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- ‘Self made’ Is A Myth, Behind Every Success Lies The Support Of Loved Ones.
द न्यूयॉर्क टाइम्स. न्यूयॉर्क55 मिनट पहले
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लेखिका एंजेला डकवर्थ कहती हैं, ‘अत्यंत सफल लोगों में यह आदत समान होती है- मदद मांगने की तत्परता।- प्रतीकात्मक फोटो
‘समाज अक्सर ‘सेल्फ-मेड’ या अकेले संघर्ष करने वाले व्यक्ति की छवि को बढ़ावा देता है, जो कि भ्रामक है।’ ख्यात मनोवैज्ञानिक व लेखिका एंजेला डकवर्थ कहती हैं, ‘अत्यंत सफल लोगों में यह आदत समान होती है- मदद मांगने की तत्परता। मेरा अनुभव भी यही कहता है। एक भयावह घटना के बाद मुझे समझ आ गया कि कभी-कभी जीवन का सबसे बड़ा पराक्रम अकेले लड़ना नहीं, बल्कि सही समय पर हाथ फैलाकर मदद मांगना होता है।’ पढ़िए, एंजेला को क्या सबक मिला…
‘एक दिन मैं मियामी के शांत नीले समंदर में अपनी 86 वर्षीय मां के साथ स्नोर्केलिंग कर रही थी। सब कुछ सामान्य लग रहा था, तभी अचानक तेज लहर हमें नाव से काफी दूर बहा ले गई। घबराहट में मां के फेफड़ों में पानी भर गया और वे बेहोश हो गईं। चारों ओर अथाह पानी था और मदद का कोई संकेत नहीं दिख रहा था।मैंने पूरी ताकत लगा दी। एक हाथ से मां को संभाला और दूसरे हाथ से तैरने की कोशिश करती रही, पर लहरों के सामने शक्ति कम पड़ रही थी। सांसें तेज हो रही थीं, फेफड़े जल रहे थे और शरीर जवाब देने लगा था।
तभी लगा कि अकेले संघर्ष करते रहना जानलेवा साबित हो सकता है। मैंने तुरंत तरीका बदला, मां का सिर पानी से ऊपर रखा और दूसरे हाथ से इशारा करते हुए पूरी ताकत से पुकारा, ‘हेल्प…!’ पुकार काम कर गई। बचावकर्मियों की टीम तुरंत पहुंच गई और हमें सुरक्षित बाहर निकाल लिया। उस दिन मैंने समझा कि हर लड़ाई अकेले जीतने की कोशिश बहादुरी नहीं होती। कई बार बड़ा साहस सही वक्त पर मदद मांगने में होता है।
हम अक्सर सुनते हैं कि अपनी जंग खुद लड़ो व सफलता मेहनत से हासिल करो। ‘सेल्फ-मेड’ लोगों की कहानियां भी यही संदेश देती हैं कि कामयाब लोग किसी की मदद नहीं लेते। अत्यधिक सफल लोगों की स्टडी के बाद मैंने पाया कि सफलता के पीछे सिर्फ व्यक्तिगत मेहनत नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर दूसरों से मदद लेने की क्षमता भी अहम है। दुनिया के सबसे बड़े वेल्थ फंड के प्रमुख निकोलाई टैनगेन हों या मशहूर होस्ट कॉनन ओ’ब्रायन, दोनों खुलकर स्वीकार करते हैं कि उनकी सफलता अकेले की नहीं, बल्कि अनेक लोगों के सहयोग का नतीजा है। स्टार्टअप जगत की प्रतिष्ठित संस्था ‘वाई कॉम्बिनेटर’ भी अकेले फाउंडर्स के बजाय मजबूत टीमों को तरजीह देती है, क्योंकि मिलकर काम करने वाले लोग बेहतर फैसले लेते हैं। मनोविज्ञान इसे ‘आत्मनिर्भरता का भ्रम’ कहता है। हम अक्सर भूल जाते हैं कि हमारी सीख, मौके और उपलब्धियां दूसरों के सहयोग से ही संभव हुई हैं। मदद मांगना कमजोरी नहीं है। सच तो यह है कि ज्यादातर लोगों को किसी की मदद करके खुशी व संतोष मिलता है।
सच्ची समझदारी हर मुश्किल अकेले झेलने में नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर मदद मांगने में है। जब रास्ता न सूझे तो सवाल पूछें, काम उलझे तो साथियों को बताएं और संकट आए तो हाथ बढ़ाने से न हिचकें। उस हादसे के 5 साल बाद मां ने 91वां जन्मदिन मनाया। यह सबूत है कि जीवन की खूबसूरती अकेले चलने में नहीं, बल्कि अपनों का हाथ थामने में है।’ -एंजेला







