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- Shekhar Gupta Column: The Right Time To Form A Trump Victim Alliance
6 घंटे पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’
2006 के ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम’ में भारत सरकार और कॉर्पोरेट जगत ने मिलकर ‘इंडिया एवरीव्हेयर’ आयोजन को प्रायोजित किया था। उसके तहत कई इवेंट, पार्टियां की गईं; संगीत के कार्यक्रम हुए और खुलकर उपहार बांटे गए। तब भारतीय अर्थव्यवस्था बम-बम कर रही थी। हमारे ‘टेक सेक्टर’ का सितारा बुलंदी की ओर बढ़ रहा था। लेकिन 2026 में नजारा अलग था। भारत के नौ राज्यों ने दावोस में मंडप लगाए थे और छह मुख्यमंत्री मौजूद थे, मगर हालात 2006 के बिलकुल उलट थे। भारत के लोग अपने ही टीवी चैनलों के सिवा और कहीं खबरों में नहीं दिख रहे थे।
लेकिन जब जी-7 के पांच प्रमुख नेता भारत के साथ व्यापार समझौते की बढ़-चढ़कर बात कर रहे थे, तब अपना सीना ठोकने की कोई जरूरत थी भी नहीं। ईयू की उर्सुला वॉन डेर लेन ने इसे “मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा। बहुत दिन नहीं बीते हैं, जब वे यूक्रेन के मामले में भारत के रुख की आलोचना कर रही थीं। लेकिन दुनिया किस कदर बदल चुकी है, इसका अंदाजा कनाडा के मार्क कार्नी के जोरदार भाषण में भारत के साथ व्यापार समझौते के जिक्र से बेहतर किसी और बात से नहीं लग सकता है। जबकि उनके पूर्ववर्ती जस्टिन ट्रूडो ने तो वार्ताओं को स्थगित ही कर दिया था।
ट्रम्प और उनके हॉवर्ड लुटनिक, स्कॉट बेस्सेंट और इलॉन मस्क सरीखे लोगों में ही दावोस इतना उलझा हुआ था कि दूसरों का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए इन लोगों से टक्कर लेने के सिवा और कोई उपाय नहीं था। कार्नी, मैक्रों और मर्ज अलग-अलग पैमाने पर यही करते नजर आए। कार्नी ने तो पश्चिमी गठजोड़ के अंत की घोषणा ही कर दी। भारत के लिए सबसे मुफीद यही था कि इस झगड़े से दूर ही रहो।
इसका एक फायदा यह निकला कि ट्रम्प से नाराज पारम्परिक, अमीर, विकसित अमेरिकी सहयोगी नए मित्रों की तलाश करते दिखे। हम इसे ‘ट्रम्प पीड़ित’ गठजोड़ कह सकते हैं! कार्नी ने अपने भाषण में ‘मिडिल पावर्स’ की जो परिभाषा दी और ट्रम्प की दुनिया में उनकी जो जगह बताई, वह एक युग को परिभाषित करने वाला विचार बन गया।
दो सर्वशक्तिमान ध्रुवों वाली दुनिया में अमेरिका एक क्रूर और बर्बर ‘दादा’ वाली भूमिका में है और चीन एक बेहद चतुर दबंग की भूमिका में, जो अपनी आर्थिक तथा रणनीतिक छुरी को इतनी बारीकी से घुमाता है कि आपको दर्द भी नहीं महसूस होता। ऐसे में आपके सामने विकल्प क्या है?
आप दोनों में से किसी एक महाशक्ति के याचक बन सकते हैं। या पाकिस्तान की तरह दोनों के याचक बन जाएं, जो कि दुर्लभ से भी दुर्लभ है। लेकिन तब आप क्या करेंगे जब आप एक ऐसे देश हैं, जो शक्तिशाली भी है और स्वाभिमानी भी, या जिसकी जनता अपनी गरिमा को इतना मूल्यवान मानती है कि घुटने टेकने वाले नेता की छुट्टी कर देती है?
दो महाशक्तियों के बाद 10 टॉप अर्थव्यवस्थाओं की गिनती शुरू करें तो तीसरे, चौथे, पांचवें नंबर पर क्रमशः जर्मनी, जापान और भारत दिखेंगे, जिन्हें ‘मिडिल पावर्स’ में शुमार कर सकते हैं। ब्रिटेन को फिलहाल छठे और रूस को नौवें नंबर पर रख सकते हैं। फ्रांस और इटली को 7 और 8 पर और कार्नी के कनाडा को 10वें नंबर पर रख सकते हैं।
11 से लेकर आगे की गिनती में ब्राजील, स्पेन, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया आदि हैं। ये सारे देश दुनिया में अपनी स्थिति पर पुनर्विचार कर रहे हैं। लेकिन ट्रम्प का अमेरिका सबके साथ तिरस्कार वाला व्यवहार करता है। ये देश चीनी खेमे में भी नहीं जा सकते। क्या ये किसी तरह की एकता, साझा मकसद और साथ मिलकर मोलभाव करने की थोड़ी ताकत बना सकते हैं?
