शेखर गुप्ता का कॉलम:  सवाल निजी क्षेत्र की क्षमताओं पर उठे हैं
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शेखर गुप्ता का कॉलम: सवाल निजी क्षेत्र की क्षमताओं पर उठे हैं

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4 घंटे पहले

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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar

शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

भारत में आर्थिक सुधारों के बाद सबसे बड़े ग्लोबल ब्रांड के रूप में उभरे इंडिगो की जो कहानी सामने आई है, उस पर तीन तरह की प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं और इन तीनों के साथ एक ही तरह की हताशा जुड़ी है। पहली प्रतिक्रिया यह हो सकती है कि इंडिगो के संस्थापक और उसके प्रबंधक जरूर बड़े नासमझ, विचारशून्य या अहंकारी होंगे कि उन्होंने इसे इस तरह बिखरने दिया।

दूसरी यह हो सकती है कि जो भी सरकार से खासकर उस समय रार ठानने की सोच रहा होगा, जब पुतिन शहर में पधारे हुए थे, वह जरूर गलती कर रहा होगा। और तीसरी प्रतिक्रिया उनकी हो सकती है जो दशकों से यह कहते रहे हैं कि सरकार का उन मामलों में दखल नहीं होना चाहिए, जिनमें निजी क्षेत्र बेहतर सेवा दे सकता है। ऐसे लोग कह सकते हैं कि आप इतने लापरवाह कैसे हो सकते हैं कि इसका उलटा कर बैठें?

इतने वर्षों से निजी विमान सेवा विकास करती रही थी। वह जेट एयरवेज और किंगफिशर के बिखराव को भी झेल गई। एअर इंडिया का निजीकरण हुआ। तब पुरानी हुकूमत में कई लोग अपनी सत्ता छिन जाने से नाराज हो रहे थे। क्योंकि अब आखिर कोई विमान नहीं खरीदा जा रहा था, नौकरियां या ठेके देने का काम नहीं हो रहा था, उपभोग की चीजों की खरीद नहीं हो रही थी।

सरकार को कम-से-कम एक मामले में अप्रासंगिक बना दिया गया था। इस मामले में निजी क्षेत्र ने ऐसी सफलता हासिल की थी, जिससे दुनिया ईर्ष्या कर सकती थी। टेलीकॉम सेक्टर में पुराने अधिकारों का कम-से-कम कुछ अवशेष तो सरकार के हाथ में मौजूद है, जैसे स्पेक्ट्रम की बिक्री, बीएसएनएल के रूप में एक सक्रिय ‘पीएसयू’ और वोडाफोन-आइडिया में 49 फीसदी की इक्विटी। लेकिन नागरिक विमानन में उसके हाथ में महत्वहीन हेलीकॉप्टर चार्टर के सिवा कुछ नहीं है। लगभग सारे महत्वपूर्ण एयरपोर्ट निजी हाथों में हैं और कई दूसरे भी जल्द ही उन्हीं के हाथों में जाने वाले हैं।

लेकिन अब सरकार फिर से वापस आ गई है और वह भी किस तरह से! मंत्री जी एक टीवी चैनल से दूसरी तक जाकर इंडिगो संकट को दुरुस्त करने के वादे कर रहे, उन सूचीबद्ध कंपनियों का प्रबंध परोक्ष रूप से अपने हाथ में लेने की बात करते रहे, जिनका मूल्य 2 लाख करोड़ (2 ट्रिलियन) रुपए या 24 अरब डॉलर के बराबर है, बावजूद इसके कि करीब 15 फीसदी तो संकट के दौर में ढह जाती हैं। कोई निजी कंपनी घालमेल करे, लेकिन इसके लिए सफाई या सवालों के जवाब उसका सीईओ नहीं, एक मंत्री दे रहा हो, ऐसा तो सिर्फ भारत में ही हो सकता है।

मंत्री ने सीईओ की छुट्टी कर देने की बात कही और उसे इस सेक्टर के रेगुलेटर के हुजूर में पेश होने का हुक्म दिया। सीईओ ने पहले तो पायलटों के काम के घंटों से संबंधित उन नियमों को वापस ले लिया, जिन्हें लागू करवाने में केंद्रीय मंत्रालय और रेगुलेटर दो साल से ऊपर से नाकाम रहा है। इसके बाद फरवरी 2026 तक अपनी उड़ानों की संख्या में कटौती कर दी। अब वे बड़ी बातें कर रहे हैं कि दो का वर्चस्व (डुओपोली) खराब चीज है इसलिए वे चाहेंगे कि 5 एयरलाइन हों, जिनमें से हर एक के पास 100 विमान हों।

