डेरेक ओ ब्रायन का कॉलम:  जल्दबाजी में क्यों पारित किया गया ट्रांसजेंडर बिल?
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डेरेक ओ ब्रायन का कॉलम: जल्दबाजी में क्यों पारित किया गया ट्रांसजेंडर बिल?

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इस सप्ताह ट्रांसजेंडर विधेयक को संसद से जल्दबाजी में पारित कर दिया गया। ‘जल्दबाजी’ में इसलिए, क्योंकि बीस वर्ष पहले तक दस में से छह विधेयकों को जांच के लिए संसदीय समितियों के पास भेजा जाता था। अब दस में से दो को ही भेजा जा रहा है। एक और तथ्य यह है कि दोनों सदनों में भाजपा नेताओं ने उन्हें बोलने के लिए दिए गए समय का दो-तिहाई ही उपयोग किया। क्या उनके पास पर्याप्त वक्ता नहीं थे? या उन्होंने विधेयक को पारित करने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए वक्ताओं को सामने न लाने का निर्णय लिया? जबकि विपक्ष के सांसदों ने एक-एक मिनट का उपयोग करते हुए प्रभावशाली हस्तक्षेप किए। उदाहरण के लिए कांग्रेस की रेणुका चौधरी ने कहा कि जब हम सांसद बनते हैं, तो हमें अपने जेंडर की पहचान बतानी होती है। ऐसा हम स्वयं करते हैं। किसी मेडिकल बोर्ड से इसकी पुष्टि नहीं कराई जाती। द्रमुक के तिरुचि शिवा ने कहा, ट्रांसजेंडर लोगों का हर जगह शोषण, उत्पीड़न और अपमान किया जा रहा है और अब सरकार भी उन्हें अपराधी ठहराने की कोशिश कर रही है। टीएमसी के साकेत गोखले ने कहा, एक ट्रांस पुरुष, पुरुष है। एक ट्रांस महिला, महिला है। यह कोई तीसरा जेंडर नहीं है। जब सरकार इन बुनियादी तथ्यों को भी नहीं समझती, तो हम किस विधायी क्षमता की बात कर रहे हैं? इनकी तुलना में सुनें कि भाजपा की ओर से राज्यसभा में डॉ. मेधा कुलकर्णी ने क्या कहा : ‘वे ट्रैफिक सिग्नलों पर भीख मांगते और पैसे इकट्ठा करते पाए जाते हैं… और जब वे घर पहुंचते हैं, तो उन्हें पैसे गिनते हुए, शराब और सिगरेट का सेवन करते हुए देखा जाता है!’ समझ नहीं आता इस पर क्या प्रतिक्रिया दूं। संसद द्वारा पारित विधेयक 2019 के अधिनियम में व्यापक बदलाव करता है। यह संशोधन अपने उद्देश्य और प्रभाव दोनों में खतरनाक है, क्योंकि यह एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा को और संकीर्ण कर देता है। किसी व्यक्ति की पहचान को मान्यता देने के लिए अब एक मेडिकल बोर्ड या डीएम की स्वीकृति आवश्यक होगी। सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन अब काफी नहीं होगा। यह लैंगिक पहचान को व्यक्तिगत स्वायत्तता के विषय से हटाकर राज्य की स्वीकृति का विषय बना देता है। यह असमान व्यवहार (अनुच्छेद 14 का उल्लंघन) उत्पन्न करता है और स्वायत्तता तथा गरिमा को सीमित करता है (अनुच्छेद 21 का उल्लंघन)। नया विधेयक अस्पतालों द्वारा जेंडर-अफर्मिंग सर्जरी की अधिकारियों को रिपोर्टिंग अनिवार्य बनाता है, जो चिकित्सकीय गोपनीयता में हस्तक्षेप है। सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस केएस पुट्टस्वामी बनाम भारत सरकार के निर्णय में स्पष्ट किया था कि निजता में शारीरिक व निर्णयात्मक स्वायत्तता और व्यक्तिगत जानकारी पर नियंत्रण का अधिकार शामिल है। अपने शरीर के संबंध में निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे में आते हैं। ट्रांसजेंडर्स को पहले ही पूर्वग्रहों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में उनकी सहमति के बिना उन्हें अपने बारे में खुलासे के लिए विवश करना जोखिम पैदा करने वाला हो सकता हे। इससे वे परिवार, कार्यस्थल, सार्वजनिक जीवन में भेदभाव को लेकर अधिक निष्कवच हो जाते हैं। ट्रांसजेंडर्स की रक्षा का दावा करने वाला कानून उन हालात को मजबूत कैसे बना सकता है, जो ऐसी सुरक्षा की जरूरत पैदा करते हों? यह विधेयक दंडात्मक प्रावधानों का व्यापक विस्तार करता है, जो कागज पर तो उत्पीड़न को दंडित करने के लिए हैं, लेकिन प्रलोभन, अनुचित प्रभाव जैसे अस्पष्ट शब्दों का उपयोग और सहमति से होने वाली मेडिकल केयर का भी अपराधीकरण एक बिलकुल अलग कहानी प्रस्तुत करता है। सजा के भय से लोग जेंडर-अफर्मिंग केयर प्राप्त करने से भी हिचकेंगे। अपराधों की अस्पष्ट परिभाषा उन्हें उत्पीड़न के साधन में बदलने का जोखिम पैदा करती है, जिससे मित्रों, परिवारों और मेडिकल पेशेवरों को भी दंडित किया जा सकता है। हिंदी फिल्मों में ट्रांसजेंडर प्रतिनिधित्व पर नजर डालें। ऋषि कपूर की रफू चक्कर या अमिताभ बच्चन की लावारिस में इसे मुख्यतः हास्य के स्रोत के रूप में प्रस्तुत किया गया। कुकू (सैक्रेड गेम्स) या शिल्पा (सुपर डीलक्स) जैसे पात्र अपेक्षाकृत अधिक सूक्ष्म चित्रण का संकेत देते हैं। लेकिन यहां भी ट्रांस भूमिकाएं प्रायः सिस-जेंडर अभिनेताओं द्वारा निभाई जाती हैं। पुनश्च : 1930 के दशक के नाजी जर्मनी में ‘ट्रांसवेस्टाइट प्रमाण पत्र’ (उस समय ट्रांसजेंडर लोगों के लिए प्रयुक्त शब्द) जारी किए जाते थे। और जिन लोगों के पास ये प्रमाण पत्र थे, उन्हें यंत्रणा शिविरों में भेज दिया जाता था। हम किस दिशा में जा रहे हैं? हमारे समाज में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को पहले ही पूर्वग्रहों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में उनकी सहमति के बिना उन्हें अपने जेंडर के बारे में खुलासा करने के लिए विवश करना उनके लिए जोखिम पैदा करने वाला हो सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं। इस लेख के सहायक शोधकर्ता आयुष्मान डे और चाहत मंगतानी हैं)



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