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शेखर गुप्ता का कॉलम: इमरान की कहानी दुनिया के सामने आ गई है

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4 घंटे पहले

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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar

शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

इंग्लैंड के पूर्व कप्तान माइकल आथर्टन ने क्रिकेट के लिए चाहे जो कुछ भी किया हो, लेकिन उन्हें अब इमरान खान के भविष्य के सवाल को दुनिया के सामने लाने के लिए याद किया जाएगा। पाकिस्तानी सत्तातंत्र कश्मीर मसले को तो दुनियाभर में 75 साल से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उछालने की कोशिश करता रहा है, लेकिन इमरान के मसले की खबर उसकी सीमा के पार जाए, यह वो कतई नहीं चाहता था। आथर्टन के बाद ऑस्ट्रेलिया के कप्तान पैट कमिंस ने भी इमरान के पक्ष में आवाज उठाई।

खेलों की दुनिया में अंतरराष्ट्रीय एकता स्थापित करने के लिए अगर कोई सबसे बड़ा पुरस्कार हो तो आथर्टन उसके हकदार हैं। यह तोहफा उन्हें इमरान के बेटों, कासिम और सुलेमान से लॉर्ड्स के लॉन्ग रूम में बातचीत करने के लिए दिया जाना चाहिए। इस बातचीत को ‘स्काई स्पोर्ट्स’ चैनल ने लॉर्ड्स टेस्ट के पहले दिन लंच के दौरान प्रसारित किया, बावजूद इसके कि पीसीबी ने मैच का बायकॉट करने की धमकी दी थी।

पीसीबी का नेतृत्व मोहसिन नकवी कर रहे हैं। वे पाकिस्तान के गृह मंत्री भी हैं। वे मुनीर के सबसे करीबी और वफादार साथी माने जाते हैं। ‘स्काई स्पोर्ट्स’ ने वह बातचीत प्रसारित करके बड़ा जोखिम उठाया था। उससे टेस्ट सीरीज के प्रसारण का अधिकार छिन सकता था, आथर्टन का पाकिस्तानी वीसा रद्द किया जा सकता था और ईसीबी पाकिस्तान की सद्भावना गंवा सकता था।

लेकिन इन तीनों ने ये जोखिम उठाकर इमरान के भविष्य के सवाल को पाकिस्तान की खूनी घरेलू सियासत के दायरे से निकालकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के मंच पर पहुंचा दिया। पाकिस्तान का सत्तातंत्र इस मुद्दे का ‘क्रिकेटीकरण’ कतई नहीं चाहता था।

क्रिकेट के 21 पूर्व कप्तानों ने- जिनमें भारत के भी 3 शामिल हैं- इमरान से बेहतर बरताव किए जाने की मांग करते हुए एक संयुक्त पत्र जारी किया है। एक टेस्ट मैच में लंच ब्रेक पाकिस्तान की सियासत के लिए लंबा समय साबित हुआ है।

अब, इमरान और उनकी पहली बीवी जेमिमा के इन दोनों बेटों (इमरान की तीसरी बीवी बुशरा बीबी भी जेल में हैं) ने पिता के प्रति प्यार और गंभीर चिंता जाहिर की। पाकिस्तान समेत क्रिकेट की पूरी दुनिया की नजर इमरान पर है। पाकिस्तान का सबसे शर्मनाक रहस्य अब अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया है।

पाकिस्तान के हुक्मरान इस बात से जरूर राहत महसूस कर सकते हैं कि जो ताकतवर देश- अमेरिका, चीन और पश्चिम एशिया- उसके लिए रणनीतिक महत्व रखते हैं, वे क्रिकेट की परवाह नहीं करते। क्या आथर्टन ने पुराने दोस्तों की दोस्ती की भावना से वह सब किया?

वे शायद एक महान क्रिकेट ‘आइकॉन’ के साथ किए जा रहे जुल्म, और उन्हें तिल-तिल कर मौत की ओर धकेले जाने से आहत थे। इमरान की ख्याति क्रिकेट से उनके संन्यास के साथ खत्म नहीं हो गई थी। वे टेलीविजन पर अपनी कमेंट्री के कारण भी मशहूर थे। भारतीय मीडिया कॉनक्लेव में उन्हें वक्ता के रूप में सबसे ज्यादा फीस मिलती थी।

आथर्टन कभी इमरान की कप्तानी वाली पाकिस्तानी टीम के खिलाफ नहीं खेले। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में खेलना उन्होंने 1989 में शुरू किया, इमरान 1992 में रिटायर हो गए। आथर्टन को इमरान की गेंद पर आउट होने का ‘आनंद’ नहीं मिला। लेकिन आज वे इमरान की ओर से खेल रहे हैं।

