टिपण्णी

सैयद अता हसनैन का कॉलम: एक जैसी तबाही के भी अलग-अलग कारण हो सकते हैं

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मैं राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) का सदस्य रह चुका हूं और नेपाल की त्रासदी को इस विषय के एक विशेषज्ञ की दृष्टि से देखता हूं। जब भी अचानक से पानी, कीचड़ और बड़े-बड़े पत्थर हिमालय की किसी घाटी में नीचे आते हैं तो आमतौर पर हमारी पहली व्याख्या यही होती है कि कहीं बादल फटे होंगे। ये सच है कि पहाड़ों में बादल फटना एक चिर-परिचित प्राकृतिक घटना है और इससे विनाशकारी बाढ़ आती है। लेकिन नेपाल के मद्देनजर हमें अधिक सावधानी से यह देखना होगा कि आखिर हिमालय की ऊंचाइयों में क्या चल रहा है। हर आकस्मिक बाढ़ असाधारण बारिश के कारण नहीं आती। कभी-कभी इसका स्रोत बहुत अधिक ऊंचाई पर होता है, जहां बर्फ, चट्टान, पानी, तापमान और गुरुत्वाकर्षण ऐसी परिस्थितियां पैदा करते हैं, जिन्हें समझना हम अभी सीख ही रहे हैं। फरवरी 2021 में उत्तराखंड में हुई ऋषिगंगा-तपोवन आपदा ने इसे बेहद नाटकीय ढंग से दिखाया था। वह सर्दियों की एक साफ सुबह थी। लेकिन घाटी में बेहद ऊंचाई पर चट्टान और बर्फ का एक विशाल हिस्सा टूटा, तेजी से नीचे आया और एक विनाशकारी मलबे की धारा में बदल गया। इस घटना में 200 से अधिक लोग मारे गए या लापता हो गए थे। अक्टूबर 2023 में सिक्किम में हुई दक्षिण ल्होनाक की घटना में एक अलग प्रक्रिया देखने को मिली। बहुत ज्यादा वजनी मलबा ग्लेशियल-झील में आया, जिससे ऊंची लहरें पैदा हुईं और पानी को रोककर रखने वाला प्राकृतिक अवरोध टूट गया। इसके बाद बेहद विनाशकारी गति से बाढ़ तीस्ता घाटी में उतर आई। नेपाल की घटना इसका एक और वेरिएशन बताती है। शुरुआती रिपोर्टों में किसी भूकंप के कारण ग्लेशियर टूटने की संभावना जताई गई। लेकिन बाद के वैज्ञानिक आकलन ने संकेत दिया कि संभवत: ग्लेशियर टूटने से ही भूकंपीय गतिविधियां पैदा हुई हों। ऊंचे बर्फीले पहाड़ से चट्टान और बर्फ की भारी मात्रा टूटकर तेजी से नीचे गिरी। इससे बना मलबा और पानी नदी के बहाव-क्षेत्र में जा मिला। इन तीनों घटनाओं से एक महत्वपूर्ण सबक मिलता है- नीचे की ओर एक जैसी दिखने वाली तबाही के स्रोत ऊंचाई पर बिल्कुल अलग हो सकते हैं। एक और प्राकृतिक घटना है, जिसके बारे में अधिक जन-जागरूकता की जरूरत है, वह है पर्माफ्रॉस्ट। यह ऐसी चट्टानों वाली जमीन होती है, जो कम से कम लगातार दो वर्षों तक जमी रहती है। अत्यधिक ऊंचाई पर दरारों में मौजूद बर्फ पहाड़ की चट्टानों को आपस में जोड़े रखने में मदद कर सकती है। तापमान में बदलाव, बार-बार जमने-पिघलने की प्रक्रिया और पर्माफ्रॉस्ट का धीरे-धीरे क्षरण इस प्राकृतिक जुड़ाव को कमजोर कर सकता है। इसका यह मतलब नहीं है कि हिमालय के पहाड़ अब हर जगह टूटकर गिरने वाले हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में हमें पहाड़ों की स्थिरता का भी गंभीरता से अध्ययन करना होगा। पानी और मलबा नीचे जाने के लिए सबसे आसान रास्ते तलाशते हैं। घाटियां पानी, बर्फ, पत्थरों और तलछट की असीमित ऊर्जा को एक सीमित रास्ते में चैनलाइज कर देती हैं। दुर्भाग्य से, इंसानी गतिविधियां भी ठीक इन्हीं जगहों में होती हैं। सड़कें नदी घाटियों के साथ-साथ बनाई जाती हैं। पुल इन्हीं नदियों को पार करते हैं। जलविद्युत परियोजनाएं भी इन्हीं घाटियों पर निर्भर रहती हैं। पीढ़ियों से गांव नदियों के किनारे बसते आए हैं। तीर्थयात्री, पर्यटक और ट्रेकिंग करने वाले भी इन्हीं रास्तों से गुजरते हैं। ऐसे में कई किलोमीटर दूर और हजारों मीटर ऊंचाई पर शुरू हुई कोई आपदा अचानक इन लोगों के लिए खतरा बन सकती है। हमें आपदा को नीचे तक ले जा सकने वाले पूरे डाउनस्ट्रीम कॉरिडोर को समझने की जरूरत है। हर आकस्मिक बाढ़ असाधारण बारिश के कारण नहीं आती। कभी-कभी इसका स्रोत बहुत अधिक ऊंचाई पर होता है, जहां बर्फ, चट्टान, पानी, तापमान और गुरुत्वाकर्षण ऐसी परिस्थितियां पैदा करते हैं, जिन्हें समझना हम अभी सीख ही रहे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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