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महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध में भीष्म ने शिखण्डी से युद्ध करने से इनकार कर दिया था। उनके अनुसार, चूंकि शिखण्डी का जन्म स्त्री के रूप में हुआ था, इसलिए वह स्त्री ही था। दूसरी ओर कृष्ण का दृष्टिकोण अलग था। उनका मानना था कि यदि शिखण्डी स्वयं को पुरुष मानता है, तो वह पुरुष है। इस प्रकार कृष्ण ने उसकी आत्म-पहचान को स्वीकार किया, जबकि भीष्म ने उसे नकार दिया था। मार्च माह में जो ट्रांसजेंडर विधेयक कानून बना, उसकी सोच भीष्म के दृष्टिकोण से मेल खाती है, कृष्ण के नजरिए से नहीं। आधुनिक मानकों से देखें तो भीष्म का दृष्टिकोण अधिक रूढ़िवादी और कृष्ण का अधिक उदार प्रतीत होता है। सनातन धर्म ने संसार को कभी कठोर और अपरिवर्तनीय नहीं माना। उसने हमेशा अस्पष्ट, परिवर्तनशील और मध्यवर्ती अवस्थाओं के लिए भी स्थान रखा। इन्हें किसी विचलन के रूप में नहीं, बल्कि सृष्टि की स्वाभाविक विविधता के रूप में देखा गया। यह तरलता (फ्लेक्सिबिलिटी) स्वयं देवताओं के रूपों में भी दिखाई देती है। अर्धनारीश्वर न पूर्णतः पुरुष हैं, न स्त्री; नरसिंह न पूरी तरह मनुष्य हैं, न पशु और गणेश का शरीर मनुष्य का है, जबकि सिर हाथी का। इन रूपों को असामान्य नहीं माना गया, बल्कि इनके माध्यम से समाज ने ब्रह्मांड की जटिलता और रहस्यमयता को स्वीकार किया। आज जिन्हें हम ट्रांसजेंडर कहते हैं, उन्हें समझने की परंपरा भी इसी दृष्टि से विकसित हुई। उनके लिए प्रयुक्त अनेक शब्दों में ‘किन्नर’ भी एक है। भारतीय सभ्यता में किसी भिन्नता को तुरंत गैरकानूनी या ऐसा रोग नहीं माना गया, जिसका उपचार आवश्यक हो। ऐसा दृष्टिकोण अपेक्षाकृत बाद में, विशेषकर औपनिवेशिक काल में विकसित हुआ। यूरोपीय शासकों ने समाज और शरीर दोनों का कठोर वर्गीकरण करने का प्रयास किया। यह वर्गीकरण उनके कानून और नैतिकता के ढांचों पर आधारित था। भारत की देशज परंपराओं ने इस प्राचीन समझ को बहुचरा माता की कथा के माध्यम से जीवित रखा। कथा के अनुसार, सुहागरात पर एक स्त्री को पता चला कि उसका पति पुरुषों की ओर आकर्षित था और स्त्रियों के वस्त्र पहनना पसंद करता था। इस अस्वीकार से आहत होकर वह ‘बहुचरा’ माता नामक उग्र देवी में परिवर्तित हो गई। माता को मुर्गे पर सवार दिखाया जाता है, जो पुरुषत्व का प्रतीक माना जाता है। उनका आदेश था कि स्त्रैण पहचान वाले पुरुषों को उसे स्वीकार कर उसी के अनुरूप जीवन जीना चाहिए। इसी कारण बहुचरा माता के मंदिर ट्रांस महिलाओं और पारंपरिक लैंगिक मानदंडों से अलग पहचान रखने वाले समुदायों के लिए अपनत्व के केंद्र बन गए। संस्कृत की मार्गी परंपराओं में यही विचार महाभारत की ईला कथा में मिलता है। मनु का पुत्र ईला जैविक रूप से पुरुष था, लेकिन शिव और शक्ति के