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सैयद अता हसनैन का कॉलम: क्या शिया ईरान के खिलाफ सुन्नी गठजोड़ बनाया गया है?

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7 घंटे पहले

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सैयद अता हसनैन बिहार के राज्यपाल और कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर - Dainik Bhaskar

सैयद अता हसनैन बिहार के राज्यपाल और कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर

तुर्किये, सऊदी अरब, पाकिस्तान के बीच मक्का में हुए समझौते को “मुस्लिम नाटो’ बताया जा रहा है। समझौते में कहा गया है कि किसी एक पर हमला तीनों पर हमले जैसा माना जाएगा। यह नाटो के अनुच्छेद-5 जैसा है, लेकिन इसमें यह स्पष्ट नहीं है कि हमले के बाद किस प्रकार की सैन्य सहायता दी जाएगी। हो सकता है यह अस्पष्टता जानबूझकर रखी गई हो।

इन तीनों देशों की रणनीतिक ताकत अलग-अलग है। सऊदी अरब की ताकत धन, तेल और उसकी रणनीतिक भौगोलिक स्थिति है। पाकिस्तान मुस्लिम जगत का एकमात्र परमाणु-हथियार सम्पन्न राष्ट्र है। तुर्किये के पास ताकतवर सेना और उन्नत रक्षा उद्योग है। तीनों की समझौते की वजहें भी अलग हैं। सऊदी अरब सुरक्षा का भरोसा चाहता है। पाकिस्तान रणनीतिक हैसियत में ऊंचा दर्जा चाहता है।

तुर्किये रणनीतिक प्रभाव बढ़ाना चाहता है। हाल के घटनाक्रम से सऊदी अरब के लिए खतरे सामने आए हैं। ऐसे में यह समझौता उसके लिए अतिरिक्त सुरक्षा कवच जैसा है। इस समझौते से पाकिस्तान को सबसे बड़ा तात्कालिक लाभ मिलता दिखता है। सुरक्षा को लेकर उसकी सोच भारत, अफगानिस्तान, आतंकवाद और आंतरिक चुनौतियों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है।

यह समझौता उसे दक्षिण एशिया से आगे भी एक व्यापक सुरक्षा ढांचे में भूमिका प्रदान करता है। लेकिन अगर ईरान सऊदी अरब पर हमला करता है तो क्या समझौते के तहत पाकिस्तान युद्ध में शामिल होगा? सऊदी अरब और ईरान, दोनों से पाकिस्तान के हित जुड़े हैं तो उसके लिए किसी एक के खिलाफ दूसरे को चुनना आसान नहीं होगा। यानी इस समझौते से पाकिस्तान की प्रासंगिकता के साथ ही उसकी दुविधा भी बढ़ती है।

तुर्किये नाटो, रूस, ईरान, खाड़ी देशों, पाकिस्तान, मध्य एशिया के साथ संबंध बनाए हुए है। लेकिन सीरिया, इराक, कॉकेशस क्षेत्र में भी उसके महत्वपूर्ण हित हैं, जहां उसका ईरान से सामंजस्य जरूरी है। अगर ईरान सऊदी अरब पर हमला करता है तो तुर्किये क्या करेगा?

इंटेलिजेंस, हवाई रक्षा, नौसैनिक सहायता, लड़ाकू विमान देने जैसी मदद करेगा या ईरान के खिलाफ सीधी सैन्य कार्रवाई करेगा? वहीं यदि सीरिया या इराक को लेकर तुर्किये का ईरान से टकराव होता है तो क्या सऊदी और पाकिस्तान भी युद्ध में उतरेंगे?

गठबंधन आक्रमण को तो रोकते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे के लिए उलझन-भरी स्थिति भी पैदा कर सकते हैं। तुर्किये की नाटो सदस्यता इस समीकरण को और जटिल बना देती है। इसलिए शायद अनुच्छेद-5 जैसा प्रावधान जानबूझकर अस्पष्ट रखा गया होगा। यानी हमले के प्रति मजबूत प्रतिरोध का संकेत, लेकिन अनिवार्य तौर पर युद्ध में उतरने की बाध्यता नहीं।

एक सवाल यह भी सामने आता है कि क्या यह ईरान के खिलाफ सुन्नी समझौता है? इसके सांप्रदायिक गणित को अनदेखा नहीं किया जा सकता। तीनों सुन्नी-बहुल देश हैं और ईरान एक प्रमुख शिया ताकत, फिर भी ऐसा कहना एक सरल-सा निष्कर्ष होगा। यह समझौता आधिकारिक रूप से रक्षात्मक है और सऊदी अरब ईरान के साथ संबंध सुधारने के लिए भी काम कर भी चुका है। फिर भी ईरान इस समझौते पर नजर रखने वाली सबसे महत्वपूर्ण बाहरी ताकत होगा।

अमेरिका भी शायद इसे अच्छा कदम माने कि क्षेत्रीय साझेदार सुरक्षा की अधिक जिम्मेदारी खुद उठा रहे हैं। मक्का समझौता, अब्राहम समझौते को भी अनिवार्य तौर पर समाप्त नहीं करता। यह सऊदी अरब को एक और रणनीतिक विकल्प देता है और उसकी मोलभाव की ताकत को बढ़ाता है। वह अमेरिका के साथ अपने रक्षा संबंध बरकरार रखते हुए तुर्किये और पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा सकता है और इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने की संभावना भी खुली रख सकता है।

मक्का समझौते के सांप्रदायिक गणित को अनदेखा नहीं किया जा सकता। सऊदी, तुर्किये और पाकिस्तान- तीनों सुन्नी-बहुल देश हैं और ईरान एक प्रमुख शिया ताकत। फिर भी ऐसा कहना शायद एक सरल-सा निष्कर्ष होगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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