रसरंग में मायथोलॉजी:  व्यापार मार्गों के जरिए दक्षिण में हुआ धर्म और संस्कृति का प्रसार
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रसरंग में मायथोलॉजी: व्यापार मार्गों के जरिए दक्षिण में हुआ धर्म और संस्कृति का प्रसार

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पिछले सप्ताह हमने तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की सांस्कृतिक भिन्नताओं के साथ यह भी जाना था कि किस प्रकार जैन और बौद्ध साधु आर्य संस्कृति को दक्षिण भारत तक लेकर आए। आज हम उसी चर्चा को आगे बढ़ा रहे हैं। बौद्ध और जैन साधु समुद्रतटों और नदीतटों के मार्ग से होते दक्षिण भारत पहुंचे थे। वे अपने साथ आत्मत्याग, तप और उपवास जैसे विचार लेकर आए। ये विचार उस समय प्रचलित समृद्धि और उर्वरता केंद्रित मान्यताओं से अलग थे। इन नए विचारों ने संयम और संतोष को भी महत्व दिया। इस प्रकार, वे युद्ध तथा सुख और सत्ता प्राप्त करने के विचारों के विरुद्ध थे। इसलिए ये विचार स्थिरता के इच्छुक व्यापारियों के बीच लोकप्रिय हुए, जिन्होंने 2,000 वर्ष पहले ‘कपास महामार्ग’ स्थापित किए थे। इन महामार्गों के दोनों ओर चट्टानों से उकेरे गए कई बौद्ध तथा जैन तीर्थस्थल हैं। पश्चिमी समुद्रतट की ओर महाराष्ट्र में कृष्णा और गोदावरी नदियों के उद्गम क्षेत्र के पास भाजा, कार्ला, अजंता और एलोरा की गुफाएं हैं। पूर्वी समुद्रतट की ओर इन्हीं नदियों के नदीमुख भूमि के निकट, आंध्र प्रदेश में उंडवल्ली, बोधिकोंडा और घनिकोंडा गुफाएं पाई जाती हैं। उंडवल्ली की गुफाएं विजयवाड़ा के निकट स्थित हैं। 1500 वर्ष पुरानी ये गुफाएं एक अखंड चट्टान से बनी हैं। चार मंजिलों का यह गुफा परिसर विष्णु की अनंत पद्मनाभ की पांच मीटर लंबी लेटी हुई मूर्ति के लिए जाना जाता है।