जादुई वन में प्रवेश करते ही स्त्री बन गया। उसका विवाह बुध से हुआ, जो चंद्रदेव और तारा के पुत्र थे। बुध को ऐसा श्राप मिला था कि उनमें पुरुष और स्त्री दोनों के गुण मौजूद रहेंगे। आगे चलकर ईला और बुध से चंद्रवंश की उत्पत्ति हुई। कृष्ण और अर्जुन इसी चंद्रवंश के सदस्य थे। ईला, बहुचरा माता और शिखण्डी की कथाएं स्पष्ट करती हैं कि भारतीय सभ्यता की देशज और मार्गी दोनों परंपराओं में लैंगिक विविधता को केवल स्वीकार ही नहीं किया गया, बल्कि उसके इर्द-गिर्द कथाएं रची गईं और उसे धार्मिक-अनुष्ठानिक जीवन का हिस्सा बनाया गया। मध्यकालीन भारत में, विशेषकर सूफी परंपराओं के विस्तार के साथ, ऐसे सामुदायिक स्थल विकसित हुए जहां पारंपरिक गृहस्थ जीवन से बाहर के लोग भी आश्रय पा सकते थे। खानकाहों और उस्ताद-शागिर्द परंपरा पर आधारित व्यवस्थाओं ने अनेक समुदायों को सामाजिक स्थान दिया। किन्नरों की हिजड़ा परंपरा ने इस्लामी शब्दावली और संस्थागत ढांचे अपनाए, लेकिन साथ ही भारतीय मान्यताओं को भी बनाए रखा। इस प्रकार उन्हें संस्कृति के भीतर स्थान मिला, बाहर नहीं। मंदिरों से जुड़ी परंपराओं में भी ट्रांसजेंडर समुदायों की उपस्थिति बनी रही। कर्नाटक में येल्लम्मा पंथ और तमिलनाडु में अरावन से जुड़े उत्सवों में ट्रांसजेंडर समुदायों की सक्रिय भागीदारी देखी जाती है। उन्हें परिवारों को आशीर्वाद देने, जीवन के महत्वपूर्ण अवसरों को चिह्नित करने तथा शुभ और अशुभ के बीच मध्यस्थता करने के लिए आमंत्रित किया जाता था। औपनिवेशिक आधुनिकता के आगमन के साथ समाज में उनका दर्जा बदलने लगा। ब्रिटिश प्रशासन तरल लैंगिक पहचानों के प्रति असहज था। उसके लिए हर व्यक्ति का वर्गीकरण और दस्तावेजीकरण आवश्यक था, ताकि उस पर निगरानी रखी जा सके। क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट जैसे कानूनों के तहत हिजड़ा समुदाय को दर्ज कर उसे गैर कानूनी घोषित कर दिया गया। जो समुदाय कभी सामाजिक मान्यता प्राप्त मध्यवर्ती वर्ग था, वह धीरे-धीरे हाशिए पर धकेल दिया गया। हिंदू सभ्यता ने मिथकों, कथाओं और अनुष्ठानों के माध्यम से हमेशा विविधता के लिए स्थान बनाया है। पुराने समाज में प्रमाणपत्रों की अपेक्षा नहीं थी। वहां सामाजिक सहभागिता, स्वीकृति और अनुष्ठानों में भागीदारी अधिक महत्वपूर्ण थी। संभवतः सनातन धर्म की सबसे गहरी सीख यही है कि इन समुदायों के प्रति सहानुभूति दया दिखाकर नहीं, बल्कि उन्हें सामाजिक ढांचे का स्वाभाविक हिस्सा मानकर व्यक्त की गई। यह सहानुभूति उनकी कथाओं, उनके देवताओं और उनके अनुष्ठानों में समाई हुई थी। यह विरासत हमें अपने पूर्वजों से मिली है। इसे केवल चिकित्सकीय या प्रशासनिक श्रेणियों में सीमित कर देना हमारी सभ्यता की मूल भावना को संकुचित करना होगा।
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