रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  जब मायूसी में लिखा था पहला सुपरहिट गाना
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: जब मायूसी में लिखा था पहला सुपरहिट गाना

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रूमी जाफरी3 घंटे पहले

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गत 17 अगस्त को मैंने डेविड धवन जी पर एक कॉलम लिखा था, जिसमें जिक्र किया था कि उन्हें फिल्म एडिटर के तौर पर पहला मौका, जिसे फिल्म इंडस्ट्री की भाषा में ब्रेक कहा जाता है, सावन कुमार टाक ने दिया था। उस कॉलम के बाद मुझे कई पाठकों के संदेश और मेल आए, कुछ दोस्तों ने फोन कर कहा कि सावन जी पर भी मुझे जरूर लिखना चाहिए। बीती 25 अगस्त को सावन जी को इस दुनिया से गए तीन साल पूरे हो गए। तो आज ‘मेरे हिस्से के किस्से’ में बात करते हैं सावन जी की। सावन जी से जब मेरी पहली मुलाकात हुई, तो मैंने उनसे कहा कि मैं इस बात का बहुत कायल हूं कि बॉम्बे आने के बाद आपने अपने करियर की शुरुआत अपनी पहली फिल्म ‘नौनिहाल’ से की। यह एक अनाथ बच्चे की कहानी थी, जो पंडित जवाहरलाल नेहरू से मिलने दिल्ली जाता है, लेकिन उसके पहुंचने से पहले ही नेहरू जी का देहांत हो जाता है। इस पर सावन जी बोले, ‘जनाब, बच्चों की फिल्म बनाई थी, लेकिन उस जमाने में थिएटर में बच्चे आते नहीं थे और बड़े आए नहीं, इसलिए फिल्म फ्लॉप हो गई। मगर उस फिल्म से मुझे इज्जत बहुत मिली और यह भी सीखा कि फिल्म इंडस्ट्री में टिके रहना है और लगातार काम करना है तो फिल्म का हिट होना बेहद जरूरी है।’ उन्होंने कहा कि ‘नौनिहाल’ की एक सबसे बड़ी उपलब्धि, जिस पर मुझे हमेशा फख्र रहेगा, वह यह है कि नेहरू जी पर जो गाना मैंने उस फिल्म में बनवाया था, जिसे कैफी साहब ने लिखा और रफी साहब ने गाया, उससे बेहतर गीत नेहरू जी पर न कभी बना है और न ही मुझे लगता है कि आगे कभी बनेगा। नेहरू जी अपनी शेरवानी में गुलाब का फूल लगाया करते थे और कैफी साहब ने उस भाव को इतनी खूबसूरती से शब्दों में पिरोया कि रफी साहब की आवाज ने उसे अमर कर दिया। वह गीत था, ‘मेरी आवाज सुनो, प्यार का राज सुनो, मैंने जो फूल सीने से लगा रखा था, उसके परदे में तुम्हें दिल में छुपा रखा था, था जुदा मेरे इश्क का अंदाज, सुनो… मेरी आवाज सुनो।’ खैर, अगली फिल्म मैंने ‘गोमती के किनारे’ शुरू की और सोचा कि इस बार इसे मैं खुद डायरेक्ट करूंगा। मीना जी मुझसे काफी प्रभावित थीं, इसलिए उन्होंने इस फिल्म में मुझे भरपूर सहयोग दिया। लेकिन जनाब, यह फिल्म भी फ्लॉप हो गई। मगर सावन जी ने कहा, मैंने हिम्मत नहीं हारी। फिर मैंने तीसरी फिल्म ‘हवस’ शुरू की, जो बहुत बड़ी हिट साबित हुई। इसी मौके पर मुझे ताज भोपाली का शेर याद आता है: मैदान-ए-इम्तिहां से घबरा के हट न जाना, तकमील-ए-जिंदगी है चोटों पे चोट खाना। ‘नौनिहाल’ में म्यूजिक मदन मोहन जी का था और गीत कैफी आजमी साहब ने लिखे थे। उन्होंने बताया था कि ‘गोमती के किनारे’ के लिए मैंने आर.डी. बर्मन और मजरूह सुल्तानपुरी साहब को चुना। और फिर जब ‘हवस’ बनी तो मैंने संगीतकार उषा खन्ना को लिया, मगर गानों के लिए साफ कहा, ‘लिखवाएंगे तो मजरूह साहब से ही, क्योंकि उनसे अच्छा कोई हैं ही नहीं।’ और मैं सीधे मजरूह साहब के पास पहुंच गया। मजरूह साहब बोले कि तुम जानते हो मैं एक फिल्म लिखने का इतने पैसे लेता हूं, मैं उतने ही पैसे लूंगा। और मैंने उनसे कहा कि देखिए मेरी दो फिल्में पहले ही फ्लॉप हो गई हैं और पिछली फिल्म में आपने ही गाने लिखे और मैंने पूरे पैसे दिए। इस फिल्म में आप मुझसे पैसे कम ले लीजिए। वो बोले नहीं, मैं प्राइस कम नहीं करता। सबके लिए एक ही प्राइस है। मैंने कहा अच्छा, मेरी फिल्म में गाना ही एक है। तो जो एक गाने का बने, वो आप मुझसे ले लीजिए। मजरूह साहब बोले कि मुझसे एक गाना लिखवाओ या पूरी फिल्म के गाने लिखवाओ, प्राइस उतना ही है। सावन जी बोले कि मैंने इतनी मिन्नतें की, मगर मजरूह साहब थे कि टस से मस न हुए। और जब वो नहीं माने तो बड़ा मायूस होकर मैंने उनके घर से सीढ़ियां उतरते-उतरते कहा- ‘तेरी गलियों में न रखेंगे कदम आज के बाद, तेरे मिलने को न आएंगे सनम आज के बाद।’ बस, यही पहला गाना मैंने लिखा और इसके बाद लिखने का सिलसिला शुरू हो गया। तो गीतकार के तौर पर मुझे पहचान दिलाने का पूरा श्रेय मैं मजरूह साहब को ही देता हूं। मगर सावन जी कहा कि चाहे मैं कितने ही गाने लिख लूं, लेकिन आज भी मैं खुद मजरूह साहब का ही फैन हूं। सावन जी से बातचीत करने में बड़ा आनंद आता था। वे बेहद काबिल इंसान थे- शेरो-शायरी के दीवाने और साहित्य के रसिक। कलाकारों को पहचानने में माहिर थे। इसका सबसे बड़ा सबूत यही है कि उषा खन्ना से अलग होने बाद भी उन्होंने अपनी फिल्म में संगीतकार के रूप में उषा जी को ही चुना। सावन जी के लेखक और मेरे दोस्त दानिश जावेद बताते हैं कि एक दिन उन्होंने सावन जी से पूछा कि आपने उषा खन्ना से अलग होने के बाद भी उन्हें म्यूजिक डायरेक्टर क्यों लिया? इस पर सावन जी ने मुस्कराकर कहा, ‘दानिश, पर्सनल लाइफ अलग होती है और प्रोफेशनल लाइफ अलग। उषा कमाल की कंपोजर हैं।’ और सचमुच, सावन जी और उषा खन्ना की जोड़ी ने कई ऐसे यादगार गीत दिए हैं, जो हमेशा अमर रहेंगे। आज इन दोनों को याद करके, इनकी पहली फिल्म ‘हवस’ का और सावन जी का पहला गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए, खुश रहिए: तेरी गलियों में न रखेंगे कदम आज के बाद……



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