रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  भूले-बिसरे एक्टर्स को दावत पर बुलाते थे जॉनी लीवर
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: भूले-बिसरे एक्टर्स को दावत पर बुलाते थे जॉनी लीवर

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आजकल रमजान चल रहे हैं, तो रोजाना मुझे मेरे भाई समान दोस्त जॉनी लीवर की याद आ रही है। लिहाजा, मेरे हिस्से के किस्से में आज बात जॉनी लीवर की। आप सोच रहे होंगे कि रमजान से मुझे जॉनी भाई की याद क्यों आ रही है? रमजान से उनका क्या रिश्ता है? जॉनी भाई से मेरी दोस्ती तो 1991 में, जब मैं ‘अंजाम’ लिख रहा था, तब तक हो गई थी। लेकिन 1993 में जब मैं शिफ्ट हुआ और नया घर लिया, तो उसकी बिल्डिंग उस बिल्डिंग के सामने ही थी, जहां वे रहते थे। 1993 से 2003 तक जॉनी भाई और मैं पड़ोसी रहे। तो रमजान के समय अगर जॉनी भाई मुंबई में रहते, तो कोशिश करते थे कि हर रोज शाम को रोजे इफ्तार के टाइम पर मेरे घर आएं और इफ्तारी हमारे साथ ही करें। मेरे परिवार वाले भी रोजा-इफ्तारी करने से पहले रोज उनका इंतजार करते कि जॉनी भाई पहुंचे कि नहीं। उनके साथ ही पूरे घर को रोजा-इफ्तारी करने में मजा आता था। मैंने अपनी पूरी जिंदगी में ऐसे लोग बहुत कम देखे हैं जो तन, मन और धन से लोगों के काम आते हैं। जिनके घर और दिल के दरवाजे चौबीसों घंटे लोगों की मदद के लिए खुले रहते हैं। लोगों के यहां जब किसी तरह की पार्टियां होती हैं तो उनके यहां फिल्म स्टार बुलाए जाते हैं, लेकिन जॉनी भाई के घर पर उनके पुराने मोहल्ले के लोगों, उनके बचपन के दोस्तों, जो ज्यादातर मामूली और गरीब हैं, को बुलाया जाता है। जॉनी भाई उन सबको बहुत इज्जत और प्यार देते हैं, उन्हें खूब एंजॉय करवाते हैं, उनकी बहुत खातिरदारी करते हैं। मगर कभी-कभी अच्छे लोगों का इंसान गलत फायदा भी उठा लेते हैं। पूरी दुनिया को पता है कि जॉनी भाई किसी की मदद करने से कभी मुंह नहीं मोड़ते। एक बार एक औरत जॉनी भाई के घर आई और अपनी तकलीफ बताकर रोकर पैसे मांगने लगी। जॉनी भाई ने पैसे दे दिए। दूसरे दिन जॉनी भाई घर से बाहर जाने के लिए गाड़ी में बैठ ही रहे थे कि तभी एक लड़की आई। जॉनी भाई के सामने उसने अपना दुखड़ा रोया, अपनी तकलीफ सुनाई। जॉनी भाई का जैसा दिल है, उन्हें उस पर भी दया आ गई और उन्होंने घर से पैसे मंगवाकर उस लड़की को दे दिए और फिर गाड़ी में बैठकर चले गए। थोड़ी दूर जाने के बाद उन्हें याद आया कि कुछ पेपर्स या कोई काम का सामान वो घर में भूल गए। तो यूटर्न मारकर जब वो लौटकर आए, तो उन्होंने देखा कि घर से थोड़ी दूर एक नुक्कड़ पर पहले दिन वाली औरत, जो पैसे लेकर गई थी और आज वाली लड़की, दोनों वही खड़े होकर हंस-हंसकर पैसे गिन रहे थे। जॉनी भाई ने गाड़ी रोकी और इनको पकड़ लिया। दरअसल, पहले दिन वाली औरत इस लड़की को लेकर आई थी और कहा था कि मैं तुझे ऐसे आदमी के पास भेजूंगी जो पैसे देने में ना नहीं करता, मगर आधे मुझे देने पड़ेंगे। जॉनी भाई को यह जानकर बहुत दुख हुआ। वे उनसे बोले कि तुम जैसे लोगों के कारण ही लोगों का चैरिटी और मदद पर से विश्वास उठ जाता है। दोबारा ऐसा किसी के साथ मत करना। उसके बाद भी उन्होंने चैरिटी बंद नहीं की। मैंने पूछा तो बोले, मेरी नीयत मदद करने की है। खुदा मेरी नीयत देखेगा। जिसकी नीयत चीटिंग करने की है, उसको भी खुदा देखेगा। किसी के फरेब करने से मैं अपनी नेकी क्यों बंद कर दूं। इसी बात पर मुझे जिगर मुरादाबादी का एक शेर याद आ रहा है :
उन का जो फर्ज है वो अहल ए सियासत जानें
मेरा पैगाम मोहब्बत है जहां तक पहुंचे। नब्बे के दशक में मैंने जॉनी भाई का एक और अच्छा रूप देखा है। कुछ पुराने एक्टर्स जो काम नहीं कर रहे थे, इंडस्ट्री उनको भूल गई थी, जैसे भगवान दादा, बी. एम. व्यास जी, के. एन. सिंह जी, भारत भूषण जी, ए. के. हंगल जी। वे इनको गाड़ियां भेजकर अपने घर बुलाते थे, आपस में मिलाते थे और जाते वक्त उन्हें उपहार वगैरह भी देते थे। सब उनको बहुत दुआएं भी देते थे और कहते थे कि जहां आज सब हमको भूल गए हैं, वहीं जॉनी तुम हमें बुलाते हो, खिलाते हो-पिलाते हो, आपस में मिलाते हो। इसीलिए जॉनी भाई की दुआओं में भी ताकत है। आज जॉनी भाई को याद करते हुए उनकी फिल्म ‘दो नंबर’ का यह गाना सुनिए, अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए : उर्मिला और करिश्मा का यार बनूंगा…



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