रसरंग में मायथोलॉजी:  पूंजीवाद ने किस तरह एक धर्म के विकास में दिया योगदान!
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रसरंग में मायथोलॉजी: पूंजीवाद ने किस तरह एक धर्म के विकास में दिया योगदान!

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देवदत्त पट्टनायक5 घंटे पहले

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इंडोनेशिया के जावा स्थित बोरोबुदुर बौद्ध मंदिर। नौवीं सदी में निर्मित इस मंदिर को दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर माना जाता है। करीब 15 हजार वर्गमीटर में फैले मुख्य परिसर में बुद्ध की 504 मूर्तियां स्थापित हैं। यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर भी घोषित कर रखा है। - Dainik Bhaskar

इंडोनेशिया के जावा स्थित बोरोबुदुर बौद्ध मंदिर। नौवीं सदी में निर्मित इस मंदिर को दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर माना जाता है। करीब 15 हजार वर्गमीटर में फैले मुख्य परिसर में बुद्ध की 504 मूर्तियां स्थापित हैं। यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर भी घोषित कर रखा है।

हमें हमेशा से यह बताया गया है कि पूंजीवाद का उद्भव यूरोप में हुआ। वास्तव में, आज का आधुनिक पूंजीवाद यूरोप की औद्योगिक क्रांति का परिणाम है। लेकिन औद्योगिक क्रांति से पहले भी पूंजीवाद उन व्यापारिक मार्गों पर पनप रहा था, जिन पर अरब व्यापारियों का नियंत्रण था। ये मार्ग दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर भूमध्यसागर तक फैले थे और बगदाद इस नेटवर्क का केंद्रीय शहर था। यह लगभग एक हजार वर्ष पहले की बात है।

इससे भी एक हजार वर्ष पहले दुनिया के लगभग सभी प्रमुख व्यापारिक मार्ग बौद्ध व्यापारी-राज्यों के अधीन थे। यूरोपीय इतिहासकारों ने बौद्ध धर्म के इस आर्थिक पहलू की जानबूझकर अनदेखी की है, क्योंकि उन्नीसवीं सदी से उनका प्रयास बौद्ध धर्म को मुख्यतः एक आध्यात्मिक या अतींद्रिय धर्म के रूप में प्रस्तुत करने का रहा है। जबकि सच्चाई यह है कि वैश्विक व्यापारिक नेटर्वक और बाजारों को विस्तार देने में बौद्ध धर्म की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका थी।

कहा जाता है कि बुद्ध को ज्ञान प्राप्त होने के बाद उन्हें पहला भोजन दो व्यापारियों ने कराया था। ये दोनों व्यापारी बुद्ध की प्रज्ञा से गहरे प्रभावित थे, लेकिन वे संन्यासी नहीं बनना चाहते थे। तब बुद्ध ने उन्हें अन्य साधुओं की सेवा करने का सुझाव दिया। बौद्ध आख्यानों के अनुसार, इन व्यापारियों से कहा गया कि मठों और उनमें रहने वाले भिक्षुओं की देखभाल कर वे बौद्ध सिद्धांतों के प्रसार में योगदान दे सकते हैं और ऐसा करने से उन्हें पुण्य मिलेगा, जो आगे चलकर उनकी समृद्धि का कारण बनेगा। इस प्रकार, मठों की सेवा को पुण्य और समृद्धि से जोड़ने के विचार में बौद्ध पूंजीवाद की नींव दिखाई देती है।

इन व्यापारियों ने साधुओं के विश्राम हेतु पहाड़ों में गुफाए बनवाईं और स्तूप, चैत्य तथा विहारों का निर्माण कराया। स्तूपों में बुद्ध के अवशेष रखे जाते थे, चैत्य मंदिरों की तरह थे और विहारों में भिक्षु निवास करते थे। व्यापारियों ने मठों को कृषि-भूमि दान में दी। उस भूमि से होने वाली उपज एवं उसकी बिक्री से मठों की देखभाल की जाती थी। आगे चलकर मठों ने इन्हीं कृषि अनुदानों की मदद से विश्वविद्यालय भी स्थापित किए। व्यापारी अक्सर अपनी संपत्ति इस शर्त पर दान करते थे कि मठों का पालन-पोषण केवल प्राप्त ब्याज से हो। इस प्रकार बौद्ध धर्म में मठ-व्यवस्था को स्थायी और आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए विभिन्न वित्तीय अनुबंध और साधन विकसित हुए।

