्हें 700 इस्वी में आदि शंकराचार्य ने स्थापित किया था। कई वैष्णव तपस्वी-योद्धा अपने आप को परशुराम के वंशज मानते हैं। शैव तपस्वी-योद्धा अपने आप को भैरव और दत्तात्रेय के वंशज मानते हैं। सिख तपस्वी-योद्धा अपने आप को गुरु नानक के पुत्र श्रीचंद के वंशज मानते हैं। ये योद्धा न केवल तपस्वी बल्कि व्यापारी और साहूकार भी थे। वे मठ भी चलाते थे, जहां रहस्यमय अनुष्ठान होते थे।
वेदों में इन मेलों का उल्लेख नहीं है। लेकिन उपनिषदों में ज्ञानी पुरुषों का दर्शन शास्त्र पर विचार-विमर्श करने के लिए मिथिला में सम्मिलित होने का उल्लेख है। महाभारत में भी उल्लेख है कि कैसे ऋषि और राजा नदियों और तालाबों के किनारे एकत्र होते थे। विभिन्न प्रांतों में होने वाली गतिविधियों पर साधु इन मेलों में विचार-विमर्श करते थे। इन मेलों के कारण विचार फैलते गए। हालांकि आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और माधवाचार्य जैसे विद्वान भारतभर में अवश्य गए थे, लेकिन हम नहीं जानते कि क्या उन्होंने इन मेलों में भाग लिया था। हमें याद रखना होगा कि भारत में मेले कोई असामान्य नहीं हैं। आधुनिक काल के राजनीतिज्ञ उनका जिस तरह से प्रचार करते हैं, वैसे पहले नहीं होता था।








