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- Pandit Vijay Shankar Mehta Column: Maintain Affection In Transactional Meetings
4 घंटे पहले
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पं. विजयशंकर मेहता
संबंधों को इतना अच्छा बना लें कि कोई काम रुके ना। इसको जनसम्पर्क की कला कहते हैं। तुलसीदास जी अपने साहित्य में ऐसे संकेत देते रहते हैं। गरुड़ काकभुशुंडि जी के पास पहुंचे तो उनके स्वागत में काकभुशुंडि जी ने एक पंक्ति बोली- नाथ कृतारथ भयउं मैं तव दरसन खगराज, आयसु देहु सो करौं अब प्रभु आयहु केहि काज। आपके दर्शनों से मैं कृतार्थ हो गया। पक्षीराज आप जो आज्ञा दें, वहीं करूं। बताइए किस कार्य के लिए आए हैं? हम भी यह प्रयोग कर सकते हैं।
चूंकि आजकल हर मुलाकात लेन-देन पर टिक गई है तो आत्मीयता तो समाप्त ही हो गई। लेकिन हम कोशिश करें कि यह पंक्ति हम दिल से बोलें। सामने वाले से पूछें कि बताइए क्यों आए हैं और आपको देखकर हम बहुत खुश हुए। ये दो बातें उनके ऊपर ‘हैलो इफेक्ट’ करेंगी। मार्केट की भाषा में ‘हैलो इफेक्ट’ का अर्थ होता है किसी एक ब्रांड की वस्तु का उपयोग करें और वो पसंद आए तो उसी ब्रांड की दूसरी वस्तु का उपयोग करना। ठीक ऐसा ही होगा, सामने वाला व्यक्ति आपसे इतना जुड़ जाएगा कि फिर वो आपकी हर बात सुनेगा, मानेगा।








