रूमी जाफरी11 घंटे पहले
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आजकल देश में रसोई गैस सिलेंडर की बड़ी दिक्कतें चल रही है। सत्तर-अस्सी-नब्बे के दशक में तो गैस का कनेक्शन मिलना बहुत मुश्किल था। नब्बे में जब मैंने मुंबई में अपना पहला घर खरीदा तो भोपाल वाले घर का गैस कनेक्शन ट्रांसफर करवाकर मुंबई ले आया था, क्योंकि उस समय एक सिलेंडर पर एक ही कनेक्शन मिलता था। सिलेंडर खत्म हो जाता तो घासलेट के स्टोव पर खाना बनता था। खैर, किस्मत से 1994 में राज बब्बर सांसद बन गए। सांसदों के पास गैस कनेक्शन देने का अधिकार होता था, तो एक दिन में कनेक्शन मिल जाता था। फिर मुझे एक और कनेक्शन भी मिल गया और मेरे घर में दो कनेक्शन हो गए। तो आज अपने हिस्से के किस्से में बात राज बब्बर की।
राज बब्बर उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के टूंडला में पैदा हुए और वहीं उनकी पढ़ाई-लिखाई हुई। अभिनय में उनकी रुचि शुरू से थी। थिएटर करते थे। पिता और दादा रेलवे में नौकरी करते थे और हर सरकारी कर्मचारी की तरह उनके पिता भी चाहते थे कि उनकी नौकरी रेलवे या किसी सरकारी महकमे में लग जाए। ये सब सरकारी और मिडिल क्लास लोगों की सोच होती है कि अगर बच्चे की सरकारी नौकरी लग गई तो रिटायरमेंट तक तनख्वाह और उसके बाद पेंशन मिलती रहेगी, इसलिए वे निश्चिंत हो जाते हैं। मगर राज भाई ऐसा नहीं चाहते थे। उन्होंने पिताजी से झूठ बोला कि वे आगे पढ़ने जा रहे हैं और पटियाला आ गए। वहां ड्रामा डिपार्टमेंट में 120 रुपए का वजीफा मिल गया। घर से पैसे भी नहीं मंगाने पड़े तो घरवालों को भी तसल्ली हो गई कि लड़का अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रहा है। फिर वहां से उनका एडमिशन एनएसडी में हो गया।
राज भाई ने बताया कि जब एनएसडी की छुट्टी होती तो वे घर नहीं जाते थे। वहां रवींद्र भवन के साइकिल स्टैंड पर रघुवीर यादव जी और रणजीत कपूर जी के साथ सो जाते थे। रघुवीर यादव जी बैठकर गाना-वाना सुना देते थे। सब लोग खूब मस्ती करते थे और साइकिल स्टैंड को ही अपना अड्डा बना लिया था। फिर यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स ने टैलेंट हंट किया। उसके स्क्रीन टेस्ट में राज बब्बर पास हो गए और बीआर चोपड़ा ने उन्हें अपनी फिल्म के लिए साइन भी कर लिया। राज भाई कहते हैं, ‘बीआर चोपड़ा ने मुझे साइन कर लिया, मेरी लाइफ बन गई।’ मगर वो फिल्म शुरू ही नहीं हुई। इसी बीच सलीम खान और जावेद अख्तर ने मेरा नाटक देखा और वे मेरी परफॉर्मेंस से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने अपनी एक स्क्रिप्ट के लिए मेरा नाम रिकमेंड कर दिया।
राज भाई बताते हैं, रमेश सिप्पी साहब टैलेंट हंट वाला मेरा स्क्रीन टेस्ट देख चुके थे। मुशीर व्यास उस समय के बहुत बड़े प्रोड्यूसर थे। उन्होंने मुझे प्लेन का टिकट भेजा, बॉम्बे बुलाया। पहली बार मैं प्लेन में बैठा और पहली बार फाइव स्टार होटल में रुका। मुझे यकीन हो गया कि मुझ पर इतना पैसा खर्च कर रहे हैं तो मतलब यह फिल्म मुझे मिलनी तय है। फिर फिल्म के मुताबिक मेरा स्क्रीन टेस्ट लिया गया। उस दौर के सबसे बड़े कैमरामैन द्वारका दिवेचा, जिन्होंने शोले शूट की थी, ने मेरा स्क्रीन टेस्ट शूट किया। रमेश सिप्पी जी, सलीम साहब, जावेद साहब, मुशीर व्यास, सबको मेरा काम बहुत पसंद आया और उन्होंने मुझे पास कर दिया। फिर मेरा टेस्ट दिलीप कुमार साहब को दिखाया गया। उस फिल्म में दिलीप साहब मेन रोल कर रहे थे और मुझे उनके बेटे के रोल के लिए चुना गया था। दिलीप साहब ने मेरी परफॉर्मेंस देखकर मुझे ओके कर दिया। उन्होंने मुझे आशीर्वाद भी दिया। मुझे लगा, अब लाइफ बन गई। मगर अफसोस, किसी व्यावसायिक कारण से मुझे नहीं लिया गया। इतनी बड़ी फिल्म, इतने बड़े राइटर्स और दिलीप साहब जैसे कलाकार के साथ काम करने का मौका हाथ से निकल गया, इसका मुझे बहुत गम हुआ। राज भाई की इसी बात पर मुझे अकबर हैदराबादी का एक शेर याद आ रहा है :
दिल दबा जाता है कितना आज ग़म के बार से कैसी तन्हाई टपकती है दर ओ दीवार से
राज भाई बताते हैं, मैं फिर दिल्ली आ गया और थिएटर करता रहा। फिर किस्मत ने उम्मीद के दरवाजे पर दस्तक दी। फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ का प्रीमियर था, जिसके लिए प्रकाश मेहरा साहब दिल्ली आए थे। उन्होंने मुझे बुलाया। मैं उनसे मिलने गया। उन्होंने कहा, ‘मैं एक फिल्म में तुम्हें कास्ट करना चाहता हूं। मैं तुम्हारी फ्लाइट का टिकट करवा देता हूं, बॉम्बे आ जाओ, वहां बात करेंगे।’ मैंने कहा, ‘31 दिसंबर को नया साल नादिरा के साथ मनाकर 1 जनवरी को आपके पास नई जिंदगी शुरू करना चाहता हूं।’
इसके बाद क्या हुआ, यह जानने के लिए आपको अगले सप्ताह का इंतजार करना होगा क्योंकि यह किस्सा थोड़ा लंबा है। उसमें उनकी जिंदगी से जुड़े और भी किस्से होंगे। आज के लिए तो राज बब्बर को याद करते हुए उनकी किसी फिल्म का अपनी पसंद का गाना सुनिए, अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए।









