शेखर गुप्ता का कॉलम:  क्या राजनीति में सिद्धांत मायने रखते हैं?
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शेखर गुप्ता का कॉलम: क्या राजनीति में सिद्धांत मायने रखते हैं?

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सामूहिक दलबदल के इस मौसम में कई सवाल उभरते हैं : पार्टियां टूटती क्यों हैं? नेता दल क्यों बदलते हैं? क्या विचारधारा, सिद्धांत या वफादारी की कोई अहमियत है? इनके साथ एक और सवाल उभरता है : कुछ दल क्यों टूट जाते हैं, मगर कुछ क्यों नहीं टूटते?
पहले यह देखें कि भारी ‘आवाजाही’ के इन महीनों में क्या-क्या हुआ। ममता बनर्जी की टीएमसी का आंतरिक तख्तापलट सबसे बड़ी खबर बनी। लेकिन उससे होड़ लेते हुए उद्धव ठाकरे की बची-खुची शिवसेना भी फिर टूटी। झारखंड में ‘इंडिया’ गठबंधन के विधायकों ने क्रॉस वोटिंग करके एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवाणी को जिता दिया। कांग्रेस खुश हो सकती है कि कर्नाटक में डीके शिवकुमार ने एमएलसी के चुनाव में एनडीए के कुछ विधायकों से क्रॉस वोटिंग करवा ली। आम आदमी पार्टी ने सात सदस्य गंवाए। बीजू जनता दल ने एनडीए की झोली में अपने तीन सदस्यों का ‘योगदान’ दिया। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब वाईएसआरसीपी ने भी अपने कुछ सदस्य कम किए थे। सबने एनडीए (भाजपा) की संख्या में इजाफा ही किया। शिरोमणि अकाली दल के अंदर से भी विदाई हुई, मनप्रीत सिंह बादल समेत। उनमें मनजिंदर सिंह सिरसा भी हैं, जो अब दिल्ली में मंत्री हैं। अगर मैं भाजपा में शामिल होने वाले कांग्रेसियों की सूची बनाने लगूं तो यह पूरा कॉलम भी छोटा पड़ेगा। इसलिए मैं केवल उनके नाम लूंगा, जो भाजपा में जाकर मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्री बने या कांग्रेस में मुख्यमंत्री थे। मुख्यमंत्री की कुर्सी आखिर उन सबसे बड़े पदों में है, जिसकी पेशकश कोई पार्टी कर सकती है। आज भाजपा के मुख्यमंत्रियों में से तीन कांग्रेस से आए हैं : असम के हिमंत बिस्वा सरमा, अरुणाचल प्रदेश के पेमा खांडू और त्रिपुरा के माणिक साहा। हाल तक मणिपुर के मुख्यमंत्री रहे एन. बीरेन सिंह का नाम भी आप इनमें शामिल कर सकते हैं। ये चारों कांग्रेस में प्रमुख पदों पर थे। केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल ज्योतिरादित्य सिंधिया, किरण रिजिजू, राव इंदरजीत सिंह, जितिन प्रसाद और रवनीत सिंह बिट्टू का नाम भी लिया जा सकता है। लगभग ये सारे नेता कांग्रेस के ख्यात परिवारों के हैं। भाजपा में शामिल होने वाले कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्रियों की संख्या एक फुटबॉल टीम के बराबर है : कैप्टन अमरिंदर सिंह, पेमा खांडू, अशोक चव्हाण, एसएम कृष्णा, नारायण दत्त तिवारी, दिगंबर कामत, किरण कुमार रेड्डी, विजय बहुगुणा आदि-आदि। पेमा खांडू के सिवा किसी को कोई लाभ नहीं हासिल हुआ। कहा जा सकता है कि सभी पार्टियों में नुकसान में रहे नेताओं के लिए भाजपा चुम्बक जैसी है, क्योंकि लाभ वहीं जाकर मिल सकता है। इसके अलावा, ‘साम, दाम, दंड, भेद’ की नीति भी अपनाई जाती है। सामूहिक दलबदल कराने की कला में तो महारत हासिल कर ली गई है। उनके दो-तिहाई सदस्यों को पाला बदलने के लिए तैयार कर लो और दावा करो कि अलग हुआ गुट ही असली पार्टी है। इससे सवाल पैदा होता है कि विरोधी पार्टियों में तोड़फोड़ का चलन क्या अब शुरू हुआ है? कांग्रेस इस खेल की उस्ताद रह चुकी है। वास्तव में, सुप्रीम कोर्ट ने जब तक बोम्मई मामले में (11 मार्च 1994 को) फैसला नहीं सुनाया