इस क्षेत्र की सबसे प्राचीन और उत्कृष्ट बौद्ध कलाकृतियां नागार्जुनकोंडा में निर्मित हुईं, जहां स्तूपों के साथ जातक कथाओं के दृश्य भी उकेरे गए। इन्हें लगभग 2,000 वर्ष पहले इक्ष्वाकु राजाओं ने सातवाहन काल में बनवाया था। जहां ये राजा वैदिक अनुष्ठानों और ब्राह्मणों का समर्थन करते थे, वहीं व्यापारियों ने बौद्ध गुफाओं, स्तूपों और विहारों का निर्माण करवाया। यह माना जाता है कि बौद्ध धर्म की दो महत्वपूर्ण हस्तियां तेलंगाना-आंध्र क्षेत्र से जुड़ी थीं: लगभग 250 ईस्वी में जीवित रहे नागार्जुन और लगभग 500 ईस्वी में जीवित रहे बुद्धघोष। नागार्जुन ने उत्तर भारत की यात्रा कर महायान बौद्ध धर्म के शून्यवाद का प्रसार किया। दूसरी ओर, बुद्धघोष श्रीलंका गए और पाली भाषा में लिखे प्राचीन थेरवाद बौद्ध धर्म के ग्रंथों को पुनर्जीवित किया। ‘तेलंगाना’ नाम को ‘त्रि लिंग’ से भी आया माना जाता है, जो तीन प्रमुख शिव मंदिरों की ओर संकेत करता है: वर्तमान तेलंगाना का कालेश्वरम, रायलसीमा का श्रीशैलम और आंध्र प्रदेश के समुद्रतटीय क्षेत्र का भीमेश्वरम। यह इस क्षेत्र में हिंदू धर्म के उदय और विस्तार का संकेतक माना जाता है। उत्तर भारत के गुप्त राजाओं और दक्षिण भारत के वाकाटक राजाओं के बीच वैवाहिक संबंध स्थापित होने के बाद लगभग 500 ईस्वी से उत्तर भारत में हिंदू कलाकृतियां अधिक दिखाई देने लगीं। लगभग 1300 वर्ष पहले दक्षिण भारत में भी हिंदू कलात्मक अभिव्यक्तियों का तेजी से विस्तार हुआ। आंध्र प्रदेश की अक्कन्ना-मदन्ना, भैरवकोणा और मोगलराजपुरम गुफाओं में शिव, नटराज और गणेश की प्रतिमाओं के साथ कृष्ण के जीवन प्रसंग भी चित्रित मिलते हैं। यह इस बात का संकेत था कि प्राचीन वैदिक हिंदू धर्म धीरे-धीरे पुराण आधारित हिंदू धर्म का रूप ले रहा था। इस नए स्वरूप ने क्षेत्रीय देवी-देवताओं को भी अपने भीतर समाहित किया। ब्राह्मणों ने स्थानीय देवताओं को देवत्व प्रदान किया, जिन्हें वैभव और सत्ता दोनों प्रिय थे। इसके विपरीत, बौद्ध और जैन परंपराओं ने संयम को बनाए रखते हुए इन क्षेत्रीय देवताओं को बुद्ध या तीर्थंकरों के सेवक के रूप में प्रस्तुत किया। इसी कारण ब्राह्मण समुदाय स्थानीय नायकों और शासकों के बीच अधिक लोकप्रिय हुआ। इन नायकों ने ब्राह्मणों को ‘देवभोग’ नामक भूमि अनुदान दिए, जिन पर देवताओं के लिए चावल उगाया जाता था। इस भूमि से उत्पन्न संपत्ति ने आगे चलकर भव्य हिंदू मंदिरों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हम पाते हैं कि 1000 ईस्वी तक दक्षिण भारत में धीरे-धीरे बौद्ध और जैन धर्म का क्षय होने लगा, जबकि शैववाद और वैष्णववाद का प्रभाव बढ़ता गया। ‘मेरे सिर पर रखे, केशों से बंधे लिंग की मैं प्रेमपूर्वक आराधना करता हूं’, यह पंक्ति तेलुगु लिपि में तेलंगाना के महबूबाबाद जिले स्थित अगस्तिस्वरस्वामी मंदिर परिसर में ग्रेनाइट पत्थर पर अपने सिर पर शिवलिंग रखे पुरुष की प्रतिमा के ऊपर उकेरी गई है। 12वीं सदी की यह पंक्ति बताती है कि काकतीय काल में शैववाद व्यापक रूप से प्रचलित था। कर्नाटक के संत बसवन्ना ने भी गले में आत्मलिंग धारण करने की परंपरा शुरू की थी। लगभग उसी समय इस क्षेत्र में लिंगायत और वीरशैव आंदोलनों का उदय हुआ। दक्खन क्षेत्र में देवताओं की प्रतिमाओं को सिर पर, मटकों और टोकरियों में ले जाने की परंपरा आज भी दिखाई देती है। हम यह येल्लम्मा देवी की पूजा में पाते हैं। जैन ग्रंथों में भी उल्लेख है कि कैसे अंबिका जैसी यक्षियां अपने सिर पर तीर्थंकरों की प्रतिमाएं धारण करती थीं। संभवतः पत्थर के लिंग को गले या बालों से बांधने की परंपरा की जड़ें भी यहीं से जुड़ी हैं। लिंगायत आंदोलन की तरह तेलुगु भाषी क्षेत्र में जन्मे लामुदिगलम नामक शैव पंथ ने भी जाति आधारित पदानुक्रमों और सामाजिक सीमाओं को अस्वीकार किया। परिणामस्वरूप, उन्होंने मंदिरों में होने वाली शिव पूजा को नकारते हुए देवत्व से सीधे जुड़ने का प्रयास किया। साथ ही उन्होंने जैन धर्म को भी अस्वीकार किया, जो जीवात्मा के अस्तित्व को स्वीकारते हुए भी परमात्मा के अस्तित्व को नकारता था।

इस भक्तिपरक शैववाद में शिव को निराकार और सर्वव्यापी देवत्व के रूप में पूजा गया। इसके विपरीत, राजाओं द्वारा संरक्षित ब्राह्मणवादी शैववाद में शिव की मंदिरों में औपचारिक पूजा होती थी। जैन धर्म भी मुख्य रूप से व्यापारियों के संरक्षण में फलता-फूलता रहा। इन सभी परंपराओं ने बौद्ध धर्म को अस्वीकार किया, क्योंकि वह आत्मा के अस्तित्व को नहीं मानता था। इस शृंखला के अंतिम लेख में हम इस क्षेत्र पर इस्लाम के प्रभाव को समझने का प्रयास करेंगे।



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