रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  जब ड्राइवर को हटाकर खुद संभाली थी कमान
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: जब ड्राइवर को हटाकर खुद संभाली थी कमान

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रूमी जाफरी4 घंटे पहले

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तीन दिन बाद यानी 25 फरवरी को दिव्या भारती की सालगिरह है। अभी कुछ दिन पहले जब मैं ‘ओ रोमियो’ के प्रीमियर में गया तो कई सालों बाद वहां दिव्या के भाई कुणाल से मुलाकात हुई। कुणाल से मिलकर मैं बहुत इमोशनल हो गया। तभी मन में आया कि दिव्या से जुड़े कुछ किस्से आपके साथ साझा करूं। इसलिए आज मेरे हिस्से के किस्से में बात दिव्या भारती की।

दिव्या एक जिंदादिल, खुशमिजाज और चौबीसों घंटे मस्ती के मूड में रहने वाली लड़की थी। मैंने उसे कभी थका हुआ, उदास, खामोश या गंभीर नहीं देखा। वह जिंदगी का हर लम्हा ऐसे जीती थी, जैसे उसे अंदाजा हो कि उसके पास समय कम है और हर पल को पूरी तरह जी लेना है। मैंने पहले भी कहा है कि उसके भीतर एक बच्ची रहती थी। जो उसके मन में आता, बिना अंजाम सोचे वह कर डालती थी।

जुहू में उसके पड़ोस में एक बहुत मशहूर आइसक्रीम की दुकान थी। हर रात वहां इतनी भीड़ होती कि लोग अपनी गाड़ियां उसके घर के गेट के सामने खड़ी कर देते। दिव्या को अंदर जाने में परेशानी होती, काफी देर तक हॉर्न बजाना पड़ता, तब जाकर गाड़ियां हटतीं। वह कई बार लोगों को समझा चुकी थी कि गेट के सामने गाड़ी खड़ी करके आइसक्रीम मत खाइए। एक दिन उसने देखा कि फिर गाड़ियां खड़ी हैं। उसे गुस्सा आ गया। वह उतरी, पास पड़ी लोहे की रॉड उठाई और गाड़ियों के शीशे, लाइट और दरवाजों पर मारना शुरू कर दिया। लोग हैरान रह गए कि एक लड़की रॉड लेकर गाड़ियां तोड़ रही है। उसे शांत कराने में समय लगा।

मैं और साजिद घर पर थे। तभी फोन आया तो हम सीधे जुहू पुलिस स्टेशन भागे। वहां दिव्या खड़ी थी और बाहर कई टूटी हुईं गाड़ियां। बहुत से लोग जमा थे। साजिद ने सबसे बात की और फिर मामला शांत हुआ। कुछ दिन पहले ही साजिद ने मुझे बताया था कि वह केस कई साल चला। दिव्या चूंकि नाबालिग थी, इसलिए उसके पिता को पक्षकार बनाया गया था। कुछ अरसा पहले ही वह मामला खत्म हुआ। जैसा कि मैंने कहा कि वह सच में एक बच्ची थी, जो मन में आता वही करती थी। शायद उसी के लिए कहा गया है:

सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहां

जिंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहां

एक और किस्सा मैं आपको बताता हूं। बात अक्टूबर 91 की है। मेरे बड़े भाई की भोपाल में शादी थी। दिव्या ने जिद पकड़ ली कि वह भी जाएगी। मैंने समझाया कि तेरे जाने से शादी में सबका ध्यान भटक जाएगा। सब दुल्हन को छोड़कर तुझे ही देखते रहेंगे। वह मान गई। जब मैं जाने लगा तो उसने मेरे लिए एक मेडिकल बॉक्स तैयार किया। एक कागज पर लिख दिया कि सिरदर्द हो तो यह गोली, पेट दर्द हो तो यह, एलर्जी हो तो यह, चोट लगे तो यह बैंडेज। उसने डॉक्टर की तरह पूरा मेडिकल बॉक्स पैक कर दिया। वह बॉक्स कई साल मेरे पास रहा, फिर शिफ्टिंग में कहीं खो गया। उसका मुझे आज भी दुख है।

नवंबर के अंत में मेरे भाई और भाभी बंबई घूमने आए। दिव्या बड़ी बेचैनी से उनका इंतजार कर रही थी। जब वे आए तो उसने भाभी के नई दुल्हन वाले भारी लाल कपड़े पहन लिए और बोली कि आज हम मस्ती करेंगे। जब साजिद आएगा तो कहेंगे कि आज ही शादी होगी, उसकी खिंचाई करेंगे। इत्तेफाक से उस रात साजिद आया ही नहीं। वह मस्ती करती रही और बोली, आज मैं तुम दोनों के बीच सोऊंगी। सुबह होते ही वह शूटिंग पर चली गई। वहां जाकर कार भेज दी और कहा कि भैया-भाभी को लेकर आओ।

फिल्म ‘दिल ही तो है’ का सेट लगा था, असरानी जी निर्देशन कर रहे थे। तभी एक ओपन जीप आई, उसमें अजय देवगन बैठे थे। सबके स्वागत से समझ में आ गया कि ‘फूल और कांटे’ बड़ी हिट हो चुकी है और नया सितारा आ गया है। वहीं मेरी अजय से मुलाकात हुई। खैर, उसके बाद हम लोग निकले। मैं ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठ गया। पीछे भैया-भाभी और दिव्या बैठे थे। वापस लौटते समय हाईवे पर एक गाड़ी ने हमें ओवरटेक किया। दिव्या बोली, आगे निकलो। मैं तेज गाड़ी चलाने के खिलाफ था, ड्राइवर को इशारा किया कि तेज मत चलाना। उसने मेरी बात मान ली। लेकिन जैसे ही सिग्नल पर गाड़ी रुकी तो दिव्या उतरी, ड्राइवर को हटाया और खुद ड्राइविंग सीट पर बैठ गई। उसने जो गाड़ी दौड़ाई कि दूसरी गाड़ी से आगे निकलकर ही मानी।

ऐसा ही था दिव्या का नेचर। वह हर काम सबसे आगे रहकर करना चाहती थी। सबसे आगे निकलना चाहती थी। शायद दुनिया से जाने के मामले में भी वह हम सबसे आगे निकल गई। आज उसकी याद में उसकी फिल्म ‘शोला और शबनम’ का गीत सुनिए, अपना ख्याल रखिए, खुश रहिए :

तू पागल प्रेमी आवारा, दिल तेरी मोहब्बत का मारा…



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