संजय कुमार का कॉलम:  मतदाता कब सरकारों से नाराज होते हैं और कब नहीं?
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संजय कुमार का कॉलम: मतदाता कब सरकारों से नाराज होते हैं और कब नहीं?

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9 घंटे पहले

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संजय कुमार, प्रोफेसर व राजनीतिक टिप्पणीकार - Dainik Bhaskar

संजय कुमार, प्रोफेसर व राजनीतिक टिप्पणीकार

दुनिया के कई बड़े लोकतंत्रों में मतदाताओं ने हाल में जोरदार सत्ता-विरोधी रुख दिखाया है। अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण अफ्रीका और सेनेगल में सत्ताधारी दलों को या तो हार मिली है या उनकी सीटें बहुत घट गई हैं।

अमेरिका में डेमोक्रेट्स, ब्रिटेन में कंजर्वेटिव्स, जापान में लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी और दक्षिण अफ्रीका में अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस की हार ने बताया कि कैसे इन देशों के लोग चुनावों का इस्तेमाल सरकारों की सुस्ती से निपटने और सत्ता में विकल्प लाने के लिए कर रहे हैं। इसी प्रकार, सेनेगल के चुनाव में युवाओं का आक्रोश और राजनीतिक कुलीनों के खिलाफ पीढ़ीगत बदलाव की इच्छा नजर आई।

लेकिन लगभग इसी दौरान भारतीय राज्यों में हुए चुनाव इससे उलट रुझान बताते हैं। इस दौरान कई सरकारें फिर से चुनी गईं, जिससे वोटरों के सत्ता समर्थित रुख का पता चलता है। विपक्ष के तीखे प्रचार अभियान के बावजूद बिहार, हरियाणा और मध्यप्रदेश में भाजपा फिर सत्ता पाने में सफल रही।

यह वापसी इसलिए हुई, क्योंकि सत्ताधारी दल ने प्रचार अभियान में स्थायित्व, डबल इंजन की सरकार, विकास, कल्याणकारी योजनाएं, मजबूत नेतृत्व जैसे नैरेटिव गढ़कर सत्ता विरोधी लहर को निष्प्रभावी कर दिया।

गुजरात में भाजपा ने लगातार सातवीं बार जीत का रिकॉर्ड बनाया। 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की भारी चुनौती के बावजूद ममता बनर्जी की टीएमसी का सत्ता में लौटना ऐसे बहुध्रुवीय मुकाबलों में वोटरों के सत्ता समर्थित रुख का स्पष्ट उदाहरण रहा। देखने में ये उदाहरण अलग-अलग राज्यों में सत्ताधारी दलों की सरकार में वापसी के पृथक मामले लग सकते हैं।

बिहार भी उनमें से एक है, जहां नीतीश कुमार ने रिकॉर्ड दसवीं बार शपथ ली है। लेकिन 1952 से अब तक के भारत के चुनावों में प्रो-इन्कम्बेंसी (सत्ता-समर्थन) और एंटी-इन्कम्बेंसी (सत्ता-विरोध)- दोनों ही दौर आते रहे हैं।

1952 से 1966 के शुरुआती वर्षों में प्रो-इन्कम्बेंसी का दौर चला। इस अवधि में हुए 39 विधानसभा चुनावों में लगभग 85% सरकारें फिर से चुनी गईं। लेकिन 1967-79 और 1980-88 का दौर मिले-जुले रुझानों का रहा। 1967-79 के बीच हुए 82 चुनावों में 54% सरकारें दोबारा चुनी गईं, जबकि 46% सत्ता से बाहर हो गईं।

इसी तरह, 1980-88 के बीच 53 चुनावों में 51% सरकारों ने वापसी की और 49% को सत्ता खोनी पड़ी। 1989-98 और 1999-03 के बीच तेज सत्ता-विरोधी लहर चली। 1989-98 के बीच 63 विधानसभा चुनावों में 71% सरकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। 1999-03 के दौरान भी 31 चुनावों में 61% सरकारें वापसी नहीं कर पाईं।

2004-15 की अवधि में फिर से मतदाताओं का मिश्रित रुझान नजर आया। इस दौरान लगभग 55% सरकारों की वापसी हुई, जबकि 45% को हार झेलनी पड़ी। इसके बाद 2016-18 का दौर तीव्र सत्ता-विरोधी लहर का रहा। इसमें तकरीबन 75% मौजूदा सरकारें पराजित हुईं।

इस दौर को यूं भी समझा जा सकता है कि 2014 में केंद्र में भाजपा नीत एनडीए सरकार बनने के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन की सरकारों को राज्यों में लगातार हार मिली। बीते कुछ वर्षों में भारत में फिर से प्रो-इन्कम्बेंसी का दौर लौटा है। कई भाजपा-शासित राज्यों में सरकारें दोबारा चुनी गईं।

यह सच है कि इनमें से बहुत-सी राज्य सरकारों की वापसी कल्याणकारी योजनाओं के कारण हुई है, लेकिन इसमें प्रदेशों में हुए ढांचागत सुधारों का भी योगदान है, जिसका फायदा आम आदमी को हुआ। कल्याणकारी योजनाओं से सत्ताधारी दल को गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के वोट पाने में मदद मिली, वहीं बुनियादी ढांचे के विकास ने सभी वर्गों, खासकर उच्च-मध्यम वर्ग को लुभाया।

कानून-व्यवस्था में सुधार ने भी खासतौर पर मध्यम वर्ग समेत सभी वोटरों को प्रभावित किया। कोविड काल में जब दुनियाभर में सरकारें परेशानी का सामना कर रही थीं, तब भी 2021 के केरल विधानसभा चुनाव में माकपा ने अपनी सत्ता बरकरार रखकर पुराने चलन को ध्वस्त किया था।

सवाल यही है कि भारतीय राजनीति में प्रो-इन्कम्बेंसी का यह चलन कब तक जारी रहेगा? मजबूत नेतृत्व आधारित राजनीति और कल्याणकारी योजनाओं पर आधारित शासन कब तक उस सत्ता-विरोधी लहर को रोक पाएंगे, जो भारत में पहले कई बार देखी जा चुकी है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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