क्या आपको गुटनिरपेक्ष आंदोलन की कुछ याद है? यह एक सच्ची ताकत नहीं बन पाया, तो इसके कई कारण हैं। पहला यह कि यह सैद्धांतिक रूप से तो गुटनिरपेक्ष था, मगर इसका ज्यादा झुकाव सोवियत संघ की तरफ था। दूसरे, इसमें ऐसे सदस्य नहीं थे, जिन्हें उस समय ‘मिडिल पावर्स’ में गिना जा सकता था।
भारत उसमें सबसे बड़ा देश था, लेकिन उसका नैतिक तेवर उसकी आर्थिक तथा सैन्य कमजोरियों तथा निर्भरताओं के कारण फीका पड़ जाता था। और कुछ समय बाद तो भारत सोवियत संघ का संधिबद्ध सहयोगी ही बन गया था। आज जब जर्मनी, फ्रांस, जापान, कनाडा और यूरोप के ज्यादातर देश इस नए विश्व पर नजर डाल रहे हैं, तब क्या एक नए गुटनिरपेक्ष आंदोलन का समय आ गया है?
बेशक यह आज के समय के साथ तालमेल करती नई विशेषताओं से लैस होगा। इसमें विचारधारा नहीं, व्यावहारिकता पर जोर होगा। अमेरिका-चीन के साथ व्यापार तो करो, लेकिन एक समूह के रूप में मोलभाव की ताकत रखो। यहां हम कार्नी के उपरोक्त भाषण को याद करें, जिसमें वे कहते हैं- ‘अगर हम खाने की मेज पर नहीं होंगे, तो खाने का मेनू बन जाएंगे।’ इसलिए ‘मिडिल पावर’ देशों को साथ आना पड़ेगा, साझा हितों की खोज करनी होगी और विरासत में मिली खेमेबंदियों से आगे देखना होगा। जी-7, जी-20, नाटो और यूएन तो आज बेदम ही हो चुके हैं। वहीं ब्रिक्स और एससीओ जैसे दूसरे कुछ समूह चीन के दबाव में हैं।
ट्रम्प को किसी समूह से निबटना नापसंद है। इसकी सबसे साफ मिसाल नाटो के प्रति उनकी नफरत है। उनके पास विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ), विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ), पेरिस जलवायु समझौता, संयुक्त राष्ट्र और क्वाड तक के लिए समय नहीं है। चूंकि वे आप से संकेतों में बात नहीं करते, बल्कि आपको घूरते हुए अपने घोर स्वार्थ की बात करते हैं, इसलिए उनके दिमाग को समझना अब ज्यादा आसान है।
वे किसी भी बहुपक्षीय मेल को अमेरिकी ताकत को कमजोर करने वाला मानते हैं। वे किसी समूह से नहीं, हर देश से अलग-अलग बात करेंगे। और वे चीन को छोड़ हर देश से कहीं ज्यादा ताकतवर हैं। इस तरह वे वार्ता की मेज पर “कोर्लिओन सिद्धांत’ को ले आते हैं, जो यह कहता है कि मैं तुम्हें जो पेशकश कर रहा हूं उसे तुम मना नहीं कर सकते।
ग्रीनलैंड इसका सबसे ताजा उदाहरण है। यूक्रेन भी उसी दिशा में है। चीन को छोड़ कोई भी देश ट्रम्प के साथ बराबरी की हैसियत से बात नहीं कर सकता। इसलिए, जो ‘मिडल पावर’ देश बहुपक्षीय संगठनों के मूल आधार थे, वे आज बेसहारा और ट्रम्प की मर्जी पर निर्भर महसूस कर रहे हैं।
दुनिया के “मिडिल-पावर’ देश क्या अब एकजुट होंगे? अमेरिका पर दुनिया के देशों का भरोसा टूट चुका है। ‘मिडिल पावर’ वाला परिदृश्य कायम हो रहा है। क्या यह कारगर होगा? दावोस में मस्क ने जो कहा, यहां हमें उसे याद रखना होगा-निराशावादी और सही होने से बेहतर है आशावादी और गलत होना! (ये लेखक के अपने विचार हैं)