अपने मुल्क की फौज के साथ परेशानियों के पहले दिन से ही इमरान को समझ में आ गया था कि अगर वे सियासत से हट जाएं और टेलीविजन की लाभप्रद दुनिया में लौट जाएं तो उनका जीवन आराम से गुजर सकता है। फौज के साथ छत्तीस का रिश्ता बनाने वाले सभी नेताओं का स्वाभाविक विकल्प उनके लिए उपलब्ध था, यानी अमीरी वाला निर्वासन। लेकिन इमरान ने अपने साहस से फौज को हैरत में डाल दिया।

फिर भी, कड़वी हकीकत यह है कि उन्होंने वही खेल तब खेला, जब यह उन्हें मुफीद लगा। फौज के साथ मिलीभगत करके उन्होंने एक निर्वाचित प्रधानमंत्री (नवाज शरीफ) को गद्दी से उतारकर जेल में पहुंचा दिया और फिर उन्हें ऐसी चूक के लिए देशनिकाला दे दिया, जिसके कारण उन्हें ‘सादिक और अमीन’ (इस्लामी सोच के मुताबिक सच्चे और भरोसेमंद) नहीं माना गया।

इसके बाद उन्होंने फौज का इस्तेमाल करके एक चुनाव को चुरा लिया और बहुमत का आंकड़ा जुटा लिया। और जब उन्होंने उसी फौज की मुखालफत की, तब उसने वही किया, जो वह हर उस निर्वाचित नेता के साथ करती रही है, जो उसके लिए ‘मुश्किल’ साबित होने लगता है। इमरान ने आईएसआई के चीफ समेत फौज के आला ओहदों की नियुक्तियों में दखल देना शुरू कर दिया था। वे भूल गए कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों को यह अधिकार नहीं हासिल है।

उन्हें जितने साल की जेल की सजा मिली है, उस पर गौर करें। प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने जो उपहार पाए उनका खुलासा न करने और कथित ‘अल-कादिर ट्रस्ट’ घोटाले के लिए उन्हें अलग-अलग 14 साल, 3 साल और 14 साल की जो सजाएं दी गई हैं, वे काफी भयावह लगती हैं।

जब इमरान पहले ऐसे पाकिस्तानी नेता के रूप में उभरे, जो निर्वाचित नेताओं की स्वायत्तता और नागरिक शासन के वर्चस्व की खातिर फौज की अवहेलना कर सकते हैं, तब पाकिस्तान में लाखों लोग उत्साहित हुए थे। इमरान जनता के जोर पर जनरल हेडक्वार्टर का मुकाबला कर रहे थे।

पाकिस्तान की फौज को पहली बार एक ऐसे नेता से चुनौती मिली थी, जिसे जनसमर्थन हासिल था। तब पाकिस्तान के एक प्रमुख बुद्धिजीवी ने सावधान किया था कि जरा सब्र रखो, कसीनो में हमेशा उसका मालिक ही जीतता है।

अब तक तो ‘मालिक’ ही जीत रहा है। लेकिन उसे भी पता है कि उसने अब तक जितने नेताओं का सफाया किया है, उनके मुकाबले इमरान ज्यादा हिम्मती और लोकप्रिय हैं। अगर इमरान बिना कोई समझौता किए जेल से बाहर आ जाते हैं तब मुनीर को वही उपाय करना पड़ेगा- या तो उन्हें फिर जेल भेजें या देशनिकाला दें।

इमरान का स्वभाव उग्र और आत्म-मुग्ध है। मेरी तरह कई लोग उन्हें तब से जानते हैं, जब वे क्रिकेट खेलते थे। हम सब तब आश्चर्य में पड़ गए, जब वे कट्टरपंथी इस्लामवाद की ओर मुड़ गए थे। समझ नहीं आया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। कश्मीर पर उनके और मुनीर के विचारों में कोई फर्क नहीं है। फिर भी इसने मुनीर के कोप से उनकी रक्षा नहीं की!

इस मुद्दे का “क्रिकेटीकरण’ इमरान के भविष्य का सवाल पाकिस्तान की घरेलू सियासत के दायरे से निकलकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के मंच पर पहुंच गया है। पाकिस्तान का सत्तातंत्र इस मुद्दे का ‘क्रिकेटीकरण’ कतई नहीं चाहता था। लेकिन अब क्रिकेट के 21 पूर्व कप्तानों ने- जिनमें भारत के भी 3 शामिल हैं- इमरान से बेहतर बरताव की मांग की है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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