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आम धारणा है कि छोटे बच्चों को माता-पिता के बढ़ते अनुभव और आर्थिक स्थिरता का लाभ मिलता है, जबकि बड़े बच्चों पर जिम्मेदारी अधिक होती है, लेकिन वैज्ञानिक आंकड़े बताते हैं कि असल फायदा पहले जन्मे यानी फर्स्ट बॉर्न बच्चों को ही मिलता है। अमेरिकी इकोनॉमिक रिव्यू’ में प्रकाशित होने जा रही स्टडी में इसके पीछे दो सबसे बड़े कारण बताए हैं। पहला कारण क्वालिटी टाइम की कमी है…। स्टडी के अनुसार छोटे बच्चों को माता-पिता से लगभग 3 हजार घंटे कम समय मिलता है। बड़े बच्चे को रोजाना 20-30 मिनट ज्यादा ध्यान मिलता है, जो किताबें पढ़ने, बातचीत और खेलने में खर्च होता है। यह अंतर शुरुआती शिक्षा के एक पूरे साल के बराबर है। दूसरा कारण है बड़े भाई-बहनों से आए कीटाणु…। डेनमार्क के 12 लाख बच्चों पर की गई स्टडी में सामने आया कि छोटे बच्चों को जीवन के पहले साल में फ्लू जैसी बीमारियों के कारण 2-3 गुना ज्यादा अस्पताल जाना पड़ता है। नवजात का इम्यून सिस्टम कमजोर होता है और बीमारी के दौरान उसकी ऊर्जा दिमागी विकास के बजाय संक्रमण से लड़ने में खर्च होती है। छोटे बच्चों पर इसका असर भी लंबे वक्त तक होता है। वयस्क होने पर इनकी सालाना कमाई 1% तक कम रही। ग्रेजुएशन की दर 0.5% घट गई और किशोरावस्था में मानसिक बीमारियों के कारण क्लिनिक जाने के मामले 6% तक बढ़ गए। गंभीर मामलों में तो वयस्कों की सैलरी में 10 से 20% तक की गिरावट देखी गई। पेरेंट्स निष्पक्ष रहें जाने-माने अमेरिकी अर्थशास्त्री प्रो. जो प्राइस की सलाह है कि पेरेंट्स को ‘आज’ के हिसाब से नहीं, बल्कि ‘उम्र’ के हिसाब से निष्पक्ष होना चाहिए। हमेशा खुद से पूछें- ‘जब मेरा बड़ा बच्चा इस उम्र में था, तब मैं उसके साथ क्या कर रहा था?’ छोटे बच्चों के साथ भी बैठकर किताबें पढ़ने और बात करने का उतना ही समय निकालें। इसके अलावा बड़े भाई-बहन को छोटे भाई-बहन का शिक्षक या कोच बनने के लिए प्रेरित करें (जैसे शतरंज सिखाना, कहानी सुनाना)। इससे बड़े बच्चे में जिम्मेदारी की भावना आती है और माता-पिता के समय की कमी को बड़ा भाई या बहन अपने ‘क्वालिटी टाइम’ से पूरा कर देता है। छोटे बच्चे को 20 मिनट बिना रुकावट वाला वक्त दें: एक्सपर्ट प्रोफेसर प्राइस कहते हैं, बड़े भाई-बहनों के स्कूल से लाए कीटाणु और पेरेंट्स की समय की कमी छोटे बच्चों के भविष्य पर अदृश्य चोट करती है। पर थोड़ी सी जागरूकता, बेहतर स्वच्छता और सही समय पर मेडिकल सुरक्षा देकर इस अंतर को मिटा सकते हैं। येल यूनिवर्सिटी एक्सपर्ट का सुझाव है कि छोटे बच्चे के साथ समय की कमी को पूरा करने के लिए पेरेंट्स उसके साथ अकेले में वक्त बिताने का रूटीन बनाएं। जब बड़ा बच्चा स्कूल या होमवर्क में व्यस्त हो, तब छोटे बच्चे को 20 मिनट का बिना रुकावट वाला समय (पढ़ना या बात करना) दें। यह वक्त बड़ों और छोटों के बीच में आने वाली दूरी को पाट देता है।
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