सुधीर चौधरी का कॉलम:  दुनिया को ऐसे नेता चाहिए जो संवाद के दरवाजे खोल सकें
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सुधीर चौधरी का कॉलम: दुनिया को ऐसे नेता चाहिए जो संवाद के दरवाजे खोल सकें

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2 घंटे पहले

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सुधीर चौधरी वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक - Dainik Bhaskar

सुधीर चौधरी वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक

भारत पाकिस्तान की तरह ‘दलाली’ नहीं करता- विदेश मंत्री एस. जयशंकर का यह सीधा संदेश सिर्फ एक बयान नहीं है, यह भारत की विदेश नीति का स्पष्ट संकेत है। यह बात ऐसे समय कही गई है, जब ईरान-इजराइल युद्ध के बीच पाकिस्तान को अमेरिका और ईरान के बीच संभावित मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिशें हो रही हैं। लेकिन सच क्या है?

मध्यस्थता सिर्फ संदेश पहुंचाना नहीं होती। मध्यस्थता का मतलब है समझौते को संभव बनाना और उसे लागू करवाने की क्षमता रखना। यहीं पर पाकिस्तान कमजोर पड़ता है। न उसके पास वह रणनीतिक ताकत है कि वह किसी पक्ष को प्रभावित कर सके और न ही वह विश्वसनीयता कि कोई उस पर भरोसा करे कि वह किसी समझौते को लागू करवा पाएगा।

ईरान के राष्ट्रपति के साथ बातचीत के बाद, प्रधानमंत्री मोदी से आग्रह किया गया है कि वे ब्रिक्स अध्यक्ष के रूप में अपनी भूमिका का इस्तेमाल कर इस युद्ध को रोकने की दिशा में कदम उठाएं। यह सामान्य कूटनीति नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि जब दुनिया बंट जाती है, तब कुछ ही देश ऐसे बचते हैं जिनसे हर पक्ष बात करने को तैयार होता है।

आज की वैश्विक स्थिति को देखें तो साफ दिखाई देता है कि इस संघर्ष को कम करने की क्षमता अगर किन्हीं दो नेताओं में है, तो वे हैं नरेंद्र मोदी और व्लादीमीर पुतिन। और इसकी वजह सिर्फ कूटनीति ही नहीं है, ताकत भी है। भारत और रूस छोटे देश नहीं हैं।

एक दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, तो दूसरा महाशक्ति। दोनों के पास बड़ी सेनाएं हैं। दोनों परमाणु शक्ति संपन्न हैं। और सबसे महत्वपूर्ण, मोदी और पुतिन आज दुनिया के सबसे वरिष्ठ और लंबे समय तक शासन करने वाले नेताओं में शामिल हैं। अनुभव, स्थिरता और वैश्विक समझ- इन तीनों का मेल इनमें दिखता है।

भारत आज एक अनोखे संतुलन पर खड़ा है। अमेरिका के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी है। ट्रम्प मोदी का सम्मान करते हैं। इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ निजी दोस्ती, गहरा रक्षा और तकनीकी सहयोग और ईरान के साथ लगातार संवाद भी है।

खाड़ी देशों के साथ भारत के रिश्ते भी पिछले एक दशक में नई ऊंचाई पर पहुंचे हैं। यूएई से लेकर सऊदी अरब तक, ऊर्जा, निवेश, सुरक्षा और प्रवासियों के कारण भारत के प्रति भरोसा मजबूत हुआ है। करीब 1 करोड़ भारतीय खाड़ी देशों में रहते हैं। यही संख्या भारत को एक मूकदर्शक नहीं, बल्कि सीधा हितधारक बनाती है।

मोदी की कूटनीति की सबसे बड़ी खासियत है, शांति से काम करना, लेकिन असर के साथ। वे बिना शोर के संवाद बनाए रखते हैं और हर पक्ष से बात करने की क्षमता रखते हैं। अब बात पुतिन की। उनके पास दो बड़े फायदे हैं। पहला, वे ईरान के भरोसेमंद साझेदार हैं।

रूस और ईरान के बीच गहरे रणनीतिक संबंध हैं, जो पुतिन को तेहरान तक सीधी पहुंच देते हैं। दूसरे, उनके पास ट्रम्प के साथ संवाद का सीधा चैनल भी है। और इस संघर्ष को रोकने के लिए वॉशिंगटन की भूमिका निर्णायक है।

सीधे शब्दों में, पुतिन ईरान से प्रभाव के साथ बात कर सकते हैं और अमेरिका से पहुंच के साथ। यहीं से तस्वीर साफ होती है। पाकिस्तान मध्यस्थ बनना चाहता है, लेकिन उसके पास न ताकत है, न भरोसा। मोदी के पास भरोसा है- हर पक्ष के साथ। पुतिन के पास प्रभाव है- शक्ति केंद्रों के भीतर। ये दो अलग ताकतें हैं, लेकिन एक साझा संभावना है- शांति।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी है कि क्या भारत को इस भूमिका में आगे आना चाहिए? क्योंकि पश्चिम एशिया सिर्फ कूटनीति से नहीं चलता। यह इतिहास, पहचान, सत्ता और अविश्वास का जटिल मिश्रण है। फिर भी, संकेत साफ हैं। ईरान भारत की ओर देख रहा है। खाड़ी देश भारत पर भरोसा करते हैं। और दुनिया को ऐसे नेताओं की जरूरत है, जो संवाद के दरवाजे खोल सकें।

इस तलाश में नरेंद्र मोदी और व्लादीमीर पुतिन सिर्फ विकल्प नहीं हैं। शायद यही वह जोड़ी है, जो इस युद्ध को रोकने की दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकती है और इस युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में आने वाली आर्थिक मंदी को रोक सकती है।

भारत और रूस कोई छोटे देश नहीं हैं। दोनों के पास बड़ी सेनाएं हैं। दोनों परमाणु शक्ति संपन्न हैं। मोदी और पुतिन- ये दोनों ही आज दुनिया के सबसे वरिष्ठ और लंबे समय तक शासन करने वाले नेताओं में भी शामिल हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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