16 साल की उम्र में डायबिटीज और फैटी लिवर:  11 फूड दिग्गजों पर केस; अमेरिकी फूड इंडस्ट्री पर भूख न मिटाने वाले खाने का आरोप
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16 साल की उम्र में डायबिटीज और फैटी लिवर: 11 फूड दिग्गजों पर केस; अमेरिकी फूड इंडस्ट्री पर भूख न मिटाने वाले खाने का आरोप

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16 साल के ब्राइस मार्टिनेज को जब सीने में तेज दर्द हुआ, तो उसे लगा कि शायद यह अस्थमा का दौरा है। पर स्कूल में जब उसका ब्लड प्रेशर नापा गया, तो आंकड़े देखकर सब सन्न रह गए। ब्राइस को तुरंत इमरजेंसी रूम ले जाया गया। डॉक्टरों ने जब रिपोर्ट देखी तो कड़वी सच्चाई सामने आई… इतनी कम उम्र में ब्राइस को टाइप 2 डायबिटीज और फैटी लीवर जैसी गंभीर बीमारियां हो चुकी थीं। ब्राइस के लिए यह सदमे जैसा था। पर वे हार मानकर नहीं बैठे और अमेरिका के 11 अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड दिग्गजों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया, जानिए उनका संघर्ष… ब्राइस को बचपन से मोटापे की समस्या जरूर थी, लेकिन उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि बच्चों को भी बड़ों वाली बीमारियां हो सकती हैं। रिसर्च करने पर ब्राइस को अहसास हुआ कि अमेरिकी बच्चे खराब खाद्य माहौल में जी रहे हैं। उसे बचपन की यादें ताजा हो गईं। सुबह स्कूल भागते समय खाया जाने वाला शुगर से भरा सीरियल (ओट्स, फ्लैक्स) दोपहर में स्कूल कैंटीन का पिज्जा-बर्गर और शाम को माता-पिता के लौटने से पहले माइक्रोवेव में गर्म किया फ्रोजन फूड। उन्हें महसूस होने लगा कि जो पैकेज्ड जूस, चिप्स व इंस्टेंट फूड वे खाते थे, वैज्ञानिक रूप से इस तरह बनाए गए थे कि भूख कभी शांत ही न हो। जिन खाद्य पदार्थों को वह कमजोरी मानते थे, असल में वे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड थे, जिन्हें कंपनियों ने जानबूझकर बच्चों को आदी बनाने के लिए ‘डिजाइन’ किया था। 18 साल के होते-होते ब्राइस का गुस्सा संकल्प में बदल गया। उन्होंने फैसला किया कि वे इस बीमारी का कसूरवार खुद को मानना बंद करेंगे। उन्होंने अमेरिका की 11 फूड दिग्गज कंपनियों पर केस कर दिया (जिनमें कोका-कोला, पेप्सीको, क्राफ्ट हाइंज व नेस्ले शामिल थीं)। यह अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड्स के कारण स्वास्थ्य को हुए नुकसान का इतिहास में पहला व्यक्तिगत केस था। ब्राइस के सामने 959 लाख करोड़ का विशाल फूड और बेवरेज उद्योग था। इसके बाद ऐसे आधा दर्जन केस और सामने आए। इनमें दावा है कि बच्चों को टारगेट कर इंजीनियर किए गए अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड ने 18 साल से कम उम्र में लंबे वक्त तक चलने वाली बीमारियां पैदा कीं। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्राइस का यह कदम 1950 के दशक में तंबाकू कंपनियों के खिलाफ शुरू हुए अभियान जैसा है। तब भी तंबाकू कंपनियों के खिलाफ भी सैकड़ों मामले खारिज हुए थे, पर जो गोपनीय दस्तावेज सामने आए, उन्होंने कंपनियों के झूठ का पर्दाफाश कर दिया। अंततः सरकारों को कड़े नियम बनाने पड़े। 20 साल के ब्राइस रोज इंसुलिन व दवाओं के सहारे हैं। कोर्ट ने शुरुआती केस खारिज कर दिया है। अब वे ऊपरी कोर्ट में अपील कर रहे हैं। उनकी इस पहल से प्रेरित होकर कैलिफोर्निया राज्य ने भी जनता की ओर से इन्हीं 11 कंपनियों पर केस किया है। सिर्फ डायबिटीज पर ही करीब 4.51 लाख करोड़ रु. खर्च बताया गया है। ब्राइस की यह कानूनी जंग राष्ट्रीय आंदोलन बन चुकी है, इस तर्क के साथ कि ये बीमारियां हमारी पसंद का नतीजा नहीं, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुनाफे का खेल है।



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