शुरुआत में व्यापारी साधुओं को प्रतिदिन भोजन देकर सहायता करते थे। बाद में उन्होंने उन्हें भूमि दान में देनी शुरू की, जिसे किराए पर दिया जाने लगा। उस भूमि की उपज से प्राप्त धन मठों की देखभाल में लगाया जाता था या फिर पूंजी के रूप में संचय किया जाता था। इस प्रकार दान की गई भूमि मठों के लिए अक्षय निधि बन गई। इस जमा पूंजी से अन्य व्यापारियों को ऋण दिया जाता था और उस पर ब्याज कमाया जाता था। धीरे-धीरे किराए और ब्याज की आय से बौद्ध मठ अत्यधिक संपन्न हो गए।

कई मायनों में यह समृद्धि बौद्ध धर्म के अनात्मन सिद्धांत से जुड़ी है। इस सिद्धांत के अनुसार विश्व में कोई आत्मा नहीं होती, जबकि हिंदू धर्म मानता है कि प्रत्येक मनुष्य में एक आत्मा होती है और उसके कर्म उसे किसी एक जाति में जन्म लेने के लिए बाध्य करते हैं।

बौद्ध धर्म में कर्म की व्याख्या अलग थी। उसके अनुसार, मनुष्य किसी ब्रह्मांडीय कर्तव्य से बंधा नहीं है, इसलिए हर व्यक्ति में अपनी आर्थिक स्थिति सुधारकर सफल व्यापारी बनने की स्वतंत्र इच्छा है। इसे साकार करने के लिए मठों की सहायता करना आवश्यक माना गया। इस प्रकार, कोई निर्धन व्यक्ति भी व्यापार के माध्यम से संपन्न बन सकता था और यदि वह अपने व्यापार से मठों की सहायता करता तो उसका व्यापार और भी अधिक फलता-फूलता। ऐसी अनेक कहानियां बौद्ध जातक कथाओं में मिलती हैं, जहां भिक्षुक भी नैतिक व्यापार करके और अपनी कमाई से साधुओं की सहायता कर बड़े उद्योगपति बन जाते थे।

इतिहासकार अक्सर बौद्ध धर्म के इस आर्थिक पक्ष को नजरअंदाज कर देते हैं। इसके बजाय वे इस तथ्य पर प्रकाश डालना पसंद करते हैं कि बुद्ध ने राजकुमार होते हुए भी सांसारिक जीवन का त्याग किया था। परंतु वास्तविकता यह है कि बुद्ध ने संभवतः दुनिया का पहला ऐसा धर्म स्थापित किया था जो समृद्धि को बढ़ावा देता था।

समृद्धि ने दिया उत्कृष्ट कलाओं को जन्म

बौद्ध धर्म की समृद्धि सबसे पहले गंगा के मैदानों में दिखाई दी, फिर दक्षिण में दक्खन के क्षेत्र में पहुंची और आगे चलकर आंध्र प्रदेश के अमरावती तथा उत्तर-पश्चिम भारत के गंधार तक फैल गई। इसके बाद यह समृद्धि दक्षिण भारत के अन्य हिस्सों, श्रीलंका, थाईलैंड, म्यान्मार, मलेशिया, मध्य एशिया और वहां से चीन और जापान तक पहुंची। जहां-जहां बौद्ध भिक्षुओं ने धम्म का प्रचार किया, वहां-वहां व्यापारिक नेटवर्क, वित्तीय संरचनाएं और समृद्धि का प्रसार होता गया। इसी समृद्धि की वजह से उत्कृष्ट कलाओं का जन्म हुआ, जैसे अफगानिस्तान के बामियान में बुद्ध की विशाल प्रतिमाएं और इंडोनेशिया के बोरोबुदुर के भव्य मंदिर परिसर।

– devdutthindi@gmail.com



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