था, तब तक कांग्रेस अनुच्छेद 356 का मनमाना इस्तेमाल करके विरोधी दलों की सरकारों को गिराती रही। अब फर्क यह आया है कि अपने विस्तार के लिए ‘अधिग्रहण’ का सहारा लिया जा रहा है। यह हमें हमारे दूसरे सवाल के सामने ला खड़ा करता है। अधिकतर पार्टियां क्यों टूट जाती हैं और कुछ पार्टियों में टूट क्यों नहीं होती? जो नहीं टूटतीं, उनमें केवल तीन के नाम मैं बता रहा हूं। भाजपा तो है ही, उसके अलावा समाजवादी पार्टी और वाम दल। वामपंथियों में लेनिन-ट्रॉट्स्की, मॉस्को-बीजिंग को लेकर खूब बहस और टूट-फूट हो चुकी है, लेकिन वे एक मोर्चे के रूप में एकजुट रहे हैं। वाम दल आज सत्ता से बाहर हैं और अपने इतिहास में सबसे निचले स्तर पर हैं। लेकिन उनमें से कोई भी कहीं जाने का रास्ता नहीं तलाश रहा है। कांग्रेस लोकसभा में अपने सबसे निचले स्तर (44 सीटें) पर 2014 में पहुंची। 1984 के आम चुनाव में भाजपा मात्र दो सीटों पर सिकुड़ गई थी, फिर भी एकजुट रही। वास्तव में, अपनी स्थापना (भारतीय जनसंघ के रूप में) के 75 वर्षों में भाजपा 2014 से पहले केवल छह साल सत्ता में रही। लेकिन उसमें कोई विभाजन नहीं हुआ, और उसमें से केवल एक उल्लेखनीय और अल्पकालिक दलबदल का मामला गुजरात में शंकर सिंह वाघेला का है। इसके उलट कांग्रेस कई बार टूटी। हालांकि भाजपा से कुछ उल्लेखनीय अलगाव हुए, जिनका जिक्र जरूरी है। पहला उदाहरण बलराज मधोक का है, जो जम्मू से ‘स्वयंसेवक’ थे और जिनकी अध्यक्षता में पार्टी ने 1967 के चुनाव में 35 सीटें जीतीं, जो सबसे बड़ी संख्या थी। मधोक आर्थिक नीति के मामले में स्वतंत्र पार्टी जैसी ताकतों से पार्टी को जोड़ने के मुद्दे पर अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी सरीखे साथी नेताओं से लड़ पड़े थे। विरोधाभास यह था कि संघ इस मामले में गांधीवाद के ज्यादा करीब था और मधोक इसे वामपंथी झुकाव के रूप में देखते थे या इंदिरा गांधी के विचारों से समानता मानते थे। 1973 में मधोक को जनसंघ के अंदर किनारे कर दिया गया, और वे नाराज हो गए। उन्होंने पार्टी के नेताओं, खासकर वाजपेयी पर तीखे हमले किए, लेकिन किसी विरोधी दल में नहीं गए। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि इंदिरा गांधी ने 1980 में उन्हें मंत्री पद की पेशकश की थी, लेकिन स्वयंसेवक होने के नाते वे लालच में नहीं फंसे। बाद में हमने पूर्व भाजपाई मुख्यमंत्रियों कल्याण सिंह, उमा भारती और बीएस येदियुरप्पा को बगावत करते देखा। लेकिन इन सबने घर वापसी की। शंकर सिंह वाघेला कांग्रेस के सहयोग से एक साल तक मुख्यमंत्री रहे। बाद में, उन्होंने अपने गुट का कांग्रेस में विलय कर दिया, उसके टिकट पर दो बार सांसद चुने गए और 2004 में केंद्रीय कपड़ा मंत्री बने। आज 85 की उम्र में वे अलग-थलग जीवन जी रहे हैं। भाजपा के अंदर असंतोष तो उभरता रहा है लेकिन बगावत नहीं हुई है। संघ और कार्यकर्ताओं के बीच गुरु-शिष्य वाले रिश्ते ने इसे एकजुट बनाए रखा है। इसमें सत्ता भी अपने घर में उभरे नेताओं के हाथों में ही रही है, जिनमें वैचारिक शुद्धता रही है। साम, दाम, दंड, भेद की नीति
कहा जा सकता है कि सभी पार्टियों में नुकसान में रहे नेताओं के लिए भाजपा चुम्बक जैसी है, क्योंकि लाभ वहीं जाकर मिल सकता है। ‘साम, दाम, दंड, भेद’ की नीति भी अपनाई जाती है। कांग्रेस भी इस खेल की उस्ताद रह चुकी है। वह अनुच्छेद 356 का मनमाना इस्तेमाल करके विरोधी सरकारों को गिराती रही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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