शेखर गुप्ता का कॉलम:  अफगानिस्तान से भिड़कर घिर गया है पाकिस्तान
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शेखर गुप्ता का कॉलम: अफगानिस्तान से भिड़कर घिर गया है पाकिस्तान

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3 घंटे पहले

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शेखर गुप्ता
एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar

शेखर गुप्ता एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

जब तीन महाशक्तियां अपनी ताकत के शिखर पर थीं, तब उन्होंने अफगानिस्तान को दबाने की कोशिश की मगर नाकाम रहीं। ब्रिटेन ने 19वीं सदी के मध्य में, सोवियत संघ ने 1979 के बाद और अमेरिका ने 2011 में 9/11 के बाद। अगर पाकिस्तान खुद को इन तीनों से ज्यादा ताकतवर मानता है, तो हमें उसे यही कहना चाहिए कि आजमा लो। और फिर हम तमाशा देखें।

हिंदू कुश और उसके पार जो विशाल ठंडा वीराना है, वह किसी मूर्ख के सपने में ही रणनीतिक गहराई मुहैया करा सकता है। कश्मीर में वर्षों से जारी अलगाववाद से हमें यह भी मालूम है कि अफगानिस्तान कभी कश्मीर में पाकिस्तानी लश्करों के साथ नहीं जुड़ा। लगभग सारे विदेशी आतंकवादी पाकिस्तानी सैनिकों की तरह मुस्लिम पंजाबी बिरादरी से हैं। अब देखिए कि हम किस स्थिति में हैं।

पाकिस्तान अफगानिस्तान के अंदर घुसकर बमबारी कर रहा है, बेकसूर नागरिक मारे जा रहे हैं। एक बार तो एक ही परिवार के 18 लोग मारे गए। वह इलाका और वहां की आबादी इस तरह की है कि इस सहस्राब्दी के शुरू से ही सबसे ताकतवर सैन्य शक्ति अमेरिका के लिए भी वहां सटीक बमबारी एक कल्पना ही थी और काफी जोखिम भरी थी।

अपने तमाम उपग्रहों, जासूसों और टोही यंत्रों, ड्रोनों और सटीक हमले करने वाले हथियारों के बूते अमेरिका अकसर मस्जिदों, कबीलों के बड़े परिसरों में नागरिकों को मौत के घाट उतारता रहा या खाली पड़ी गुफाओं को ध्वस्त करता रहा। इन हमलों में अफगानों के इक्का-दुक्का कमांडर भले मारे गए हों लेकिन अमेरिका को भी हमेशा नुकसान उठाना पड़ा। ऐसे हरेक हमले के बाद तालिबान का आकार बढ़ता गया, प्रभावित कबीलों के नए लड़ाके बदला लेने की कसमें खाते रहे।

अगर पाकिस्तान यह मानता है कि वह अमेरिका के मुकाबले ज्यादा हासिल कर सकता है, तो भारत का कोई भी पक्षधर उससे यही कहेगा कि आगे बढ़ो, और मेरा काम आसान करो। लोगों पर आपदा टूटे, इससे बेशक किसी को खुशी नहीं मिलेगी। खासतौर से अफगानों के लिए तो भारत कतई ऐसा नहीं चाहेगा। वहां चाहे जो भी निजाम हो, वह भारत के प्रति हमेशा सद्भावना रखता रहा है। हम कतई नहीं चाहेंगे कि अफगानों, खासकर अफगान नागरिकों को कोई नुकसान पहुंचे।

लेकिन तथ्य यह है कि पाकिस्तान ने अपनी अदूरदर्शिता के कारण अपने लिए दूसरा मोर्चा खोल लिया है। केवल भारत ही इस उपमहादेश का ऐसा देश नहीं है, जिसे दो मोर्चे वाले जोखिम की चिंता हो। सबकी स्थितियां बेशक अलग-अलग हैं। भारत के लिए चीन जो है, वैसा अफगानिस्तान पाकिस्तान के लिए नहीं हो सकता, बावजूद इसके कि उनके बीच सीमा विवाद हैं। और चीन-पाकिस्तान का जैसा गठबंधन है, वैसा गठबंधन तालिबान और भारत के बीच नहीं है।

और अंतिम बात यह है कि फिलहाल जो भौगोलिक वास्तविकता है, उसके मुताबिक भारत और अफगानिस्तान के बीच बड़ी दूरी है, उनके बीच पाकिस्तान का या पाकिस्तानी कब्जे वाला इलाका पड़ता है। भारत पर पाकिस्तान के खिलाफ छद्मयुद्ध शुरू करने का अगर आरोप लगाया जाता है तो वह इतना भर ही है कि भारत अफगानिस्तान की शानदार क्रिकेट टीम को बढ़ावा देता रहा है।

वैसे, पाकिस्तान के रणनीतिक तेवर और सैन्य तैयारी कभी दो मोर्चों के मद्देनजर नहीं थी, हालांकि उसने खुद को घालमेल में उलझा लिया है। वह एक ऐसे राष्ट्र से भिड़ गया है, जो उसके मुकाबले कहीं ज्यादा इस्लामी और शुद्धतावादी सुन्नी है। पाकिस्तान का सियासी नेतृत्व कमजोर और कमअक्ल दिखता है। उसकी कूटनीति पूरी तरह भारत-चीन-अमेरिका केंद्रित है और वह अफगानिस्तान को अपना गुलाम मानता रहा है। उसकी फौज के पास भी विचारों का अभाव है।

अपने पश्चिमी मोर्चे पर भारी घालमेल के लिए वह अपने पूर्वी पड़ोसी भारत को दोष देता है। पाकिस्तानी निजाम पश्चिम पर नजर डालते हुए दशकों से बड़े-बड़े ख्वाब देखता रहा है। एक तो यह कि अफगानिस्तान में वह अपनी रणनीतिक मजबूती हासिल कर लेगा।

दूसरे, यह कि ईरान उसका पक्का इस्लामी साथी है, और फिर यह धारणा भी कि वह सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से पश्चिम एशिया का ही हिस्सा है, खासकर अरब मध्य-पूर्व का। यह धारणा उसे इस उपमहादेश वाली पहचान से छुटकारा दिलाती है। इसकी ज्यादा बड़ी वजह यह है कि भारत का दबदबा इतना बड़ा है कि सांस्कृतिक, भाषायी और पारिवारिक जुड़ाव इस उपमहादेश वाली पहचान को भारतीय पहचान का पर्याय बना देता है।

  • पाकिस्तान की सैन्य तैयारी दो मोर्चों के मद्देनजर नहीं थी, हालांकि उसने अफगानिस्तान के साथ जंग छेड़कर खुद को घालमेल में उलझा लिया है। वह एक ऐसे राष्ट्र से भिड़ गया है, जो उसके मुकाबले कहीं ज्यादा इस्लामी है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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