क्या वे इंडिगो और चूंकि यह एयरलाइन भारतीय विमानन का दो तिहाई हिस्सा है, इसलिए भारतीय विमानन को अमेरिका के ‘बेबी बेल्स’ वाले दौर में ले जाना चाहते हैं? एक समय अमेरिका में एटीएंडटी कंपनी के एकाधिकार को ‘रीजनल बेल ऑपरेटिंग’ कंपनियों में तोड़ा गया था, लेकिन इस प्रसंग के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए मंत्री अपने स्टाफ को गूगल सर्च करने को कह सकते थे। भारतीय विमानन विशाल दिखता है लेकिन इसके और विकास की संभावनाएं हैं। इंडिगो को ही लीजिए।

उसने 1400 और विमानों की खरीद के ऑर्डर दिए हैं। एअर इंडिया ने करीब 570 विमानों और अकासा एयर और स्पाइसजेट ने करीब 200 से ज्यादा विमानों के ऑर्डर दिए हैं। जब भारत में 500-500 विमानों वाली पांच एयरलाइनों की गुंजाइश है, तब हम केवल 100-100 विमानों वाली पांच एयरलाइनों की बात ही क्यों करें?

इस अविश्वसनीय सफलता की भारतीय कहानी इसलिए सच साबित हुई ​थी, क्योंकि सत्ता-तंत्र ने उस बात को आखिरकार अपना लिया था, जिसे प्रधानमंत्री अक्सर कहते रहे हैं कि सरकार का काम बिजनेस की दुनिया में दखल देना नहीं है। जहां भारतीय विमानन वैश्विक पैमाने के मुताबिक विकास कर रहा है, इसके प्रभारी मंत्री इसे और तोड़ने की बात कर रहे हैं।

लेकिन लगता है कि मंत्री पर नाराजगी जाहिर करके हम दिशा भटक रहे हैं। उन्हें ऐसा ‘ग्लैमरस’ मंत्रालय दिया गया था, जिसमें फीते काटने से ज्यादा बड़ा शायद ही कोई काम था, लेकिन एक संकट ने उन्हें मुश्किल में डाल दिया। बहरहाल, हम असली मुद्दे पर आएं। असली मुद्दा भारत की नाटकीय सफलता की कहानियों के मूल में सरकार की वापसी का है।

इंडिगो के कॉर्पोरेट मुख्यालय में फैसले करने वाले प्रमुख पदों पर सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति का आखिर क्या मतलब हो सकता है? यह जवाबदेही मुक्त ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ है। ये उसी रेगुलेटर नागरिक विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) से आते हैं, जिसने विमानों के चालक दल के ‘रेस्ट-एंड-रिकवरी’ के लिए ऐसे नियम बनाए, जिनसे रूढ़िवादी यूरोपीय लोग भी परहेज करेंगे। लेकिन यह सब उन लोगों की सहमति लिए बिना किया गया, जिन पर दारोमदार है।

इंडिगो को कई दोष दिए जा सकते हैं, लेकिन उसका सबसे बड़ा अपराध यह है कि उसने जनाक्रोश का सामना होने पर सरकार को अपना पालनहार बना लिया। जिस सरकार ने एअर इंडिया, इंडियन एयरलाइंस को एकाधिकार वाली कंपनी बना दिया था, फिर उनका पतन देखा और विमान खरीद के कई घोटालों का सामना किया। और अब यह फिर से मैदान में आ गई है।

आखिर इंडिगो ने यह पतन क्यों होने दिया और इस उम्मीद में खंदक में क्यों जा छिपी कि संकट खुद दूर हो जाएगा? सोशल मीडिया के इस दौर में, जब हर एक उपेक्षित यात्री की अपनी आवाज है और हरेक भटका हुआ सामान अपनी पहचान रखता है, आप अपनी अक्षमता को छुपा नहीं सकते। सार्वजनिक उपक्रमों वाले पुराने दौर में तो इसके लिए जिम्मेदारों की छुट्टी की जा सकती थी।

“मिनिमम गवर्नमेंट’ वाली बात का आखिर क्या हुआ? असली मुद्दा भारत की नाटकीय सफलता की कहानी के मूल में सरकार की वापसी का है। इंडिगो के कॉर्पोरेट मुख्यालय में फैसले करने वाले प्रमुख पदों पर सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति का आखिर क्या मतलब हो सकता है? मिनिमम गवर्नमेंट वाली बात का क्या हुआ?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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