रूमी जाफरी2 घंटे पहले
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परसों यानी 25 फरवरी को दिव्या भारती की सालगिरह है। वैसे तो साजिद (नाडियाडवाला) को अगर भाई कहूं तो दिव्या मेरी भाभी थी, लेकिन उसने मुझे राखी बांधी थी। तो वो मेरी बहन ज्यादा थी। उसके साथ यादों का लंबा सिलसिला रहा है। वैसे तो दिव्या भारती स्टार थी, मगर उसका दिल और दिमाग एक छोटे बच्चे की तरह था। वो कभी-कभी ऐसी बातें, ऐसी हरकतें करती थीं कि एकदम छोटी-सी बच्ची नजर आने लगती थी। आज एक किस्सा इसी तरह का बताता हूं।
एसएनडीटी कॉलेज में मेरी फिल्म ‘वक्त हमारा है’ का मुहूर्त था। दिव्या मुबारकबाद देने आई। फिर बोली कि मैं थोड़ी देर में लिंकिंग रोड होकर आती हूं और वो चली गई। इधर हम लोग शूटिंग में बिजी हो गए। अक्षय कुमार, पहलाज निहलानी, सुनील शेट्टी सहित कई लोग थे। गोविंदा भी आए थे, क्योंकि वे क्लैप देने के लिए गेस्ट थे। एक-डेढ़ घंटे बाद दिव्या दो टी-शर्ट लेकर आई, एक मेरे लिए और एक साजिद के लिए। उसने कहा कि मेरी तरफ से गिफ्ट है और फिर जान-बूझकर अपना हाथ आगे रख दिया। उसकी आंखें नम थीं। मैंने जब उसका हाथ ध्यान से देखा तो उस पर चोट लगी हुई थी। जब पूछा तो दिव्या ने बताया कि लिंकिंग रोड पर एक लड़के ने मुझको मारा। ये सुनकर तो सब लोग भड़क गए। सब बोले कि तुमने लड़के को पकड़ा क्यों नहीं तो दिव्या बोली कि मैं उसका घर देखकर आई हूं। ये सुनकर सब लोग जोश में आ गए और बोले कि चलो, चलते हैं। मगर मुझे ये बात हजम नहीं हो रही थी कि आखिर एक लड़का यूं ही किसी लड़की को क्यों मारेगा! फिर भी मैंने कहा कि ठीक है, चलते हैं। दिव्या की कार में मैं ड्राइविंग सीट पर बैठ गया और दिव्या मेरे बगल में बैठ गई। गाड़ी लेकर हम लोग चले और लिंकिंग रोड पर लेफ्ट लेकर एक बिल्डिंग के पास पहुंचे। दिव्या बोली कि बस यही बिल्डिंग है। यहीं पर रोक दो। हमने गाड़ी रोक दी और उतरकर भीतर कंपाउंड में आ गए। दिव्या ने कहा कि जो एक लड़का टोपी पहनकर खेल रहा है, उसने मारा। मेरी फिर दिव्या के हाथ पर नजर पड़ी तो मैंने पूछा कि तुम्हारी ऊपर की खाल कैसे निकली? इस पर वो बोली कि लड़के को मैंने पंच मारा और उसने अपना चेहरा हटा लिया। तो ये जो गेट का पिलर है न, उस पर मेरा हाथ पड़ गया। उसी से मेरा हाथ छिल गया। मैंने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा और पूछा कि तूने पंच मारा, मतलब?
इतने में सब लोग जाकर उस लड़के को पकड़ लाए। मैंने देखा कि वो बेचारा तो करीब 14-15 साल का एक प्यारा-सा बच्चा था। बाकी बच्चे भी आ गए तो मैंने पूछा कि क्या हुआ? तो उस बच्चे ने बताया कि हम लोग बैडमिंटन खेल रहे थे और ये कार लेकर हमारे कंपाउंड में आ गईं। इन्होंने हमारे चलते खेल के बीचो-बीच कार खड़ी की और लॉक करके जाने लगीं। हमने पूछा कि आप कहां जा रही हों और हमारी बिल्डिंग में क्यों पार्क कर रही हों? तो उन्होंने कहा कि बाहर पार्किंग नहीं है। हम बोले तो क्या आप ऐसे किसी भी बिल्डिंग के नीचे पार्क कर देंगी। आप ये गाड़ी लेकर जाइए, नहीं तो हम सोसाइटी में रिपोर्ट कर देंगे या आपकी गाड़ी के टायर की हवा निकाल देंगे। इस पर उन्होंने मुझे मुक्का मारने की कोशिश की। मैं हट गया तो इनका मुक्का दीवार पर जा पड़ा। उसके बाद इन्होंने मेरा बैडमिंटन का रैकेट छीन लिया और उससे मुझे मारने लगीं। फिर रैकेट भी तोड़ दिया।
ये सब सुनकर मैंने अपना सर पकड़ लिया। हम उस लड़के को डांटने-मारने गए थे, उससे माफी मांगकर हम शूटिंग पर वापस आए। इसी बात पर मुझे दिव्या के लिए कैफ भोपाली का एक शेर याद आ रहा है:
खेल यही खेला हमने लड़कपन से जो भी मिला शीशा तोड़ दिया छन से
खैर, एक बार साजिद और मैं एक दिन ऑफिस में थे तो दिव्या बोली कि मैं फैशन स्ट्रीट से कपड़े खरीदने जा रही हूं। इसके बाद वह चली गई। दोपहर के बाद उसके ड्राइवर का पब्लिक टेलीफोन से साजिद के ऑफिस में फोन आया। वो बोला कि सर, मैडम कार से उतर गईं। बोली कि मेरा मूड है कि आज मैं बस में जाऊंगी और वो बस में चली गईं। इस पर साजिद और मैं सर पकड़ कर बैठ गए कि बताओ, बस से आ रही है। वह स्टार है। सब लोग उसे जानते हैं। कोई तमाशा हो गया तो क्या करेंगे। उस जमाने में मोबाइल तो थे नहीं, इसलिए परेशान बैठे रहे। दो घंटे के बाद हमने देखा कि सामने बस स्टॉप से दिव्या पैदल हंसते हुए चली आ रही है। उसने यहां तक पहुंचने के लिए कई बसें बदलने की बात बताई। हमने पूछा कि क्या तुम्हें लोगों ने पहचाना नहीं? तो वो बोली कि बस में कुछ लोग बात कर रहे थे कि देख-देख दिव्या भारती। तो कोई बोला कि अगर दिव्या भारती होती तो बस में क्यों होती। और फिर सबसे मजेदार बात तब हुई, जब मैं अभी अंधेरी से यहां आ रही थी। मेरे पास में ही खड़े दो लोग मुझे देखकर बात कर रहे थे। पहले ने यही कहा कि क्या यह दिव्या जैसी नहीं दिख रही? तो दूसरा बोला कि दिव्या होती तो बस में थोड़ी होती, लेकिन ये बिल्कुल उसकी डुप्लीकेट है। तो पहले वाला बोला कि इसको बोलते हैं नसीब का चक्कर। उसकी तरह शक्ल तो है मगर किस्मत उसकी तरह नहीं है। वो कारों में घूम रही है और ये बसों में धक्के खा रही है। मैं मन ही मन मुस्कराती रही और उतरकर आ गई। तो ऐसी थी दिव्या। आज उसकी याद में उसकी फिल्म ‘दीवाना’ का ये गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए।
ऐसी दीवानगी देखी नहीं कहीं…








