देवदत्त पट्टनायक57 मिनट पहले
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उज्जैन स्थित विक्रमादित्य परिसर में चमत्कारी सिंहासन पर विराजमान राजा विक्रमादित्य की प्रतिमा।
एक दिन राजा भोज अपने नगर के निकट एक मैदान से जा रहे थे। वहां उन्होंने कुछ अनोखा देखा। अपने सिपाहियों के साथ उस खेत के पास बढ़ते ही एक किसान चिल्लाया, ‘दूर रहें, इस खेत से दूर रहें। आपके अश्व मेरी फसल को नष्ट कर देंगे। क्या आप मुझ जैसे दीन लोगों पर थोड़ी-सी भी दया नहीं करेंगे?’ इस चिड़चिड़े किसान के व्यवहार से चकित होकर राजा भोज दूर जाने लगे। लेकिन पीठ फेरते ही किसान मीठे स्वर में बोलने लगा, ‘ओ राजा, कहां जा रहे हों? आइए, मेरे खत में पधारें। मैं आपके अश्वों को पानी पिलाऊंगा और आपके सिपाहियों को भोजन दूंगा। निश्चित ही आप इस किसान के आतिथ्य को नकारेंगे नहीं।’
राजा भोज किसान को दुखी नहीं करना चाहते थे। इसलिए उसके स्वभाव में बदलाव पर मन ही मन हंसते हुए वे दोबारा खेत की ओर बढ़ने लगे। किसान फिर से चिल्लाया, ‘आगे न बढ़ें। आपके अश्व मेरी फसल को नष्ट कर देंगे। ओ दुष्ट राजा, चले जाएं।’ एक बार फिर राजा भोज मुड़ गए। किसान फिर से बोला, ‘अरे, आप जा क्यों रहे हैं? लौट आएं। आप मेरे अतिथि हैं। मुझे आपकी सेवा करने का अवसर दें।’
भोज किसान के व्यवहार को लेकर सोच में पड़ गए। किसान को ध्यानपूर्वक देखने पर वे समझ गए कि किसान तभी चिल्लाता था, तब वह खेत में खड़ा होता था। लेकिन मैत्रीपूर्ण स्वर में राजा से अपने पास आने का निवेदन करते समय वह खेत के बीच में एक टीले पर खड़ा होता था। भोज समझ गए कि किसान के बदलाव में व्यवहार और उस टीले के बीच कोई न कोई संबंध जरूर है। उन्होंने तुरंत अपने सिपाहियों को टीला खोदने का आदेश दिया। स्वभावतः किसान ने उनका विरोध किया, लेकिन भोज ने उस पर ध्यान नहीं दिया।
टीले के अंदर से एक उत्कृष्ट सिंहासन निकला जो सोने से बना था। राजा भोज जैसे ही उस पर बैठने लगे, वैसे ही सिंहासन बोल उठा, ‘यह महान राजा विक्रमादित्य का सिंहासन है। इस पर आप केवल तभी बैठें, यदि आप उनके जितने उदार और ज्ञानी हैं। नहीं तो सिंहासन पर ही आपकी मृत्यु हो जाएगी।’ फिर सिंहासन ने भोज को विक्रमादित्य की बत्तीस कहानियां सुनाईं। प्रत्येक कहानी में राजत्व की एक विशेषता पर प्रकाश डाला गया था। उदारता सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी। इन कहानियों के माध्यम से भोज को समझ में आया कि अच्छा राजा बनने के लिए क्या करना पड़ता है।
‘सिंहासन बत्तीसी’ भारतीय लोकसाहित्य का महत्वपूर्ण भाग है। इन कहानियों को बहुधा बच्चों की कहानियां माना जाता है, जो उनका तिरस्कार करने के समान है। यह इसलिए कि उनका उद्देश्य सदा से बच्चों का मनोरंजन करना नहीं, बल्कि भविष्य के नेताओं के मन को आकार देना था। बच्चों की कहानियों का यह उद्देश्य हम बहुत पहले भूल चुके हैं और इसलिए बहुत कम लोग कहानी के सबसे रोचक भाग पर ध्यान देते हैं – धरती पर खड़ा वह किसान असुरक्षित और स्वार्थी है। लेकिन टीले, जिसके नीचे सिंहासन है, पर खड़े होते ही वह उदार बन जाता है। धरती पर वह साधारण व्यक्ति है, जबकि टीले पर वह आदर्श राजा जैसा बन जाता है।
इस कहानी का दूसरा भाग भी उतना ही रोचक है। सिंहासन राजा भोज को उस पर बैठने नहीं देता है। उसकी कई कहानियों के माध्यम से वह राजा से पूछते रहता है कि क्या वे राजा विक्रमादित्य जितने गुणवान और उदार हैं? तो क्या सिंहासन साधारण व्यक्ति को उदार राजा में बदलता है या क्या किसी व्यक्ति का पहले उदार बनना आवश्यक है, ताकि वह सिंहासन पर बैठने योग्य बन सकें? जो भी हो, भारतीय लोकसाहित्य में उदारता राजत्व और फलस्वरूप नेतृत्व की विशेषता प्रतीत होती है।
लोग राजाओं और नेताओं को तब याद करते हैं, जब वे अपनी प्रजा के हित में कुछ करते हैं। उनसे अपेक्षित होता है कि वे अपनी प्रजा को जीने और पनपने में मदद करें। वे दाता और संरक्षक हैं। जब राजा और नेता अपने बारे में, अपनी महिमा के बारे में और अपने वंश के बारे में सोचने लगते हैं, तब वे अपनी प्रजा का ‘दुरुपयोग’ करते हैं। फिर राजा अपने राज्य के माध्यम से अपनी सत्ता बढ़ाकर भोगी बन जाते हैं।








