रूमी जाफरी5 घंटे पहले
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‘बहारें फिर भी आएंगी’ फिल्म के मशहूर गीत ‘आप के हसीन रुख पर आज नया नूर है’ में धर्मेंद्र।
पिछले कुछ दिनों से धर्मेंद्र जी की तबीयत काफी खराब थी, जिसकी वजह से उन्हें अस्पताल में दाखिल किया गया था। पूरी इंडस्ट्री और तमाम प्रशंसकों ने उनके ठीक होने की दुआएं की थीं। कुछ रिकवरी होने के बाद वे घर भी आ गए थे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। यह सच है कि ईश्वर के आगे किसी का बस नहीं चलता। अंतत: गत सोमवार की दोपहर में वे हम सबका साथ छोड़कर परमात्मा में विलीन हो गए। मैं उन कुछ खुशनसीबों में से हूं जिसे धरम जी के साथ काम करने और उन्हें नजदीक से जानने का मौका मिला। आज मैं उन्हीं के कुछ किस्से साझा कर रहा हूं।
बॉबी मेरा तीस साल से भी ज्यादा पुराना दोस्त है। मैंने देखा है कि देओल परिवार में जो जज्बाती रिश्ता है, एक दूसरे के लिए इज्जत, लिहाज, बड़े-छोटे का आदर है, वह कमाल का है, काबिल-ए-तारीफ है। उनके पुराने दोस्त बताते हैं कि जिस तरह सनी और बॉबी, धरम जी का लिहाज करते, धरम जी भी अपने बाबूजी का बिल्कुल उसी तरह से लिहाज किया करते थे। अगर कभी उन्हें आने में काफी रात हो जाती तो धरम जी बाबूजी की वजह से मेन गेट से अंदर नहीं आते थे कि कहीं बाबूजी की नींद न खुल जाए। वे बाउंड्री वॉल कूदकर पीछे के दरवाजे से घर में घुसते थे। जबकि उस समय तक वे फिल्मों में सुपरस्टार बन चुके थे, बच्चों के बाप थे, तब भी वे अपने बाबूजी का इतना लिहाज रखते थे। यही मैंने बॉबी और सनी को भी धरम जी के लिए करते देखा। यह जो पुरानी तहजीब थी, जो कल्चर था, बड़े-छोटों का लिहाज था, यह सब फिल्म इंडस्ट्री में मैंने सबसे ज्यादा धरम जी के घर में ही देखा है। बॉबी को म्यूजिक सुनने का बड़ा शौक रहा है, पार्टी करने का भी शौक था, लेकिन वह धरम जी और सनी के लिहाज में घर में ऐसा नहीं करता था। वह कहता था कि लाउड म्यूजिक से पापा और भैया डिस्टर्ब होंगे। एक बिल्डिंग है मूवी टावर। वहां धरम जी का फ्लैट है। मेरा भी सीटिंग रूम वहीं था। इसलिए बॉबी वहीं आकर और अपने दोस्तों को बुलाकर लाउड म्यूजिक सुनता था और पार्टी करता था। तो यह लिहाज धरम जी के घर की पहचान थी। इसी बात पर मुझे दानिश जावेद का एक शेर याद आ रहा है : उस मकान के मकीन ऐसे हैं परवरिश मेहवे ख्वाब हो जैसे बाप की आहटों पर चलते हैं बाप आली जनाब हो जैसे
धरम जी ने मुझे अपने बचपन का एक किस्सा सुनाया था। उन्होंने मुझे बताया था, “जब मैं गांव में रहता था, तब मेरे बाबूजी स्कूल मास्टर थे और बहुत सख्त मास्टर थे। वह स्टूडेंट और अपने बेटे में कोई भेदभाव नहीं करते थे। उल्टा मुझे ज्यादा डांटते थे और मुझसे ज्यादा सख्ती से पेश आते थे। मैं रात को मां के पास सोता था। एक दिन पता नहीं क्यों मेरा मन हुआ कि मैं बाबूजी के पास सोऊं। मैंने मां से कहा, मां, आज बाबूजी के पास सोना है। इस पर मां ने बाबूजी से कहा, ‘सुनो जी, इसको अपने पास सुला लो।’ बाबूजी बोले, ‘आ जा।’ मैं जाकर बाबूजी के पास लेट गया। उन्होंने पूछा, ‘पहाड़े याद हैं?’ मैंने कहा, ‘जी।’ बोले, ‘सुनाओ।’ मैंने मन ही मन सोचा, मैं तो नींद लेने आया था और कहां ये पहाड़े गले पड़ गए! समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं। मैंने मुड़कर मां की तरफ देखा, इशारा किया। मां समझ गईं कि मैं फंस गया। मां बोलीं, ‘धरम, तू इधर आ जा।’ और मैं भागकर मां के लिहाफ में घुस गया।” मैंने धरम जी को बहुत नजदीक से देखा है। पिछले महीने मुझे धरम जी की बहुत याद आ रही थी। मैंने बॉबी को फोन किया और कहा, ‘मुझे धरम जी से मिलना है।’ तो बॉबी ने कहा, ‘पापा की तबीयत थोड़ी ठीक नहीं है, मगर जिस दिन ठीक होगी, मैं तुझे बता दूंगा।’ मैंने कहा ठीक है। मैं भी दो हफ्तों के लिए लखनऊ जा रहा हूं। जब तक वहां से लौटा तो तब तक धरम जी अस्पताल में एडमिट हो गए थे। बदकिस्मती से उनसे मिलने का मौका नहीं मिल पाया। अब बस उनकी सुखद यादें ही स्मृतियों में हैं। आज धरम जी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका काम, अपने काम के प्रति समर्पण और उनकी तहजीब की परंपरा हमेशा जीवित रहेंगी। उनके पूरे परिवार के प्रति मेरा संवेदनाएं हैं। आज धरम जी की याद में उनकी फिल्म ‘बहारें फिर भी आएंगी’ का यह गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए : आप के हसीन रुख पर आज नया नूर है मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कुसूर है…








