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पिछले दिनों मुझे कई लोगों ने मैसेज किए। मेल भी किए कि आप कुछ पुराने, यानी मेरी पैदाइश से भी पहले के फिल्मी लोगों के बारे में भी लिखें। अभी तक मैंने यही कोशिश की है कि मैं वही किस्से लिखूं, जिनका सिर्फ मैं गवाह हूं या उस शख्स के मुंह से या फिर उस किस्से के किसी चश्मदीद गवाह से सुने हों। मगर लोगों की फरमाइश को भी नजरअंदाज नहीं कर सकता।
तो पुराने किस्सों के बारे में मैं सोच ही रहा था कि तभी शेख मुख्तार का ख्याल आ गया, जो अपने जमाने के मशहूर एक्टर और प्रोड्यूसर थे। तो मेरे हिस्से के किस्से में आज बात शेख मुख्तार की। शेख मुख्तार का जन्म 24 दिसंबर 1914 को दिल्ली में हुआ था। मुख्तार के पिता रेलवे में थे। रेलवे की नौकरी उस जमाने में बहुत अच्छी मानी जाती थी। शेख मुख्तार पुरानी दिल्ली की गलियों में खेल-कूदकर बड़े हुए। बड़े मतलब सचमुच बड़े। उनकी हाइट 6 फुट 4 इंच थी, जिसकी वजह से उनके पिता ने सोचा कि इन्हें पुलिस या मिलिट्री में भर्ती करवाया जाए। कद-काठी की वजह से आराम से नौकरी मिल जाएगी। मगर शेख मुख्तार को तो एक्टिंग का शौक लग गया। वे वहीं दिल्ली में थिएटर करने लगे। फिर कलकत्ता आ गए। वहां थिएटर करने लगे, जहां उनकी मुलाकात महबूब खान से हुई और महबूब साहब ने उन्हें अपनी फिल्म ‘एक ही रास्ता’ में साइन कर लिया। उन्हें पहला रोल या ब्रेक 1939 में मिला। उसके बाद वे बॉम्बे आ गए और काम करना शुरू कर दिया।
फिर महबूब खान ने उन्हें सितारा देवी के साथ ‘रोटी’ में कास्ट किया, जो सुपरहिट हुई। बचपन में हमारे मोहल्ले में गणपति उत्सव के दौरान अक्सर रात के समय पर्दा लगाकर फिल्में दिखाई जाती थीं। उसमें मैंने शेख मुख्तार की दो फिल्में देखी हैं। एक का नाम था ‘कैदी नंबर 911’ और दूसरी थी ‘रोटी’। तो ‘कैदी नंबर 911’ का धुंधला-धुंधला मुझे याद है। बच्चों की कहानी थी और इंस्पेक्टर थे शेख मुख्तार। गाना बड़ा शानदार था :
‘मीठी-मीठी बातों से बचना जरा
दुनिया के लोगों में है जादू भरा।’
इसी तरह ‘रोटी’ का एक सीन मेरे जहन में बचपन से बैठा हुआ है। वह सीन मैं आप लोगों को बताना चाहता हूं। शेख मुख्तार और सितारा देवी ट्रेन में बैठकर शहर आ रहे हैं। प्लेटफॉर्म पर ट्रेन खड़ी है। चाय वाला आता है और बोलता है, ‘इस्लामी चाय, इस्लामी चाय।’ दोनों चाय लेते हैं और पीना शुरू करते हैं। तभी दूसरा चाय वाला आता है और बोलता है, ‘हिंदू चाय, हिंदू चाय।’ तो सितारा देवी बोलती हैं, ‘सुनो जी, मुझे यह चाय भी पीनी है।’ शेख मुख्तार उससे भी चाय लेते हैं। सितारा देवी चाय पीती हैं और बोलती हैं, ‘यह तो बिल्कुल वैसी ही चाय है। इसमें भी तो वही मजा है, जैसा उसमें है।’ मुख्तार भी चखते हैं और खिड़की से उन दोनों का गला पकड़ लेते हैं और बोलते हैं, ‘एक ही चाय को तुम दोनों अलग-अलग नाम से बेच रहे हो।’
यहां बता दें कि उस वक्त रेलवे स्टेशनों पर चाय ‘हिंदू’ और ‘इस्लामी’ नाम से बिकती थी। हालांकि इसमें किसी तरह के साम्प्रदायिक तनाव जैसी बात नहीं थी। इस सीन में यह संदेश साफ था कि हिंदू और मुसलमान तो एक ही हैं। कितना खूबसूरत संदेश था यह। इस बात पर मुझे अल्लामा इक़बाल का वो मशहूर शेर याद आ रहा है :
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा
शेख मुख्तार के यादगार रोल में से एक था चंगेज खां का रोल। हमने इतिहास में चंगेज खां के बारे में पढ़ा है। अगर फिल्म का पोस्टर आज भी गूगल पर देख लें तो लगता है कि चंगेज खां ऐसा ही रहा होगा। क्योंकि शेख मुख्तार का लुक, हाइट और पर्सनैलिटी का कोई जवाब नहीं था। ऐसा लगता था कि शेख मुख्तार के अलावा चंगेज खां का रोल कोई और नहीं कर सकता।
आखिर में उन्होंने ‘मुगल-ए-आजम’ की सफलता को देखते हुए ‘नूरजहां’ नाम की फिल्म बनाई। फिल्म फ्लॉप हो गई। इससे उनके ऊपर बहुत कर्ज हो गया। तब उन्होंने सोचा कि हो सकता है यह फिल्म हिंदुस्तान में इसलिए फ्लॉप हो गई, क्योंकि यहां के हर इंसान ने ‘मुगल-ए-आजम’ थिएटर में देखी है। तो क्यों न इसे लेकर पाकिस्तान चला जाऊं। पाकिस्तान में लोग ‘नूरजहां’ देखेंगे।इस इरादे से उन्होंने बॉम्बे में अपनी सारी प्रॉपर्टी बेचकर अपना पूरा कर्ज चुकाया और ‘नूरजहां’ का ओरिजिनल प्रिंट लेकर पाकिस्तान चले गए। वहां उसे रिलीज करने में उन्हें बहुत तकलीफ आई। खूब कोशिश की। फिर 1980 में उनकी मृत्यु हो गई। और नियति का खेल देखिए, उनकी मृत्यु के कुछ दिन बाद ही ‘नूरजहां’ रिलीज हुई और पाकिस्तान में सुपरहिट हुई।
शेख मुख्तार को याद करते हुए उनकी फिल्म ‘उस्तादों के उस्ताद’ का ये गाना सुनिए, अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए:
मिलते ही नजर तुमसे, हम हो गए दीवाने
आगाज तो अच्छा है, अंजाम खुदा जानें…
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