रसरंग में मायथोलॉजी:  प्रत्येक आख्यान में हैं जल-प्लावन की अलग-अलग कथाएं
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रसरंग में मायथोलॉजी: प्रत्येक आख्यान में हैं जल-प्लावन की अलग-अलग कथाएं

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बाढ़, जल-प्लावन या प्रलय-संबंधी आख्यान विश्वभर की अनेक संस्कृतियों में मिलते हैं। यद्यपि इन कथाओं में जल-प्लावन की घटना समान प्रतीत होती है, किंतु इनके अर्थ, कारण और दार्शनिक आधार एक-दूसरे से भिन्न हैं। आइए, आज इन अंतरों को समझने का प्रयास करते हैं। सबसे प्रसिद्ध बाढ़-वृत्तांत बाइबल के ओल्ड टेस्टामेंट में मिलता है। इसके अनुसार, मानवता की बढ़ती क्रूरता से क्षुब्ध होकर सृष्टिकर्ता यानी एकमात्र ईश्वर ‘जेहोवाह’ ने पृथ्वी को जलमग्न कर देने का निश्चय किया। चूंकि ‘नोआह’ एक नेक व धर्मनिष्ठ इंसान थे, इसलिए जेहोवाह ने उन्हें आगामी विनाश की सूचना देकर सुरक्षित रहने का मार्ग बता दिया। ईश्वर के निर्देश पर नोआह ने एक विशाल नौका का निर्माण किया और प्रत्येक प्रजाति के एक नर और एक मादा को उसमें स्थान दिया। जल स्तर के घटने के पश्चात उसी के माध्यम से पृथ्वी पर जीवन का पुनः प्रसार हुआ। यही कथा यहूदी और इस्लामी परंपराओं में भी अलग-अलग रूपों में मिलती है। बाइबल का यह आख्यान प्राचीन सुमेर की परंपराओं से उत्पन्न माना जाता है, जहां आज का इराक स्थित है। लेकिन वहां केवल एक देवता नहीं, बल्कि ‘अनुनकी’ नामक देवसमूह मनुष्यों के कोलाहल से क्रोधित होकर पृथ्वी पर जल-प्रलय लाता है। केवल उत-नापिशतिम नामक व्यक्ति को जीवनदान दिया जाता है। उसने सरकंडों से निर्मित नौका के माध्यम से स्वयं को सुरक्षित रखा। लगभग 4,000 वर्ष पुराने गिलगमेश के महाकाव्य में वर्णित यह कथा बाद में लगभग 2,500 वर्ष पुरानी बाइबल परंपरा में नोआह की कहानी के रूप में रूपांतरित हुई। यूनान में भी इसी प्रकार की कथा मिलती है। वहां मनुष्यों के निरंतर संघर्षों से व्यथित होकर देवताओं के अधिपति ज़ीउस ने एक बाढ़ भेजकर मानवता का विनाश किया। लेकिन बाढ़ के आने से पहले प्रोमीथीअस नामक देवता के हस्तक्षेप के कारण एक व्यक्ति बच गया। इस कथा में वह व्यक्ति डेडेलस बताया गया है, जिसने अपने कंधों के पीछे पत्थर फेंके, जिनसे मनुष्यों की उत्पत्ति हुई। स्पष्ट है कि यह यूनानी आख्यान भी सुमेर की परंपरा से प्रभावित है। इन सभी पश्चिमी आख्यानों में जल-प्रलय दैवी क्रोध का परिणाम है, चाहे वह एकमात्र ईश्वर का हो या देवसमूह का। किंतु चीन और भारत की कथाओं में किसी क्रोधित देवता का उल्लेख नहीं मिलता।
चीनी आख्यानों के अनुसार, सर्वोच्च देवी ‘नूवा’ ने अपने मनोरंजन हेतु मनुष्यों की रचना की थी। उन्होंने पीली मिट्टी से कुलीन वर्ग और भूरी मिट्टी से सामान्य जन की सृष्टि की। एक दिन देवताओं के बीच लड़ाई के कारण जिन स्तंभों पर स्वर्ग टिका था, वे नष्ट हो गए और मूसलाधार वर्षा आरंभ हो गई। इससे पृथ्वी जलमग्न हो गई। तब नूवा ने एक विशाल कछुए के पैरों की सहायता से स्वर्ग की दरार को भर दिया और वर्षा रुक गई। इन्हीं कथाओं में विश्व के प्रथम जल-प्रबंधक अभियंता (हाइड्रोलिक इंजीनियर) ‘यू’ का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने नदियों के जल को नियंत्रित करने के लिए नहरों का निर्माण किया और आगे चलकर सम्राट घोषित हुए। हिंदू आख्याना में भी व्यापक जल-विनाश का वर्णन मिलता है, जो प्रलय-काल में घटित होता है। इसका प्रारंभिक उल्लेख शतपथ ब्राह्मण में है और आगे चलकर विष्णु पुराण में विस्तार से वर्णित हुआ। कथा के अनुसार, मनु ने एक छोटी मछली को बड़ी मछली से बचाकर उसका पालन किया। समय के साथ वह मछली विराट रूप धारण कर लेती है। जब प्रलय आता है, तब मनु उसके निर्देशानुसार नौका का निर्माण करते हैं और वह मछली, जो वास्तव में विष्णु की मत्स्यावतार है, नौका को मेरु पर्वत के शिखर तक ले जाकर उनकी रक्षा करती है। इन कथाओं के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि कहीं यह घटना विश्व की संध्या के समय या फिर मानवता के लोभ के कारण घटित हुई। मनु बढ़ती मछली के तैरने के लिए अधिक पानी मांगते गए और उसके अंत में प्रलय आ गया। यहां बाढ़ एक नैसर्गिक घटना है। वह संस्कृति के दूषित होने का परिणाम है और विश्व के वृद्ध होने की प्रक्रिया का ही एक भाग है। यहां बाढ़ देवताओं के क्रोधित होने या फिर मानवता की अवज्ञा से संबंधित नहीं है। इस प्रकार, प्रत्येक संस्कृति में जल-प्रलय की कथा अपने विशिष्ट दार्शनिक और सांस्कृतिक अर्थों के साथ उपस्थित होती है।



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