रूमी जाफरी7 घंटे पहले
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‘फिल्म फेयर’ के 7 मार्च 1952 को प्रकाशित पहले अंक के कवर पर कामिनी कौशल को जगह मिली थी।
पिछले दिनों फिल्म इंडस्ट्री की सबसे सीनियर हीरोइन, राइटर, डायरेक्टर और पपेट आर्टिस्ट कामिनी कौशल जी का निधन हो गया। तो दिल ने चाहा कि मैं भी उनके बारे में कुछ लिखूं। आज मेरे हिस्से के किस्से में बात कामिनी कौशल जी की। मैं बहुत खुशनसीब हूं कि मुझे उनके साथ एक ही फिल्म सही, मगर काम करने का मौका मिला। फिल्म थी ‘हर दिल जो प्यार करेगा’, जिसमें कामिनी कौशल जी, रानी मुखर्जी और प्रीति जिंटा की दादी का रोल कर रही थीं। उनकी आंखों और चेहरे में इतनी ममता थी कि उन्हें देखकर लगता था जैसे वे आपकी सगी मां, दादी या नानी हों। जब मैंने पहली बार उनका हाथ पकड़ा तो मुझे महसूस हुआ कि उनका स्नेह और ममता तो सिर्फ स्पर्श मात्र से ही मिल रहा है। बहुत पॉजिटिव एनर्जी थी उनके अंदर।
मुझे अच्छी तरह याद है, जब मैं उन्हें सीन सुनाने गया था। उस सीन में रानी और प्रीति का डायलॉग था कि दादी, आप तो इतनी सुंदर हैं, जवानी में तो आपने कहर ढाया होगा। दादी हंसती हैं और कहती हैं कि जब हम जवान थे, तो इतनी सख्ती थी कि हमने तो कुछ किया ही नहीं। तब वे दोनों कहती हैं कि ओह, तो जवानी में आप सीता और सावित्री की तरह पवित्र रहीं। दादी बनी कामिनी जी का जवाब था, बेटा, हमारे बचपन और जवानी के दिनों में न पब थे, न डिस्को थे, न थिएटर, न रेस्टॉरेंट, न कैफे। ऐसी कोई जगह नहीं थी, जहां बैठकर मस्ती कर सकें। चूंकि मौके नहीं थे और शायद इसीलिए मजबूरी में अच्छे भी थे, पवित्र भी थे। सीता और सावित्री तो तुम लोग हो, जो इतने बड़े शहर में रहती हों, जहां प्रलोभन है, पब हैं, पार्टियां हैं, यह सब होने के बावजूद भी पाक-साफ रहकर लौटती हो। इसलिए असली सीता-सावित्री तो तुम हो। मैं सीन देकर आया। थोड़ी देर बाद ही उनका असिस्टेंट आया कि कामिनी जी बुला रही हैं। मैं मिलने गया तो उन्होंने कहा कि तुम जो डायलॉग सुनाकर गए, उससे मैं अपने बचपन और जवानी वाले लाहौर पहुंच गई। उस वक्त लाहौर हिंदुस्तान का सबसे बड़ा और मॉडर्न शहर था, पर वहां करने जैसा कुछ भी नहीं था। पूरा शहर एक-दूसरे को जानता था। कहीं भी जाओ, जानने वाले मिल जाते थे और घर पर खबर पहुंच जाती थी कि कामिनी को फलानी सड़क या मार्केट में देखा, जबकि घर में कोई पाबंदी नहीं थी। पिता कम उम्र में गुजर गए थे। बड़े भाई पिता समान थे। कहते थे कि जो जी में आए करो, बस गलत काम मत करना। फिर मैंने घुड़सवारी की, स्विमिंग की, साइकिलिंग की, नाटक किया, डांस किया, सब कुछ किया।
हमारी शूटिंग का सेट कमालिस्तान में लगा था। कामिनी जी बोलीं कि बेटा, जब मैं मेन गेट से सेट तक आती हूं तो मुझे लाहौर वाला घर बहुत याद आता है। चारों तरफ पेड़ ही पेड़ थे। बाहर से घर नजर नहीं आता था। ऐसा ही ड्राइववे था। मेरे पिताजी बॉटनी के प्रोफेसर थे। उन्हें फादर ऑफ बॉटनी कहा जाता था। इसलिए घर में हर तरफ पेड़-पौधे और फल लगे हुए थे। हमने बहुत सारे जानवर भी पाले थे। उस समय जानवर पालने में मनाही नहीं थी। सच मानो, पार्टीशन में हम उस घर से निकल आए, लेकिन मेरी यादों से वह घर आज भी नहीं निकला। वह रोज मेरे खयालों और ख्वाबों में आता है। अब जब मैं यहां शूटिंग कर रही हूं तो वह घर मुझे हर दिन याद आता है।
इसी बात पर मुझे एक शेर याद आ रहा है: कदम कदम पर मोहब्बत ने पांव पकड़े हैं आसान नहीं है छोड़ कर आना वतन का उनकी पहली फिल्म ‘नीचा नगर’ नहीं थी, जैसा कि माना जाता है। उनकी पहली फिल्म उनके सगे भाई ने बनाई थी, जब वे 7 साल की थीं। फिल्म का नाम था ‘द ट्रेजेडी’। यह एक शॉर्ट फिल्म थी। फिर वयस्क होने के बाद उन्होंने पहली फिल्म ‘नीचा नगर’ की थी और यही वह पहली भारतीय फिल्म थी जिसे कांस फिल्म फेस्टिवल में ‘पेलन डॉर’ मिला था। गीता दत्त का पहला गीत फिल्म ‘दो भाई’ के लिए था, जो कामिनी कौशल जी की ही फिल्म थी। और लता जी ने जिस हीरोइन के लिए पहला प्लेबैक गाया, वह फिल्म थी ‘जिद्दी’, जिसका गाना कामिनी कौशल जी पर फिल्माया गया। फिल्मफेयर के पहले एडिशन के कवर पर जिस हीरोइन की पहली तस्वीर छपी, वो भी कामिनी कौशल ही थीं।
वही पहली हीरोइन थीं, जिन्होंने बच्चों की कहानियां लिखीं, बच्चों के सीरियल बनाए, पपेट शो बनाए और पहली बार पपेट और इंसान को एक साथ परदे पर उतारा। वे बहुत लो प्रोफाइल थीं, मीडिया और पब्लिसिटी से दूर रहती थीं। लेकिन जब मैं उनके बारे में सोचने और लिखने बैठा तो एहसास हुआ कि फिल्म इंडस्ट्री के इतिहास में कामिनी कौशल जैसी टैलेंटेड कलाकार मुझे याद नहीं आता, जो इतनी सारी विधाओं में पारंगत हो। ईश्वर उन्हें सर्वोच्च स्थान प्रदान करें। इसी बात पर कामिनी कौशल जी को याद करते हुए उनकी फिल्म दो भाई का गीता दत्त द्वारा गाया यह गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए, खुश रहिए: मेरा सुंदर सपना बीत गया…







