देवदत्त पट्टनायक2 घंटे पहले
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वाराणसी स्थित आदि शंकराचार्य की प्रतिमा।
वैदिक ऋषियों को प्रायः चोटी में बंधे लंबे केशों के साथ चित्रित किया जाता है, जबकि वेदांत के दार्शनिक आदि शंकराचार्य को वस्त्र से ढके मुंडे हुए सिर के साथ। यह जानने पर कि प्राचीन भारत में ऋषि और साधु अपने केश कैसे रखते थे, हम समझ सकते हैं कि उस समय भौतिकता और उर्वरता की धारणाएं केशों के माध्यम से व्यक्त की जाती थीं। गौतम बुद्ध पहले तपस्वी थे, जिन्हें कला में दर्शाया गया। हालांकि वे लगभग 2,500 वर्ष पूर्व जीवित थे, लेकिन उनकी प्रारंभिक प्रतिमाएं 500 वर्ष बाद यूनानी शासन वाले गांधार क्षेत्र में दिखाई दीं। इन मूर्तियों में बुद्ध के घुंघराले केशों की चोटी बंधी है, जबकि उनके बारे में उपलब्ध जानकारी के अनुसार राजसी जीवन त्यागने पर उन्होंने सिर मुंडा लिया था। एक शिकारी ने मुंडे सिर वाले राजकुमार को देखकर शिकार न करने का निर्णय लिया था, क्योंकि ऐसा दृश्य अशुभ माना जाता था। संभवतः इसी कारण प्रारंभिक कलाकृतियों में बुद्ध को वृक्ष, पादुका या मुकुट के प्रतीकों से दिखाया गया। बाद में, उन्हें ‘उष्णीष’ नामक उभरी हुई चोटी के साथ दर्शाया गया, जो उनके ज्ञान का प्रतीक बनी। थाई कला में यह उष्णीष आगे चलकर ज्योति के रूप में रूपांतरित हो गई। इस भिन्नता ने स्पष्ट किया कि बुद्ध और चोटी रखने वाले अन्य वैदिक ऋषियों में गहरा अंतर था। पौराणिक कथाओं और मंदिर कला के माध्यम से देवताओं के केशों के बारे में भी बहुत कुछ जाना जा सकता है। शिव की जटाओं में स्वर्ग से उतरती गंगा को रोकने की शक्ति थी। राम ने वनवास जाते समय बरगद के रस से जटाएं बनाईं। कृष्ण के घुंघराले केश थे, जबकि बलराम के लंबे, मुलायम बालों का वर्णन मिलता है। देवी के लंबे, घने केश स्त्री-ऊर्जा का प्रतीक हैं। काली के बिखरे केश जहां उग्रता दर्शाते हैं, वहीं गौरी के फूलों से सजे वेणीबद्ध केश सौम्यता का प्रतीक हैं। धर्मशास्त्रों में द्विजों के सोलह संस्कारों में चूड़ाकरण या मुंडन संस्कार भी शामिल है। इसमें सिर मुंडाकर शीर्ष पर कुछ केश छोड़े जाते हैं। अंतिम संस्कार में भी यही किया जाता है। थोड़े केश बचाकर रखने से यह सुनिश्चित किया जाता है कि सांसारिक और गृहस्थ जीवन से संबंध पूर्णतः नहीं तोड़े जाते। वहीं विधवा का पूरा सिर मुंडाकर उसे वस्त्र से ढक दिया जाता था, यह दर्शाने के लिए कि अब वह अशुभ हो गई है और इसलिए उसे संतानों को जन्म देने की अनुमति नहीं थी।
वैदिक विधिवादियों से अपेक्षित था कि वे शीर्ष पर कुछ केश बचाकर रखें। इसे शिखा कहते थे और उसकी गांठ बांधी जाती थी। गांठ को छुड़ाना इस बात का प्रतीक था कि वह व्यक्ति आपे के बाहर हो चुका है, जैसे चाणक्य हुए थे। द्रौपदी ने अपने वस्त्रहरण के पश्चात यही किया था। इस प्रकार ब्राह्मण अपना सिर मुंडाकर चोटी रखते थे, गृहस्थ केशों को संवारते थे, वनवासी तपस्वी जटाधारी होते थे और साधु अपना सिर पूरी तरह मुंडाते थे। दक्षिण भारत में दो प्रकार के वैदिक विधिवादी होते थे। ये अपनी चोटी कपोल की ओर बांधते थे। वे ‘मुन कुदुमी’ या ‘पूर्व शिखा’ ब्राह्मण कहलाते थे, जैसे केरल के नंबूदिरी और तमिलनाडु के चिदंबरम मंदिर के पुजारी। बाद में आए ‘पिन कुदुमी’ ब्राह्मण चोटी पीछे बांधते थे। आदि शंकराचार्य मुन कुदुमी ब्राह्मण थे, जिन्होंने साधु रूप धारण किया था। इतिहासकार मानते हैं कि आदि शंकराचार्य 8वीं सदी में हुए, हालांकि उनसे जुड़े आख्यान पांच सदियों बाद रचे गए। इन कथाओं में वे वेदांत के गूढ़ दार्शनिक भी हैं और तांत्रिक शक्तियों के स्वामी भी। उन्होंने बौद्धों और वैदिक कर्मकांडियों, दोनों को शास्त्रार्थ में पराजित किया और कहा जाता है कि वे मृत शरीरों में भी प्राण फूंक सकते थे। शंकराचार्य ने साधु और ब्राह्मण, दोनों परंपराओं को चुनौती दी और तपस्वियों जैसे कार्य किए। उनके मुंडे सिर ने उन्हें अलग पहचान दी। कहा जाता है कि जब उन्होंने वैदिक विद्वान मण्डन मिश्र को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी तो मण्डन मिश्र उनके मुंडे सिर को देखकर अप्रसन्न हुए थे। इतिहासकारों ने पाया है कि छठी सदी से दक्षिण भारत में शैव मठों का प्रसार हुआ। भ्रमणशील जटाधारी पाशुपतों के विपरीत ये मठवासी दार्शनिक मंदिरों से जुड़े और अधिक सौम्य थे। इन मठों में बौद्ध और जैन परंपराओं की झलक मिलती है। इसलिए जब शंकराचार्य ने निर्गुण ब्रह्म की अवधारणा प्रस्तुत की और मुंडन अपनाया, तब उन्हें ‘प्रच्छन्न बुद्ध’ यानी गुप्त बौद्ध कहा गया। कथाओं के अनुसार, मण्डन मिश्र की भावनाओं को ठेस न पहुंचे, इसके लिए शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ के समय अपना ‘अशुभ’ मुंडा सिर वस्त्र से ढक लिया था। संभवतः हिंदू साधुओं द्वारा सिर ढकने की परंपरा की शुरुआत यहीं से हुई।








