शेखर गुप्ता का कॉलम:  देश की दिशा बदलने वाला दशक
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शेखर गुप्ता का कॉलम: देश की दिशा बदलने वाला दशक

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5 घंटे पहले

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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar

शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

एक युवा और विकासशील गणतंत्र का हर दशक सबसे महत्वपूर्ण होने का दावा कर सकता है। लेकिन एक दशक ऐसा था, जिसमें शायद ऐसी सबसे ज्यादा खबरें बनीं, जो आज भी हमारे लोकतंत्र और सार्वजनिक विमर्शों पर हावी हैं। यह 1985-95 का दशक था। देश के लिए और करीब के पड़ोस के लिए महत्वपूर्ण रहीं इन खबरों को याद कीजिए : शिखर पर पहुंचने के बाद कांग्रेस पार्टी का पतन, गठबंधनों की शुरुआत, बोफोर्स घोटाला, मंडल बनाम मंदिर की टक्कर, पंजाब और कश्मीर में अलगाववाद, श्रीलंका और मालदीव में भारत के सैन्य हस्तक्षेप, पाकिस्तान के साथ युद्ध के कगार पर पहुंचना (ब्रासटैक्स 1987 और 1990 में पाकिस्तान का ‘परमाणु ब्लैकमेल’), सुमदोरोंग चू में चीन से आमना-सामना (1986-87) और इसके बाद तांग श्याओपिंग से सुलह, जिया-उल-हक और राजीव गांधी की हत्या, इस्लामवादी जिहाद का वैश्वीकरण और उसका कश्मीर में विस्तार और भारतीय अर्थव्यवस्था का उदारीकरण। हालांकि यह दशक लोकसभा में कांग्रेस को मिली 414 सीटों की चट्टानी स्थिरता के साथ शुरू हुआ था, इसके बावजूद इसने चार प्रधानमंत्री देखे। मात्र 10 सालों के लिए यह संख्या क्या ज्यादा नहीं है?

खबरें और भी हैं। आर्थिक सुधारों के कारण विश्वभर में पैर फैला रहे भारत का दर्जा ऊंचा हुआ, अफगान युद्ध और तियानआनमेन चौक से लेकर सोवियत संघ के विघटन और कुवैत पर सद्दाम हुसैन के कब्जे के कारण हुए प्रथम खाड़ी युद्ध तक। शीतयुद्ध खत्म हुआ और रंगभेद भी। भारत और इजराइल दोस्त बने।

अच्छी खबर हो या बुरी, पीढ़ीगत बदलाव हों या शाश्वत विमर्श, सभी मामलों में दूसरे दशकों को इस दशक की बराबरी करने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। सिक्के का एक पहलू यह है कि आजादी के बाद से भारत की जो-जो आशंकाएं थीं, वे सब इस दशक में सच साबित हुईं- चाहे वह राजनीतिक अस्थिरता को लेकर हो या साम्प्रदायिक और जातीय विभाजनों, स्थिरता देने वाले एक परिवार के कमजोर पड़ने, एटमी और आतंकवादी खतरों, सामाजिक उथलपुथल आदि को लेकर हो, या भरोसेमंद मित्र-देश (सोवियत संघ) को खोने को लेकर ही क्यों न हो।

सिक्के के दूसरे पहलू का ताल्लुक इस बात से है कि भारत ने इन सबका सामना कैसे किया- गठबंधनों पर भरोसा करना सीखकर, अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारकर, खुद को नए रणनीतिक संदर्भ के साथ पेश करके और अपने मानव संसाधन को अपनी ताकत बनाकर। भारत इस दशक में पहले की तुलना में ज्यादा ताकतवर, आत्मविश्वासी बना और दुनिया में उसने अपनी धाक बढ़ाई।

उस दौर का पहला टिकाऊ बदलाव था- कम्प्यूटरों को राजीव गांधी के द्वारा बढ़ावा देना। भारतीय न्यूजरूमों में पहला कंप्यूटर एपल का बॉक्सनुमा डेस्कटॉप था, जो 1985 में आया। जगह की कमी से जूझते न्यूजरूम में इन्हें अलग कमरा देना पड़ता था। उंगलियों में दर्द पैदा करने वाले टाइपराइटरों से मुक्ति और फ्लॉपी डिस्क के भरोसे ने की-बोर्ड के लिए आकर्षण बढ़ाया। चूंकि हम अपने जीवन में आए अहम मोड़ों को याद रखते हैं, इसलिए इन डेस्कटॉपों में से एक पर मैंने अपनी पहली जो रिपोर्ट टाइप की, वह 1985 में मंडल रिपोर्ट पर उठे विवाद को लेकर थी। वह विवाद आज भी जारी है।

लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा और उसके बाद दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के कारण कई राज्यों में साम्प्रदायिक दंगे हुए। सबसे खूनी दंगे तत्कालीन बम्बई और उसके आसपास के भीड़ भरे स्लमनुमा छोटे शहरों में हुए। इसके बाद प्रमुख व्यापारिक इमारतों और पड़ोसों को निशाना बनाकर सीरियल बम विस्फोट किए गए।

भारत को सीरियल बम विस्फोटों का यह पहला अनुभव नहीं था, देश की राजधानी पंजाब संकट और सिखों के संहार के बाद ऐसे कुछ विस्फोटों से गुजर चुकी थी। लेकिन बॉम्बे में जिस बड़े पैमाने पर विस्फोट हुए, वैसे पहले कभी नहीं हुए थे, और उनके तार जितने स्पष्ट रूप से पाकिस्तान से जुड़े नजर आए थे, वैसा भी इससे पहले नहीं हुआ था।

तीन शब्दों के संक्षिप्त नाम वाले आतंक- आईएसआई ने अपनी मौजूदगी जताई, और तभी से यह हमें परेशान करता आ रहा है। माफिया सरगना दाऊद इब्राहिम शारजाह के क्रिकेट स्टेडियम में नाटकीय रूप से प्रकट होकर भारत के लिए ‘विलेन नंबर वन’ बन गया, और बना हुआ है।

राजीव गांधी ने 1985 में मंडल रिपोर्ट को सहजता से अमान्य करके पिछड़ों के उभार की चिनगारी सुलगा दी थी। इसके बाद कई ऐसी गलतियां की गईं, जिन्होंने साम्प्रदायिकता को उभार दिया, मसलन शाहबानो मामले में अदालत के फैसले को पलटना, सलमान रूश्दी की किताब ‘द सैटेनिक वर्सेस’ पर प्रतिबंध लगाना, अयोध्या में मंदिर के ताले खुलवाना।

इसके बाद से हमारी राजनीति दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच टकराव में बदल गई है। आप धर्म से बनी एकता को जाति की तलवार से कैसे बांट सकते हैं या जाति ने जिसे बांट रखा है उसे धर्म के नाम पर कैसे जोड़ सकते हैं- इसी का खेल आज तक भारत की राजनीति में चल रहा है। इस खेल में जो भी जीतता है, भारत पर वही राज करता है।

मंडल खेमे को 1989 से 2014 तक 25 साल राज करने का मौका मिला, जब तक कि नरेंद्र मोदी ने 2014 में आकर इस समीकरण को उलट नहीं दिया। अब यह मंदिर (हिन्दुत्व) वालों का दौर है, और ऐसा नहीं लगता कि इसकी उम्र भी 25 साल से कम होगी। हमारी सियासत का अहम मसला अभी भी मंदिर बनाम मंडल का ही है। अभी-अभी यह बिहार में जाहिर हो चुका है, और 2027 में उत्तर प्रदेश में भी यही रहने वाला है।

1985-95 के इस दशक ने राष्ट्रीय राजनीति को जिस तरह परिभाषित किया है, वह अब तक के इतिहास में सबसे टिकाऊ रहा है। यह बात राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर भी लागू होती है। आर्थिक सुधारों से आए उछाल के 35 साल बाद जबकि हम अपनी सफलताओं का जश्न मना रहे हैं, तब भी अर्थव्यवस्था को और खोलने के सवाल पर आशंकाएं और संदेह कायम हैं। इस लेख के शुरू में मैंने इतिहास को परिभाषित करने वाली जिन करीब दर्जनभर खबरों का जिक्र किया, उनमें से आर्थिक सुधार को छोड़ बाकी सबको मैंने एक​ पत्रकार के रूप में कवर किया है। मैं तो यही कहूंगा कि उस दशक में जिंदगी अच्छी गुजरी थी।

इस दशक ने राष्ट्रीय राजनीति को परिभाषित किया… 1985-95 के इस दशक ने राष्ट्रीय राजनीति को जैसे परिभाषित किया है, वह सबसे टिकाऊ रहा है। यह बात राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर भी लागू होती है। ​हालांकि आर्थिक सुधारों के 35 साल बाद अर्थव्यवस्था को और खोलने के सवाल पर आशंकाएं कायम हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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